National Film Award: 25 साल से अभिनय कर रहे रणदीप हुड्डा को पहली ही फिल्म के निर्देशन के लिए राष्ट्रीय सम्मान, बोले- चाहता हूं बेटी भी एक दिन...

भास्कर ब्यूरो, मुंबई। करीब 25 साल से अपने अभिनय से दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाने वाले रणदीप हुड्डा ने जब निर्देशन की कमान संभाली, तो उनकी पहली ही फिल्म ‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’ ने उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिला दिया। एक अभिनेता के तौर पर कई यादगार किरदार निभाने के बाद निर्देशक के रूप में मिली यह पहली बड़ी पहचान उनके लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि इस सम्मान को लेने के लिए वह एकता नगर पहुंचे तो उनके साथ उनकी बेटी नियोमिका, पिता रणबीर हुड्डा और पत्नी लिन लैशराम भी मौजूद थीं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में रणदीप ने राष्ट्रीय सम्मान मिलने की खुशी, पिता बनने के बाद बदली जिम्मेदारियों और अभिनय, लेखन व निर्देशन के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि वह हमेशा पहले अभिनेता रहेंगे, लेकिन निर्देशन में मिली इस पहली पहचान ने उन्हे एक नया आत्मविश्वास दिया है।
एक्टर को निर्देशन के लिए मिला अवार्ड
रणदीप कहते हैं कि बड़े आश्चर्य की बात है कि एक एक्टर को निर्देशन के लिए सम्मान मिला है। मैं तो सबसे पहले इस सम्मान से गदगद हूं। यकीन नहीं हो रहा है कि नेशनल अवार्ड मिल रहा है। हालाँकि मैंने कई सालों से इस पल का इंतजार किया है। पर वो इंतजार एक एक्टर कर रहा था। यह साल मेरे लिए बात बहुत लकी रहा है। मुझे तो लगता है कि मेरी बेटी मेरा भाग्य बदलने आ गयी है। उसका जन्म बेहद खास रहा और अब यह अवार्ड मिलना बहुत बड़ी उपलब्धि है।
सोचा था कभी निर्देशन नहीं करूंगा
रणदीप हुड्डा कहते हैं मेरी पहली पहचान हमेशा एक अभिनेता की ही रहेगी। हालांकि मुझे अभिनय के लिए बहुत ज्यादा पुरस्कार नहीं मिले, लेकिन दर्शकों का प्यार हमेशा भरपूर मिला है। पहली ही फिल्म में निर्देशक के तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलना मेरे लिए बेहद खास है। इस फिल्म को मैंने लिखा भी है तो एमरे लिए यह बहुत चुनौतीपूर्ण रहा। अभिनय के साथ निर्देशन करना बहुत कठिन है। सोचा था कि अब कभी निर्देशन नहीं करूंगा लेकिन निर्देशन एक पावर लेकर आता है। आपको महसूस कराता है कि आप क्रिएटर हैं और अब तो अवार्ड भी मिल चुका है। आगे भी इसे जारी रखने के इरादा है।
बेटी और पिता के साथ सम्मान लेना रहा खास
मैंने हमेशा कोशिश की है कि मेरे काम से परिवार और आसपास के लोग गर्व महसूस करें। पिता बनने से यह भावना बहुत नहीं बदलती। लेकिन आज का दिन इसलिए खास है क्योंकि मैं यहां सिर्फ रणदीप हुड्डा के तौर पर नहीं, बल्कि नियोमिका के पिता के रूप में भी मौजूद हूं। मेरे अपने पिता रणबीर हुड्डा भी यहां हैं। यह एक तरह से पिता और बच्चों का एक-दूसरे को गौरवान्वित करने का पल है। वहां हुड्डा परिवार की 3 पीढ़ियां मौजूद थीं। मेरे पिताजी को मुझ पर गर्व है। जब अवार्ड मैंने लिया तो उनकी ख़ुशी मैंने देखी। मैं चाहूंगा कि इसी तरह नियोमिका भी मुझे एक दिन गर्व महसूस कराए। मैं उस दिन का इंतजार करुंगा।
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आलोचकों को यह जवाब है
‘स्वातंत्र्यवीर सावरकर’ के बनते वक्त आने वाली चुनौतियों पर रणदीप ने कहा कि जब मैं इस पर काम कर रहा था तो मुझे कई लोगों ने मना किया कि इस पर फिल्म मत बनाइए लेकिन मैंने तो इसकी कहानी भी खुद लिखी मुझे फिल्म बनाना ही था। उस समय मुझे डाउट तो नहीं लेकिन निराशा बहुत हुई थी कि लोग कितनी आलोचना कर रहे हैं। पर आज यह नेशनल अवार्ड उनके लिए जवाब है। मेरे लिए यह सबक है कि खुद भरोसा रखकर आगे बढ़ते रहिये, ऊपर वाला आपकी मेहनत देखा रहा है। अब अभिनेता के तौर पर समामं मिलने का इंतजार रहेगा क्योंकि मैं रुकने वाला तो अब नहीं हूं।
सबसे मुश्किल सीन जेल वाला
फिल्म में अभिनय के साथ निर्देशन और लेखन तीनों बहुत मुश्किल थे लेकिन सबसे ज्यादा तकलीफ देह जेल वाला सीन था जब मैंने वह शूट कर रहा था तो लगा मैं इसे पूरा नहीं कर पाऊंगा। यह सोचकर भी डर जाता हूं कि मैं तो सिर्फ शूट कर रहा हूं पर उन्होंने तो यह कई सालों तक झेला है। मेरे लिए वह सीन आज भी एक सिहरन का एहसास लेकर आता है।
Created On :   25 Sept 2026 12:03 AM IST












