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झूठ बोल रही है शिवराज सरकार!  मध्यप्रदेश में कांट्रैक्ट फ़ार्मिंग की खुली पोल 

झूठ बोल रही है शिवराज सरकार!  मध्यप्रदेश में कांट्रैक्ट फ़ार्मिंग की खुली पोल 

डिजिटल डेस्क (भोपाल)। भाजपा कृषि बिल को लेकर झूठ बोल रही है, क्या कांग्रेस कृषि कानून को लेकर भ्रम फैला रही है या क्या देश का किसान अनपढ़ है जो कृषि बिल के फायदे नहीं समझ पा रहा है। ऐसा क्यों है कि भाजपा जिन किसानों को अपने विज्ञापन में इस्तेमाल करती है या जिनका गुणगान करके कांग्रेस पर निशाना साधती है। वे किसान ही भाजपा के खिलाफ खड़े हैं। 

15 दिसंबर को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  ने एक ट्वीट किया कि 'किसानों के साथ हमें प्रत्येक वर्ग के कल्याण के लिए कार्य करना है। होशंगाबाद के किसानों को नये कृषि कानून के तहत न्याय मिला, हर किसान को हक मिले, हमें यह सुनिश्चित करना है। लेकिन अब इसी होशंगाबाद जिले के किसान ने सरकार की पोल खोलकर रख दी है। पिपरिया के उस पीड़ित किसान ने मीडिया को बताया कि न हस्ताक्षर, न मुहर, ऐसे ही होता रहा अनुबंध तो हम तबाह हो जाएंगे।  

दूसरी तरफ,  पंजाब के किसान हरप्रीत सिंह सिंघू बॉर्डर पर किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं धरना-प्रदर्शन में शामिल हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) पंजाब में इन कानूनों पर जो विज्ञापन चला रही है, उनपर हरप्रीत की फोटो है। यानी बीजेपी ने जिस किसान की फोटो अपने विज्ञापन पर लगाई है, वो 15 दिनों से नए कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली में धरने पर बैठे हैं और  हरप्रीत का आरोप है कि बीजेपी ने गैरकानूनी तरीके से उनकी तस्वीर इस्तेमाल की है। 

मध्यप्रदेश के किसान बोले, नया कृषि बिल तबाह करने वाला... 

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में जब शिवराज सरकार के दावों की पड़ताल की गई तो पूरी पोल खुलकर सामने आ गई।  दरअसल, पिछले दिनों मध्यप्रदेश और केन्द्र सरकार ने यह प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि होशंगाबाद जिले के पिपरिया में कैसे नया कृषि कानून किसानों के हितों की रखवाली करने वाला बनकर उभरा है और कैसे प्रशासन ने फौरन कार्रवाई करते हुए किसानों को नए कानून के तहत 24 घंटे के अंदर न्याय दिलाया? कैसे किसानों से अनुबंध के बावजूद फॉर्चून राईस लिमिटेड ने धान नहीं खरीदी तब एसडीएम कोर्ट ने नए कृषि कानून "किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) अनुबंध मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम 2020" (कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अधिनियम) के प्रावधान के अनुसार कंपनी को खरीद के आदेश दिए?  

जब मीडिया की टीम भौंखेड़ी कलां के पुष्पराज सिंह के पास पहुंची, जिनकी शिकायत पर ही कार्रवाई हुई थी। पुष्पराज ने बताया कि उन्होंने 40 एकड़ में धान लगाया था। पुष्पराज का कहना है कि किसान उनके उदाहरण से सबक ले सकते हैं, वो कभी अनुबंध पर खेती की सलाह नहीं देंगे। वो अब नये कृषि कानूनों का विरोध करते हैं। सिंह ने कहा, "हम पिछले 4 साल से खेती कर रहे हैं, लेकिन अनुबंध पर कभी दिक्कत नहीं आई। इस साल करार ये था कि मंडी का जो भी रेट होगा, उससे 50 रुपए अधिक पर कंपनी फसल खरीदेगी। जब रेट 2300-2400 रुपए था, तब दिक्कत नहीं थी, जैसे ही 2950 रेट निकला वैसे ही 3000 पर खरीदी करना था, लेकिन फॉर्चून के अलावा जितनी कंपनियां थीं, सबके फोन बंद हो गए। 

पुष्पराज ने कहा, "मुख्यमंत्री शिवराज जी जो कह रहे हैं कि न्याय दिलाया, न्याय की बात तो तब आती जब कंपनी ने बेईमानी की होती या वो हमारी गिरफ्त से भाग गई होती तो किससे न्याय दिलाया? हमारा जो बिल है वो अन्नपूर्णा ट्रेडर्स के नाम पर है लेकिन इस पर ना तो बिल नंबर है, ना टिन नंबर। " पुष्पराज ने कहा कि सरकार कह रही है कि किसान कहीं भी माल ले जाकर बेच सकते हैं लेकिन जब 200 क्विंटल धान पैदावार हुई तो क्या हम उसे बेचने केरल जाएंगे। उन्होंने कहा कि छोटे किसान अनुंबध की खेती में बर्बाद हो जाएंगे। 
     
इसी तरह गाड़ाघाट के ब्रजेश पटेल, इन्होंने भी फॉर्चून कंपनी से अनुबंध किया था।  20 एकड़ में धान लगाया था, अब अपने खलिहान में रखने को मजबूर है। कंपनी ने धान उठाने से मना कर दिया ये कहकर कि धान में हैक्सा ( एक किस्म के कीटनाशक) की मात्रा आ गई है। 2 बार लैब टेस्ट करवाया, लेकिन एक बार भी रिपोर्ट नहीं दी। आरोप है इस बार रिपोर्ट देने के बदले 8000 रुपए मांग रहे हैं। ब्रजेश का कहना है कि कंपनी बहाने बना रही है, अब कभी अनुबंध नहीं करेंगे।   पटेल ने कहा कि जो अनुबंध मिला वो एक पन्ने का है, जिसमें कंपनी का कोई सील-हस्ताक्षर नहीं हैं, जिस दुकान से दवा-खाद लेते हैं उसका नाम है लेकिन हस्ताक्षर उसके भी नहीं, उन्होंने कहा कि कंपनी का कोई प्रतिनिधि बात भी नहीं करता। 
      
इसी गांव के किसान घनश्याम पटेल ने दूसरी कंपनी वीटी के साथ अनुबंध किया। इनका धान भी कंपनी ने रिजेक्ट कर दिया है। अनुबंध के नाम पर एक पन्ने के भी कागज नहीं है। कहते हैं ये खाद, दवा, कीटनाशक की पर्ची ही इनके लिए अनुबंध का सर्टिफिकेट था, अब कहते हैं मंडी में ही धान बेचेंगे।  

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