जबरिया जोड़ी रिव्यू: सीरियस मुद्दे पर कॉमेडी का दमदार डोज है ​फिल्म, फर्स्ट हाफ के बाद करती है बोर

जबरिया जोड़ी रिव्यू: सीरियस मुद्दे पर कॉमेडी का दमदार डोज है ​फिल्म, फर्स्ट हाफ के बाद करती है बोर

Bhaskar Hindi
Update: 2019-08-09 07:29 GMT
जबरिया जोड़ी रिव्यू: सीरियस मुद्दे पर कॉमेडी का दमदार डोज है ​फिल्म, फर्स्ट हाफ के बाद करती है बोर

डिजिटल डेस्क, मुम्बई। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक लंबे समय से चली आ रही समस्या पकड़ुआ विवाह पर आधारित फिल्म जबरिया जोड़ी, आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। परिणिती चोपड़ा, सिद्धार्थ मल्होत्रा, संजय मिश्रा, जावेद जाफरी और अपारशक्ति खुराना फिल्म में मुख्य किरदार में हैं। इसका निर्देशन प्रशांत सिंह ने किया है और निर्माण एकता कपूर, शोभा कपूर, शैलेश आर सिंह ने किया है। वैसे तो इस ​मुद्दे पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन फिल्म के फॉर्मेट में यह पहला एक्सपेरीमेंट है। 

फिल्म की कहानी की बात करें तो पटना का बाहुबली अभय सिंह (सिद्धार्थ मल्होत्रा) "पकड़वा विवाह" का एक्सपर्ट है। वह काबिल और पढ़े-लिखे दूल्हों की किडनैपिंग करके उनकी शादी उन लड़कियों से करवाता है, जिनके परिवार वाले मोटा दहेज देने में असमर्थ हैं। अपने दबंग पिता हुकुम सिंह (जावेद जाफरी) के निर्देश और अपनी गैंग के साथ मिलकर वह इस काम को बहुत ही कामयाबी से अंजाम देता है। उसका मानना है कि दहेज के लोभियों का इस तरह से अपहरण करके और उनकी शादी करवा कर वह लड़की वालों के लिए पुण्य का काम कर रहा है। 

वहीं उसके बचपन का प्यार बबली यादव (परिणीति चोपड़ा) उससे बिछड़ चुका था, मगर बबली की सहेली की शादी में ये दोनों मिलते हैं। बबली भी अभय सिंह से कम दबंग नहीं है। प्यार में धोखा देनेवाले अपने आशिक को वह सरेआम नेशनल टीवी पर पीटकर बबली बम बन चुकी है। बबली के पिता दुनियालाल (संजय मिश्रा) सीधे-सादे अध्यापक हैं। उनकी टोली में संतो (अपारशक्ति खुराना) जैसा हमदर्द भी है, जो बबली को मन ही मन चाहता है। धीरे धीरे अ​भय सिंह और बबली की मुलाकातें बढ़ती हैं और दोनों का प्यार फिर जाग उठता है। लेकिन अब अजय का फोकस प्यार और शादी से हटकर इलेक्शन जीतने पर है। दोनों का प्यार क्या मोड़ लेता है यह तो आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा। 

निर्देशन की बात करें तो फिल्म फर्स्ट हाफ में हास्य और मनोरंजन के कई पल जुटाने में कामयाब रही है, लेकिन सेंकड हाफ में फिल्म की कहानी अपनी दिशा खो बैठती है। एक ही समय में फिल्म अलग अलग डॉयरेक्शन और किरदारों में चलती है और कोई भी ट्रेक अपनी पकड़ नहीं बना पाता। इतना ही नहीं कई जगहों पर फिल्म लाउड और अतार्किक भी है। क्लाइमैक्स को कुछ ज्यादा ही खीचा गया है। 

संगीत की बात करें तो कई कई संगीतकारों के मेले के बावजूद संगीत एवरेज ही बन पाया है। सिद्धार्थ और परी की जोड़ी को फिल्म हंसी तो फंसी में बहुत पसंद किया गया था। उस वक्त दोनों शहरी क्षेत्र के किरदारों की भूमिका निभा रहे थे। लेकिन ज​बरिया जोड़ी और बिहारी क्षेत्र के किरदारों में दोनों फिट होते नहीं दिखाई दे रहे हैं। अफसोस इस बात का है कि रंग-बिरंगे कपड़ों और बिहारी ऐक्सेंट में कड़ी मेहनत करने के बावजूद सिद्धार्थ अपनी क्लासी और शहरी इमेज से निकल नहीं पाए। वहीं परिणीति जैसी सहज अदाकारा की अदायगी स्टाइलिश कपड़ों और मेकअप तले दबकर रह गई। 

जावेद जाफरी और संजय मिश्रा ने अपने चरित्रों में जान डाल दी है। अपारशक्ति खुराना और चंदन रॉय सान्याल ने अच्छा काम किया है। सहयोगी कास्ट ठीक-ठाक है। लेकिन कुछ मिलाकर सब ठीक ठॉक है। सिद्धार्थ और परिणीति के फैंस एक बार इस फिल्म को जरुर देंखे। 

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