सोलर से सावधान!: मानकों पर नहीं है ध्यान, उपभोक्ता को भुगतना पड़ सकता है खामियाजा, सवाल - हादसा होने पर कौन होगा जिम्मेदार

मानकों पर नहीं है ध्यान, उपभोक्ता को भुगतना पड़ सकता है खामियाजा, सवाल - हादसा होने पर कौन होगा जिम्मेदार
  • सफाई के दौरान डीसी करंट लगने से मौत की संभावना
  • सौर ऊर्जा का उत्पादन कम होना
  • वेंडर्स पर नियंत्रण रखने वाली कोई ठोस एजेंसी नहीं है

Nagpur News. अगर आप अपने घर या दुकान की छत पर सोलर पैनल लगवाने की सोच रहे हैं, तो सावधान हो जाएं! नागपुर जिले में सोलर सिस्टम लगाने वाली कंपनियों की बाढ़ तो आ गई है, लेकिन इनमें से अधिकांश के पास न तो तकनीकी विशेषज्ञता है और न ही प्रशिक्षित इंजीनियर। अधिकांश कंपनियों व वेंडर्स के पास बिजली संबंधी डिप्लोमा या डिग्रीधारी टेक्नीशियन नहीं होने की चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। और तो और, सोलर यूनिट के लिए बिना आईएसआई मार्क वाले उपकरण लगाए जा रहे हैं। ऐसे में हादसा होने पर कौन जिम्मेदार होगा, यह बड़ा सवाल बन गया है।

इन आशंकाओं को जान लीजिए

  • पैनल में क्रैक या खराब वायरिंग : सफाई के दौरान डीसी करंट लगने से मौत की संभावना।
  • गलत एंगल पर पैनल लगाना : सौर ऊर्जा का उत्पादन कम होना।
  • वेंडर्स पर नियंत्रण रखने वाली कोई ठोस एजेंसी नहीं है, इसलिए उपभोक्ता ठगा सा महसूस कर रहा है

नियमों पर अमल नहीं

देखा गया है कि सोलर यूनिट लगाने वाली कंपनी व वेंडर की तरफ से बिजली संबंधी मानकों पर अमल नहीं किया जाता। जानकारों का कहना है कि सोलर सिस्टम इंस्टॉलेशन के वक्त तय इंडियन स्टैंडर्ड के नियमों को पूरा नहीं किया जाता।

उचित निगरानी का अभाव

वायरिंग, पाइपिंग, अर्थिंग व लाइटिंग अरेस्टर में इंडियन स्टैंडर्ड के मानकों का अमल नहीं होता। लाइटिंग अरेस्टर स्ट्रक्चर के ऊपर लगाया जाता है, जो सरासर गलत है। उचित निगरानी नहीं होने से अकुशल लोग बेफिक्र होकर काम कर रहे हैं। खतरा उपभोक्ता को ही भुगतान पड़ेगा।

करंट लगने का खतरा

सोलर पैनल पर धूल बैठती है। कई बार पैनल पर चढ़कर सफाई की जाती है, जो खतरनाक है। पैनल क्रैक हुआ तो डीसी करंट लगने से इंसान की मौत भी हो सकती है। सफाई करने के पहले इनवर्टर बंद करना जरूरी है। इसी तरह सफाई हमेशा सूर्योदय के पहले या सूर्यास्त के बाद ही करनी चाहिए।

पावर जनरेशन में कमी

पावर प्लांट लगानेवाले तकनीकी विशेषज्ञ नहीं होने से कई बार सोलर पैैनल के एंगल बराबर नहीं लगाते। इस कारण पावर जनरेशन में कमी आती है। इसके बाद उपभोक्ता खुद को ठगा महसूस करता है और परेशानी दूर करने के रास्ते तलाशता रहता है।

सब्सिडी आने में लगते हैं दो महीने

सोलर कंपनी व वेंडर सोलर यूनिट लगाने के पहले ही संबंधित उपभोक्ता से पूरी राशि ले लेते हैं। फिर ये राशि बैंक लोन द्वारा या नकदी में पहले ही ले ली जाती है। सोलर यूनिट इंस्टॉल होने के बाद महावितरण का इंजीनियर निरीक्षण करता है। उसकी रिपोर्ट के बाद सब्सिडी मिलती है। सब्सिडी के उपभोक्ता के खाते में पहुंचने में करीब दो महीने या उससे ज्यादा लग जाते हैं। सरकार 3 किलोवॉट तक 78 हजार रुपए सब्सिडी देती है।

पैसे लेकर भाग चुकी हैं कई कंपनियां

जिले में कई कंपनियां व वेंडर सोलर यूनिट के नाम पर लोगों से पैसे लेकर भाग चुकी है। जैसे कंपनी के लोग सोलर के लिए उपभोक्ता से संपर्क करते है। उपभोक्ता 10-20 हजार रुपए का टोकन देता है। किसी कारण वश उपभोक्ता तुरंत सोलर प्लांट लगाने को तैयार नहीं होता। ऐसे समय कंपनी व वेंडर टोकन राशि वापस नहीं करते। कई वेंडर तो टोकन राशि लेने के बाद मुंह नहीं दिखाते। दायित्व तय नहीं होने से इन पर कोई एजेंसी कार्रवाई नहीं करती।

रेवड़ी की तरह बांट रहे वेंडरशिप

अशोक गुप्ता, महावितरण के पूर्व सहायक अभियंता के मुताबिक सोलर यूनिट लगाने वाली कंपनी या वेंडर को सर्टिफाइड इलेक्ट्रिकल कांट्रेक्टर होना चाहिए। उसके पास इलेक्ट्रिकल डिग्री या डिप्लोमा होना ही चाहिए। सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है। बिजली संबंधी तकनीकी ज्ञान नहीं होने से हादसा होने का खतरा बना हुआ है। अकुशल लोगों से अर्थिंग, वायरिंग करना घातक साबित हो सकता है। वेंडर के पास काम करने वाले भी तकनीकी रूप से कुशल लोग होना चाहिए। रेवड़ी की तरह वेंडरशिप बांट रहे हैं। सरकार को इसे बंद करना चाहिए।

लाइसेेंस अनिवार्य करना चाहिए

शशिकांत केवटे, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के मुताबिक सभी वेंडरों के लिए कांट्रैक्टरशिप लाइसेंस अनिवार्य करना चाहिए। वेंडर के पास काम करने वाले भी डिग्री या डिप्लोमा इलेक्ट्रिकल इंजीनियर होना चाहिए। इन्हें बिजली संबंधी मानकों की जानकारी होती है। अकुशल लोगों को बिजली मानकों की जानकारी नहीं होती।


Created On :   20 April 2026 5:36 PM IST

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