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दैनिक भास्कर हिंदी: बागी बिगाड़ सकते हैं बसपा का मिशन 2020 ! अपना दल और कांग्रेस की बराबरी पर खड़ी हैं मायावती 

June 17th, 2021

डिजिटल डेस्क, लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी में बगावत होना कोई नई बात नहीं है। 14 अप्रैल 1984 (बसपा का गठन) से लेकर अब तक इन 37 सालों में पार्टी में कई बार टूट-फूट होती रही है। इस बार भी बागी विधायक मायावती का मिशन 2022 बिगड़ सकते हैं। लखनऊ में बीते मंगलवार को बसपा विधायकों ने सपा मुख्यालय पर अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। तब से कयास लगाए जा रहे हैं कि ये विधायक 2022 चुनाव से पहले सपा में शमिल होंगे। वहीं, मायावती को डर है कि अखिलेश यादव उनकी पार्टी में फूट डालने की कोशिश कर रहे हैं। 

2012 से गिरा पार्टी का ग्राफ 
बहुजन समाजवादी पार्टी का ग्राफ साल 2012 के बाद से गिरता जा रहा है, जोकि अब तक थमा नहीं है। साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीतने वाली बसपा आज दहाई से इकाई के अंक पर आ गई है। पार्टी की हालत अनुप्रिया पटेल की अपना दल और कांग्रेस के जैसी हो गई है। बसपा से एक-एक कर कैडर के नेताओं का अलग होना उसके लिए चिंता वाली बात है। एक समय भारी-भरकम नेताओं से भरी इस पार्टी में कोई दमदार नेता नहीं बचा। आज बसपा के पास मायावती के बाद दूसरी श्रेणी के नेताओं का टोटा है।

धीरे-धीरे बसपा छोड़ते गए बड़े नेता 
बहुजन समाज पार्टी में एक दौरा था। जब ये पार्टी दिग्गज नेताओं से भरी हुई थी। बसपा में हर जाति के बड़े चेहरे थे। आरके चौधरी, स्वामी प्रसाद, मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, सोनेलाल पटेल, आरके चौधरी, इंद्रजीत सरोज, धर्मसिंह सैनी। लेकिन समय के साथ-साथ ये बड़े नाम पार्टी छोड़ते गए।

क्या है बसपा के विधायकों का गणित
मायावती ने बसपा से 11 विधायकों को निलंबित किया है। जिनमें लालजी वर्मा और राम अचल राजभर, असलम रैनी, असलम अली, हरगोविंद भार्गव, मुजतबा सिद्दीकी, हकीम लाल बिंद, सुषमा पटेल, वंदना सिंह, अनिल सिंह और रामवीर उपाध्याय का नाम शामिल है। बसपा के एक पार्टी पदाधिकारी के अनुसार, उनमें से 8 सपा के संपर्क में हैं और 3 भाजपा के साथ हैं। उन्होंने कहा कि रामवीर उपाध्याय, अनिल सिंह और राम अचल भाजपा के संपर्क में हैं, जबकि अन्य सपा के संपर्क में हैं। बसपा सूत्रों की मानें तो पार्टी के कुछ नेता विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दूसरे दलों का दामन थाम सकते हैं। अगर बसपा के विधायक टूट कर सपा या भाजपा में शामिल होते हैं। तो मायावती का मिशन 2022 मुश्किल में पड़ सकता है।

अखिलेश यादव का रुख साफ 
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पहले साफ कर चुके हैं कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधासनभा चुनाव में सपा बिना किसी पार्टी से गठबंधन किए चुनाव लड़ेगी। हालांकि, कहा ये भी जा रहा है। पार्टी के साथ छोटे-मोटे दल जुड़ सकते हैं। वहीं कुछ बागी विधायक सपा में शामिल हो सकते हैं। बागी विधायकों के सपा में शामिल होने से जहां अखिलेश यादव की ताकत बढ़ेगी। वहीं, बसपा कमजोर हो जाएगी। 

बसपा की हालत का जिम्मेदार कौन 
राजनीति के जानकारों का कहना है कि बहुजन समाजवादी पार्टी की मुखिया मायावती का बीजेपी के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर और पार्टी नेताओं के साथ कम्युनिकेशन गैप अनिश्चितता पैदा करता है। यूपी चुनाव में अल्पसंख्यक अहम भूमिका रखते हैं। लेकिन, अल्पसंख्यक नेता बीजेपी के प्रति उनके नरम रुख से नाराज हैं। वहीं, पिछड़े वर्ग के लिए सपा और भाजपा एक बेहतर विकल्प नजर आ रहा है। लेकिन, बसपा छोड़ने वाले ज्यादातर नेता सपा में की ओर रुख कर रहे हैं। जाहिर की मायावती को इस चुनाव को जीतने के लिए हर वर्ग पर ध्यान देना होगा। साथ ही पार्टी के नेताओं की राय भी जाननी होगी।

 

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