पुत्रदा एकादशी : इस व्रत को करने से होती है संतान की प्राप्ति, जानें शुभ मुहूर्त

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पुत्रदा एकादशी : इस व्रत को करने से होती है संतान की प्राप्ति, जानें शुभ मुहूर्त
पुत्रदा एकादशी : इस व्रत को करने से होती है संतान की प्राप्ति, जानें शुभ मुहूर्त

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। पुत्रदा एकादशी साल में दो बार मनाई जाती है। इस व्रत के नाम के अनुसार ही इसका फल है। जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती हैं या जिन्हें पुत्र प्राप्ति की कामना हो उन्हें पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस वर्ष पहली एकादशी जनवरी में आई थी, वहीं दूसरी पुत्रदा एकादशी पौष शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को यानी कि रविवार 11 अगस्त को है। मान्‍यता है कि इस व्रत को करने से संतान की प्राप्‍ति होती है और मृत्‍यु के बाद मोक्ष की प्राप्‍ति होती है। आइए जानते हैं इसका महत्व और पूजा विधि...

शुभ मुहूर्त 
एकादशी तिथि प्रारंभ: 10 अगस्‍त 2019 को दोपहर 03 बजकर 39 मिनट से 
एकादशी तिथि समाप्‍त: 11 अगस्‍त 2019 को शाम 04 बजकर 22 मिनट तक 
पारण का समय: 12 अगस्‍त 2019 को सुबह 06 बजकर 24 मिनट से सुबह 08 बजकर 38 मिनट तक 

पुत्रदा एकादशी व्रत नियम
जो जातक एकादशी का व्रत करता है उसे एक दिन पहले ही अर्थात दशमी तिथि की रात्रि से ही व्रत के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए। सुबह सूर्योदय से पहले उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर स्नान करके शुद्ध और स्वच्छ धुले हुए वस्त्र धारण करके श्रीहरि विष्‍णु का ध्यान करना चाहिए। अगर आपके पास गंगाजल है तो पानी में गंगा जल डालकर नहाना चाहिए। पूरे दिन निराहार रहकर संध्या समय में कथा आदि सुनने के बाद फलाहार करें। दूसरे दिन ब्राह्मणों को भोजन तथा दान-दक्षिणा अवश्य देनी चाहिए, उसके बाद भोजन करना चाहिए। इस दिन दीपदान करने का बहुत महत्व है।

पूजा विधि
इस पूजा के लिए श्रीहरि विष्णु की फोटो के सामने दीप जलाकर व्रत का संकल्प लेने के बाद कलश की स्थापना करनी चाहिए। फिर कलश को लाल वस्त्र से बांधकर उसकी पूजा करें। भगवान श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा रखकर उसे स्नानादि से शुद्ध करके नया वस्त्र पहनाएं। इसके बाद धूप-दीप आदि से विधिवत भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा-अर्चना तथा आरती करें और नैवेद्य और फलों का भोग लगाकर प्रसाद वितरण करें। श्रीहरि विष्णु को अपने सामर्थ्य के अनुसार फल-फूल, नारियल, पान, सुपारी, लौंग, बेर, आंवला आदि अर्पित किए जाते हैं। 

व्रत कथा
श्री पद्मपुराण के अनुसार द्वापर युग में महिष्मतीपुरी का राजा महीजित बड़ा ही शांतिप्रिय और धर्म प्रिय था, लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी। राजा के शुभचिंतकों ने यह बात महामुनि लोमेश को बताई तो उन्होंने बताया कि राजन पूर्व जन्म में एक अत्याचारी, धनहीन वैश्य थे। इसी एकादशी के दिन दोपहर के समय वे प्यास से व्याकुल होकर एक जलाशय पर पहुंचे, तो वहां गर्मी से पीड़ित एक प्यासी गाय को पानी पीते देखकर उन्होंने उसे रोक दिया और स्वयं पानी पीने लगे. राजा का ऐसा करना धर्म के अनुरूप नहीं था। अपने पूर्व जन्म के पुण्य कर्मों के फलस्वरूप वे अगले जन्म में राजा तो बने, लेकिन उस एक पाप के कारण संतान विहीन हैं। महामुनि ने बताया कि राजा के सभी शुभचिंतक अगर श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को विधि पूर्वक व्रत करें और उसका पुण्य राजा को दे दें, तो निश्चय ही उन्हें संतान रत्न की प्राप्ति होगी। इस प्रकार मुनि के निर्देशानुसार प्रजा के साथ-साथ जब राजा ने भी यह व्रत रखा, तो कुछ समय बाद रानी ने एक तेजस्वी संतान को जन्म दिया। तभी से इस एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाने लगा।

Created On :   10 Aug 2019 11:49 AM GMT

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