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मध्यप्रदेश में बंद हो रही वाटरशेड परियोजना, नियमों को ताक पर रखकर जारी है मनमानी !

मध्यप्रदेश में बंद हो रही वाटरशेड परियोजना, नियमों को ताक पर रखकर जारी है मनमानी !

डिजिटल डेस्क (भोपाल)।  मध्यप्रदेश में बंद हो रही वाटरशेड परियोजनाओं के अमले को बड़े स्तर से मैनेजमेंट के तहत अनावश्यक रूप से मनरेगा में लिया जाने के प्रयास किये जा रहे हैं जिसमे नियमों को ताक पर रखकर कार्यवाही जोरों पर है। जबकि मनरेगा में पहले से पर्याप्त अमला है जिनके माध्यम से योजना सुचारू रूप से संचालित है। इतना ही नहीं, बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के, बिना रोस्टर का पालन किए सामान्य प्रशासन विभाग के नियम और निर्देशों की अनदेखी कर कार्यवाही युद्ध स्तर पर जारी है।

उक्त कार्यवाही से उत्पन्न समस्याएं जिन पर अधिकारियों का ध्यान नहीं है ...

1, लोकनिधि का दुरुपयोग , अनुपयोगी अमले को जबरन मनरेगा में लेने से केवल लोकनिधि का दुरुपयोग होगा, जबकि उनकी योग्यता अनुसार मनरेगा में पदसोपान ही नहीं है और जबरन ,अनावश्यक पदों का सृजन कर वाटरशेड के अमले को लिए जाने का प्रायोजित प्रयास किया जा रहा है। 

2. कोविड काल में मनरेगा में उपलब्ध अमले का आउटकम और वाटरशेड के अमले उपयोगिता सिद्ध करने  का जबरन प्रयास - कोविड काल में मनरेगा में मध्य प्रदेश देश में अब्बल रहा है यानी ये तो सिद्ध हो गया कि वर्तमान  कार्यरत अमला न केवल पर्याप्त है बल्कि इसने देश में सर्वाधिक मानव दिवस और परिवारों को रोजगार देने, सर्वाधिक और स्थायी परिसंपत्ति के निर्माण जल संवर्धन और संरक्षण और nrm के कार्यों तथा कृषि और संलग्न गतिविधियों के कार्यों के रूप   में सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन किया है  तब nrm या जल संबंधी कार्यों के नाम पर इनकी जबरन उपयोगिता  कागजों में सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि इन प्रकृतियों के कार्यों , परिसंपत्ति निर्माण और देश में उत्कृष्ट उपलब्धि मध्य प्रदेश ने वर्तमान अमले के माध्यम से ही प्राप्त की है।

3.वित्तीय समस्या एवं वर्तमान मनरेगा अमले के हितों पर कुठाराघात -- मनरेगा में कार्यरत अमले को अभी तक 2018 में लागू संविदा नीति में उल्लेखित 7 वें वेतनमान का लाभ नही दिया जा सका , न ही ग्राम रोजगार सहायकों का विगत 5 वर्षों से कोई वेतन बढ़ोत्तरी हुई।इसका कारण केंद्र  से मिलने वाला 6% प्रशासनिक बजट है ।अब जबकि विगत वर्षों में  प्रशानिक बजट में कमी के चलते 2 वर्षोँ से मंहगाई भत्ते तक में बढ़ोत्तरी नहीं हुई और कोविड काल में सर्वाधिक उपलब्धि और अपना बेहतर प्रदर्शन के बाबजूद सामान्य प्रशासन विभाग की नीति  के तहत 7 वें वेतन में को लागू करने में पालन लंबित है तो अन्य अनुपयोगी अमले को जबरदस्ती लेने के प्रयास सरकार और सरकार के उच्च स्तरीय अधिकारियों की मिलीभगत कटघरे में  खड़ा करते है।


4, भर्ती नियमों का उल्लंघन -- किसी योजना में भर्ती नियमों के लिए सामान्य प्रशासन  विभाग के नियम हैं कि रोस्टर का पालन हो और व्यापम जो कि वर्तमान में प्रोफेशनल एडुकेशन बोर्ड हो चुका है उसके माध्यम से नियमों का पालन करते हुए भर्ती होना चाहिए । चूंकि वाटरशेड के अमले की नियुक्ति में रोस्टर का पालन नही किया गया था जबकि मनरेगा के तहत भर्ती में रोस्टर का पालन हुआ है , ऐसी स्थिति में बिना किसी परीक्षा के गुपचुप तरीके से  एक योजना से दूसरी योजना में बिना कोई विभागीय परीक्षा और नियमों के पालन के दूसरी  योजना में जबरन लिया जाना भी सरकार और सरकार के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों को संदेह के घेरे में खड़ा करता है।

5. मनरेगा का इतिहास  -- मनरेगा अंतर्गत जिला स्तर पर कार्यपालन यंत्री तकनीकी अधिकारी हैं जिनके नियंत्रण और निर्देशन में समस्त कार्य विगत 15 वर्षों से सम्पादित हो रहे है। इसी प्रकार जनपद स्तर पर सहायक यंत्री उक्त कार्यों के लिए नियुक्त है । अब जिला स्तर पर परीयोजना अधिकारी तकनीकी और जनपद स्तर पर विकासखंड समन्वयक का पद सर्जन किया जा रहा है जो अनुपयोगी है। इसके अलावा जिला स्तर पर 6 अधिकारी कर्मचारी प्रत्येक जनपद स्तर पर 5 से 6 अधिकारी कर्मचारी , प्रत्येक सेक्टर स्तर पर उपयंत्री और ग्राम पंचायत स्तर पर सचिव के अलावा ग्राम रोजगार सहायक पदस्थ हैं। पूर्व के वर्षों में जो प्रतिनियुक्ति पर अतिरिक्त अमला था और अनुपयोगी था उनको वर्ष 2017--18 में विभागों में वापस किया गया और बहुत से अनुपयोगी पदों पर लोगों के पास काम न होने से उनको दूसरे कार्यों में संयोजित किया जा चुका है । उसके अतिरिक्त एक और बिंदु महत्वपूर्ण है । लगभग 5 से 6 वर्ष पूर्व जनपद स्तर पर प्रबंधक का पद पूर्ण रूप से अनुपयोगी  होने के  कारण इस पद को  समाप्त किया जा चुका है और इस पद पर पदस्थ प्रबन्धको को अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी का कार्य सौंपकर रिडिप्लॉय किया जा चुका , तो इन समाप्त हो चुके  अनुपयोगी  पदों के विरुद्ध  विकाशखण्ड समन्वयक रूपी पद जो कि मनरेगा एक्ट और योजना में कभी सेटअप में नहीं रहा उस नाम से गुपचुप तरीके से नियमों  और सामान्य प्रशासन विभाग की नीति , निर्देशों और पारदर्शी प्रक्रिया को ताक पर रखकर गुपचुप तरीके से विभागीय शसक्त समिति से पास कराकर रिडिप्लॉय करना कहाँ तक उचित है। उससे सिद्ध है कि मनरेगा में बहुत पर्याप्त अमला पहले से विद्यमान है और इसका परिणाम रूपी रिजल्ट भी मध्य प्रदेश के मनरेगा अमले ने प्रदेश को देश में अब्बल रख कर दिया ।

6. प्रदेश में संविदा पर भर्ती की एक सुस्थापित पारदर्शी व्यवस्था होते हुए भी उसका  पालन न करना --- मध्य प्रदेश में संविदा पर भर्ती की एक व्यबस्था है , जिसके अंतर्गत शिक्षा विभाग सहित स्वास्थ्य और अन्य कई विभागों में बड़े पैमाने पर पारदर्शी तरीके से प्रोफेशनल एकजामनेशन बोर्ड के माध्यम से सभी नियमों का पालन करते हुए भर्ती करने के लिए सरकार की एक सुव्यवस्थित व्यवस्था  लगभग 5 से 6 वर्ष पूर्व  स्थापित हो चुकी है तो अब मनरेगा में यदि किन्ही पदों की आवश्यकता है तो पहले केबिनेट से पदों को आवश्यकता सिद्ध करके  पास कराया जाकर उन पदों पर  पारदर्शी तरीके से खुली भर्ती परीक्षा का आयोजन हो जिसमें वाटरशेड के अमले को कुछ अंकों का अनुभव का लाभ दिया जाकर व्यवस्थित तरीके से लिया जाना चाहिए जिसमें रोस्टर आरक्षण नियमों का पालन भी सुनिश्चित हो सके जो कि एक संवैधानिक और विधिक अनिवार्यता है  ।जिन लोगों की सविदा सेवा समाप्त हो चुकी है या होने जा रही है उनको भी इस परीक्षा में बैठने का अवसर और कुछ अनुभव के अंक दिए जा सकते हैं। किंतु ये सब प्रक्रिया से बचने का प्रयास और जल्दबाजी में अमले को गलत , नियम विरुद्ध और अपारदर्शी तरीके से मनरेगा में लाने की जल्दबाजी कुछ तो इशारा करती है दाल में जरूर कुछ काला है । इस बात की पुष्टि इस तथ्य से भी होती है कि मनरेगा में शसक्त समिति की बैठक पहले साल में बमुश्किल 1 या 2 होती थी अब 1 साल में कोविड काल में ही लगभग 3 और इसके ठीक पहले के 3 से 4 महीने में लगभग 3 यानी 6 बैठके हो चुकी है और प्रत्येक बैठक में वाटरशेड का मुद्दा अनिवार्यतः रहा है ।

7. वाटरशेड के अमले को मनरेगा में उपयोगी बताया जाकर सरकारी लूप होल्स का प्रयोग कर वाटरशेड की अवधारणा अब बहुत पुरानी हो चुकी है जिसको अब भारत सरकार ने रिप्लेस कर दिया और उसके स्थान पर gis प्लानिंग की अवधारणा  मूर्त रूप ले चुकी है । अब सेटेलाइट के माध्यम से प्राप्त चित्रों के आधार पर गूगल अर्थ और अन्य तकनीकी रूप से उपयोगी , ऑथेंटिक सेटेलाइट मानचित्रों के माध्यम से मनरेगा के समस्त प्रकार के कार्यों  की प्लानिंग की जा रही है । इसको सम्पूर्ण देश में भारत सरकार ने लागू कर दिया है और अब समस्त प्लानिंग gis के माध्यम से होगी। इसके अलावा वाटरशेड की पुरानी पड़ चुकी अवधारणा के संबंध में कई जिलों से पत्र जारी किया गया गया है अगर वाटरशेड के पुराने तकनीकी के माध्यम से नदी पुनर्जीवन का काम लिया जाएगा तो लगभग  40 से 49 वर्ष लगेगें। इससे ये सिद्ध होता है कि मनरेगा में ये अवधारणा और इस पर कार्य करने के लिए अमले की उपयोगिता केवल कागजी कार्यवाही तक सीमित है। एक महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि वाटरशेड की अवधारणा और इनका अमला उपयोगी होता तो क्यों ये परियोजनाएं सरकार द्वारा बंद  की जाती ? एक बड़ा प्रश्न चिन्ह ? 

8. समाधान --- वास्तविकता में इसका भी समाधान है कि जिन कर्मचारियों  की परियोजनाएं बंद हैं उनको उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के अनुसार ग्रामीण विकास की विभिन्न योजनाओं में रिक्त और उपयोगी पदों पर समायोजन किया जा सकता है। 

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डिजिटल डेस्क, जबलपुर। किसी के लिए भी प्रॉपर्टी खरीदना जीवन के महत्वपूर्ण कामों में से एक होता है। आप सारी जमा पूंजी और कर्ज लेकर अपने सपनों के घर को खरीदते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इसमें इतनी ही सावधानी बरती जाय जिससे कि आपकी मेहनत की कमाई को कोई चट ना कर सके। प्रॉपर्टी की कोई भी डील करने से पहले पूरा रिसर्च वर्क होना चाहिए। हर कागजात को सावधानी से चेक करने के बाद ही डील पर आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि कई बार हमें मालूम नहीं होता कि सही और सटीक जानकारी कहा से मिलेगी। इसमें bhaskarproperty.com आपकी मदद कर सकता  है। 

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कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले इस बात का ध्यान रखे कि वो भारतीय रियल एस्टेट इंडस्ट्री के रेगुलेटर RERA से अप्रूव्ड हो। रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवेलपमेंट एक्ट, 2016 (RERA) को भारतीय संसद ने पास किया था। RERA का मकसद प्रॉपर्टी खरीदारों के हितों की रक्षा करना और रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश को बढ़ावा देना है। राज्य सभा ने RERA को 10 मार्च और लोकसभा ने 15 मार्च, 2016 को किया था। 1 मई, 2016 को यह लागू हो गया। 92 में से 59 सेक्शंस 1 मई, 2016 और बाकी 1 मई, 2017 को अस्तित्व में आए। 6 महीने के भीतर केंद्र व राज्य सरकारों को अपने नियमों को केंद्रीय कानून के तहत नोटिफाई करना था।