दैनिक भास्कर हिंदी: साइबर क्राइम में लिप्त पढ़े-लिखे अपराधियों को पकड़ना पुलिस के लिए बना चैलेंज

December 6th, 2018

डिजिटल डेस्क, नागपुर। समय के साथ अपराध करने का तरीका भी बदल गया है। चाकू-छुरी की जगह अब साइबर क्राइम ने ले ली है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो हालात यह है कि चाकू-छुरी वालों तक तो आसानी से पुलिस पहुंच सकती है, लेकिन साइबर क्राइम में लिप्त पढ़े-लिखे अपराधियों तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। यही कारण है कि पुलिस लगभग 50 प्रतिशत मामले ही सुलझा पाई है। इसके लिए पर्याप्त साधन सामग्री, फंड और बल उपलब्ध न होना भी एक बड़ी समस्या है। 

कसौटी पर नहीं उतरा खरा 
लगभग डेढ़ वर्ष पहले 20 मई 2017 को शहर पुलिस महकमे में स्वतंत्र रूप से साइबर सेल का गठन हुआ। इसके लिए आधुनिक तकनीक काे जानने वाले जानकार अधिकारी और कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है। साइबर सेल को सक्षम बनाने के लिए लगभग सभी साधन सामग्री भी उपलब्ध कराए गए। इसके बावजूद विभाग अभी तक कसौटी पर खरा नहीं उतर सका। 

एक नजर आंकड़ों पर
आंकड़ों पर नजर डालें, तो वर्ष 2017 में 1673 प्रकरण साइबर श्रेणी के तहत शहर के विविध थानों में दर्ज हुए थे। इसमें से औसतन 55 प्रतिशत मामले ही विभाग सुलझा पाया है। इसी तरह वर्ष 2018 में दिसंबर महीना छोड़कर लगभग उतने ही 1725 प्रकरण दर्ज हुए, इसमें से भी औसतन 45 प्रतिशत मामले ही विभाग सुलझा पाया है। कुल िमलाकर आधे प्रकरणों को ही विभाग सुलझाने में सफल हुआ है। अभी भी आधे मामलों की पड़ताल जारी होने का हवाला दिया जा रहा है।

इसलिए नहीं मिलता  आरोपी का जल्दी सुराग
घटित प्रकरणों में आरोपी पढ़ा-लिखा होने से वारदात को अंजाम देने में पूरा दिमाग लगाता है। खुद के पकड़े जाने की आशंका होने से किसी के नाम का सिम कार्ड खरीदा जाता है। फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। लिहाजा पुलिस बरामद मोबाइल नंबर और दस्तावेजों के जरिए ठिकाने तक तो पहुंच जाती है, लेकिन इसमें जिस व्यक्ति के नाम पर घटित प्रकरण को अंजाम दिया होता है उसे ही इस बात की भनक नहीं रहती, जिससे घटना का सूत्रधार साफ बचकर निकलने में सफल  हो जाता है।

यह भी हो सकते हैं नाकामी के कारण
कई बार पुलिस को जांच के लिए  शहर से बाहर जाना पड़ता है। इसके लिए फंड और विभाग की अनुमति होना जरूरी होता है। कई बार किन्हीं कारणों की वजह से फंड व अनुमति सही समय पर नहीं मिलने से भी जांच प्रभावित होती है। इसका सीधा असर जांच-पड़ताल पर पड़ता है। इस कारण भी पुलिस को कई बार सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पाते हैं।