सीधी न्यूज: शहर से गायब हो रहे ‘पितरों के संदेशवाहक’

शहर से गायब हो रहे ‘पितरों के संदेशवाहक’
श्राद्ध में कौए का इंतजार,

डिजिटल डेस्क सीधी| श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही घर-घर में पितरों को अर्पित किए जाने वाले भोजन के लिए कौए का इंतजार शुरू हो जाता है। मान्यता है कि कौए के भोजन ग्रहण करने को पितरों तक अर्पण पहुंचने का प्रतीक माना जाता है। लेकिन बदलते शहरी माहौल में कभी आसानी से दिखाई देने वाला कौआ अब कई इलाकों में कम नजर आने लगा है।

कभी सुबह की पहली किरण के साथ घर के छतों और आंगनों में कौओं की कांव-कांव आवाज सुनाई देती थी। श्राद्ध के दिनों में लोग घर की छत पर भोजन की थाली रखकर कौए के आने का इंतजार करते थे। अब स्थिति यह है कि कई परिवारों को घंटों इंतजार के बाद भी कौआ दिखाई नहीं देता। बुजुर्गों के लिए यह बदलाव केवल पक्षी के कम होने की कहानी नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली की याद भी दिलाता है।

एक दिलचस्प घटना यह भी सामने आती है कि कई परिवार श्राद्ध का भोजन छत पर रखकर कौए का इंतजार करते हैं, लेकिन कौए के बजाय कबूतर, मैना या दूसरे पक्षी पहुंच जाते हैं। ऐसे में घर के बुजुर्ग आसपास के पेड़ों और बिजली के तारों पर नजर लगाकर ‘कागा’ के आने की राह देखते रहते हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार कौओं की संख्या में कमी के पीछे भोजन और सुरक्षित ठिकानों में बदलाव, पुराने पेड़ों की कमी, शहरीकरण और कचरा प्रबंधन में बदलाव जैसे कई कारण हैं। कौआ शहर के पारिस्थितिकी तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है और जैविक कचरे को हटाने में उसकी भूमिका रहती है।

आस्था के श्राद्ध में जिस कौए को पितरों का प्रतीक माना जाता है, वही कौआ आज प्रकृति के बदलते संतुलन का भी संकेत दे रहा है। सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ियां जब श्राद्ध की थाली सजाएंगी, तब क्या उन्हें भी ‘कागा’ के आने का इंतजार करना पड़ेगा?


Created On :   26 Sept 2026 7:43 PM IST

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