Bhopal: विश्वरंग के निदेशक एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे से संजय सिंह राठौर की विशेष बातचीत

प्रश्न: इस वर्ष विश्वरंग को नालंदा और बिहार से जोड़ने का विचार कैसे आया?
संतोष चौबे:
विश्वरंग की मूल अवधारणा ही संवाद की है—भाषाओं के बीच, संस्कृतियों के बीच, कलाओं के बीच और देशों के बीच रचनात्मक एवं सृजनात्मक संवाद। नालंदा इस विचार के लिए केवल एक ऐतिहासिक स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रतीक है। भारत को केवल उसके राजनीतिक इतिहास से नहीं समझा जा सकता। हमारे विश्वविद्यालय, गुरुकुल, पुस्तकालय, यात्राएँ, भाषाएँ, कलाएँ और ज्ञान के आदान-प्रदान की परंपराएँ भी भारत के इतिहास का निर्माण करती हैं।
नालंदा इसी बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। सदियों पहले यहां दूर-दूर से विद्यार्थी और विद्वान आते थे। आज विश्वरंग विभिन्न भाषाओं, क्षेत्रों और सांस्कृतिक परंपराओं के रचनाकारों, शिक्षाविदों और कलाकारों को एक मंच पर ला रहा है। इसलिए नालंदा में विश्वरंग का आयोजन अतीत की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उस संवाद-परंपरा की समकालीन अभिव्यक्ति है।
प्रश्न: इस बार विश्वरंग के कार्यक्रमों में भाषा, अनुवाद, कला, शिक्षा और दक्षिण एशिया जैसे विषय एक साथ दिखाई देते हैं। इसके पीछे क्या सोच है?
संतोष चौबे:
भारत की संस्कृति को अलग-अलग खांचों में बांटकर नहीं समझा जा सकता। भाषा का संबंध साहित्य से है, साहित्य का समाज से, कला का संस्कृति से और संस्कृति का हमारे ज्ञान तथा जीवन-दृष्टि से।
इसीलिए इस बार विश्वरंग में दक्षिण एशियाई भाषाओं की साझा जमीन, भारतीय भाषायी सांस्कृतिक चेतना, पूर्व और पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाएँ, अनुवाद, कला, नालंदा की ज्ञान परंपरा, भविष्य के विश्वविद्यालय तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ व्यापार, संस्कृति और सतत विकास जैसे विषय शामिल किए गए हैं।
हम चाहते हैं कि विश्वरंग केवल साहित्यिक कार्यक्रम न रहे। वह ऐसा मंच बने जहां साहित्य, कला, शिक्षा, भाषा, तकनीक, समाज और विकास एक-दूसरे से रचनात्मकत संवाद स्थापित करें।
प्रश्न: भारतीय भाषाओं के संदर्भ में विश्वरंग की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
संतोष चौबे:
हम अक्सर भाषाई विविधता की बात करते हैं, लेकिन विविधता का अर्थ केवल यह बताना नहीं है कि हमारे देश में कितनी भाषाएँ हैं। हर भाषा अपने भीतर एक अलग अनुभव संसार, लोक-स्मृति, इतिहास, साहित्य और जीवन-दृष्टि रखती है।
इसलिए भारतीय भाषाओं को बचाने का अर्थ केवल उनका संरक्षण नहीं, बल्कि उनके बीच संवाद बढ़ाना है। मैं यह नहीं मानता कि भारतीय भाषाओं की एकता का अर्थ उनकी समानता है। हमारी शक्ति इस बात में है कि वे अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए एक-दूसरे से संवाद करें।
यहीं अनुवाद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि हिंदी का पाठक असमिया, मराठी, तमिल, कोंकणी या किसी अन्य भारतीय भाषा के साहित्य से परिचित होता है, तो वह केवल एक नई किताब नहीं पढ़ता, बल्कि दूसरे समाज के अनुभव संसार में प्रवेश करता है। अनुवाद भारत के भीतर सांस्कृतिक संवाद का एक मजबूत आधार बन सकता है।
प्रश्न: पूर्वोत्तर भारत को इस बार के विमर्श में विशेष स्थान दिया गया है। इसकी क्या वजह है?
संतोष चौबे:
पूर्वोत्तर को केवल भारत की भौगोलिक सीमा के रूप में देखना उसके सांस्कृतिक महत्व को सीमित करना है। यह अनेक भाषाओं, लोक परंपराओं, साहित्यिक संस्कृतियों और समुदायों का विस्तृत संसार है। इसके ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंध दक्षिण-पूर्व एशिया तक जाते हैं।
इसलिए भारतीय सांस्कृतिक विमर्श को व्यापक बनाने के लिए पूर्वोत्तर की भाषाओं और साहित्य को केंद्र में लाना आवश्यक है। यह किसी क्षेत्र को कृत्रिम रूप से मुख्यधारा में लाने का प्रयास नहीं है, बल्कि हमारी मुख्यधारा की परिभाषा को ही अधिक व्यापक बनाने का प्रयास है।
प्रश्न: विश्वरंग और टैगोर का संबंध अब तक इसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। नालंदा के संदर्भ में टैगोर को आप किस तरह देखते हैं?
संतोष चौबे:
नालंदा और टैगोर को सीधे ऐतिहासिक समानता में देखना उचित नहीं होगा, लेकिन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक सूत्र दिखाई देता है—अपनी सांस्कृतिक जड़ों में रहते हुए व्यापक संसार से संवाद।
टैगोर की दृष्टि में अपनी संस्कृति के प्रति गहरी पहचान और दूसरी संस्कृतियों के साथ संवाद, दोनों साथ चलते हैं। इसी कारण विश्वरंग में टैगोर केवल साहित्यकार के रूप में नहीं आते। उनकी कविता, चित्रकला, नाटक, संगीत और विचार—सभी हमारे सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा हैं।
इस वर्ष पटना में टैगोर चित्र प्रदर्शनी, कला संगोष्ठी और उनकी कलात्मक दृष्टि पर चर्चा इसी व्यापक संदर्भ का हिस्सा हैं।
प्रश्न: आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीक शिक्षा की दिशा बदल रहे हैं, तब नालंदा की ज्ञान परंपरा से हमें क्या सीखना चाहिए?
संतोष चौबे:
आज हमारे सामने यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है। क्या शिक्षा केवल रोजगार की तैयारी है या वह मनुष्य को सोचने, प्रश्न करने और समाज को समझने की क्षमता भी देती है?
नालंदा की स्मृति हमें ज्ञान को केवल सूचना के रूप में देखने से आगे ले जाती है। ज्ञान में तर्क, विमर्श, प्रश्न और बहस का महत्व था। आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीकें हमारे सामने नई संभावनाएँ और चुनौतियाँ दोनों ला रही हैं, तब हमें ऐसे विश्वविद्यालय चाहिए जो बहुविषयक, संवादशील और समाज से जुड़े हुए हों।
भविष्य का विश्वविद्यालय वह होगा जहां तकनीक और मानविकी, विज्ञान और कला, कौशल और विचार—एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी होंगे।
प्रश्न: क्या आपको लगता है कि तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच कला और साहित्य की भूमिका कम हो रही है?
संतोष चौबे:
इसके विपरीत, मुझे लगता है कि कला और साहित्य की भूमिका और महत्वपूर्ण हो रही है। हमने पहले भी इस बात पर चर्चा की है कि तकनीक हमारे जीवन की गति बढ़ा रही है, लेकिन उसके साथ मनुष्य की संवेदनाओं को केंद्र में बनाए रखना भी जरूरी है।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे लिए बहुत-सी चीजें कर सकती है, लेकिन मनुष्य के अनुभव, संवेदना, कल्पना और नैतिक प्रश्नों का स्थान तकनीक अपने आप नहीं ले सकती। इसलिए आने वाला समय विज्ञान और कला के बीच दूरी बढ़ाने का नहीं, बल्कि दोनों के बीच संवाद बढ़ाने का समय है।
प्रश्न: इस वर्ष विश्वरंग का कार्यक्रम काफी विस्तृत है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
संतोष चौबे:
इस वर्ष विश्वरंग की सांस्कृतिक यात्रा कई स्तरों पर हो रही है। 3 अक्टूबर को वैशाली में सी.वी. रमन विश्वविद्यालय में अतिथियों का विश्वविद्यालय भ्रमण और विद्यार्थियों के साथ संवाद होगा तथा वैशाली स्तूप का भ्रमण भी होगा। 4 अक्टूबर को पटना संग्रहालय में उद्घाटन, सांस्कृतिक विमर्श, टैगोर राष्ट्रीय कला संगोष्ठी, संग्रहालय भ्रमण, टैगोर चित्र प्रदर्शनी और कहानी पाठ जैसे कार्यक्रम हैं। 5 अक्टूबर को कॉलेज ऑफ आर्ट एंड क्राफ्ट और प्रेमचंद रंगशाला में टैगोर बाल चित्रकला कार्यशाला, लोकरंग, शोभायात्रा, लोक गायन और नाट्य प्रस्तुति आयोजित है।
इसके बाद नालंदा में ज्ञान, भाषा, साहित्य, कला, शिक्षा, अनुवाद और एशिया के साथ सांस्कृतिक संबंधों पर केंद्रित संवाद होंगे। 7 अक्टूबर को ‘नालंदा की विरासत’, ‘दक्षिण एशियाई भाषाओं की साझा जमीन’, ‘कलाओं में संस्कृति का रूपांकन’, ‘अनुवाद—भाषा, परंपरा और विकास’ तथा ‘नालंदा की ज्ञान परंपरा और भविष्य के विश्वविद्यालय’ जैसे विषयों पर चर्चा होगी। 8 अक्टूबर को भारतीय भाषायी सांस्कृतिक चेतना, पूर्वोत्तर की भाषाओं, दक्षिण एशिया में बौद्ध दर्शन, व्यापार-संस्कृति-सतत विकास और बहुभाषी कविता पाठ के सत्र होंगे।
प्रश्न: नालंदा से विश्वरंग भविष्य के भारत को क्या संदेश देना चाहता है?
संतोष चौबे:
नालंदा हमें अतीत में लौटने का निमंत्रण नहीं देता, बल्कि अतीत से संवाद करते हुए भविष्य की ओर बढ़ने का अवसर देता है।
हमें ऐसा भारत चाहिए जो तकनीकी और आर्थिक रूप से आधुनिक हो, लेकिन अपनी भाषाओं, साहित्य, कला और सांस्कृतिक स्मृतियों से कटा हुआ न हो। ऐसा भारत जो विविधता को समस्या नहीं, अपनी शक्ति माने। ऐसा भारत जहां विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान न हों, बल्कि ज्ञान की विभिन्न धाराओं के बीच संवाद के केंद्र बनें।
मेरे लिए विश्वरंग का अर्थ भी यही है—अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए दुनिया से संवाद करना।
नालंदा की सबसे बड़ी विरासत शायद उसकी इमारतों में नहीं, उस विचार में है कि ज्ञान यात्रा करता है, संस्कृतियाँ संवाद करती हैं और मनुष्य अपने से भिन्न संसारों को समझकर स्वयं भी विस्तृत होता है। यही विश्वरंग की मूल भावना है और यही इसकी आगे की यात्रा का आधार भी होना चाहिए।
Created On :   5 Oct 2026 7:41 PM IST








