पत्रकारिता विश्वविद्यालय: एमसीयू के पत्रकारिता विभाग में वैश्विक हिंदी पत्रकारिता के अध्येता व साहित्यकार डॉ. जवाहर कर्नावट का विशेष व्याख्यान

एमसीयू के पत्रकारिता विभाग में वैश्विक हिंदी पत्रकारिता के अध्येता व साहित्यकार डॉ. जवाहर कर्नावट का विशेष व्याख्यान
  • प्रवासी भारतीयों ने हिन्दी को नई पहचान दी हैः डॉ. कर्नावट
  • हिंदी पत्रकारिता प्रवासी भारतीयों की पहचान और संघर्ष की आवाज़ बनी
  • वैश्विक जगत में हिन्दी नई पहचान बना रही है
  • पत्रकारिता के शोध की ओर प्रेरित करेगा व्याख्यान -डॉ राखी तिवारी

डिजिटल डेस्क, भोपाल। अख़बार केवल समाचार का माध्यम नहीं रहे हैं, बल्कि समाज को दिशा देने और स्वतंत्रता आंदोलन को गति देने में उनकी अहम भूमिका रही है। भारत से बाहर भी हिंदी पत्रकारिता प्रवासी भारतीयों की पहचान और संघर्ष की आवाज़ बनी। अब ये भारतीय डिजिटल माध्यम से सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कर रहे हैं। वैश्विक जगत में हिन्दी नई पहचान बना रही है।

ये विचार वैश्विक हिंदी पत्रकारिता के अध्येता व साहित्यकार डॉ. जवाहर कर्नावट ने व्यक्त किए। वह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग में “विश्व पटल पर हिंदी पत्रकारिता” विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। डॉ.कर्नावट ने विदेशों में हिंदी पत्रकारिता पर गहन शोध किया है। उन्होंने विदेशों से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के संकलित अंक प्रस्तुत करते हुए इन पर गहन और विस्तृत शोध करने की आवश्यकता प्रतिपादित की। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के दो साल में ही दो सौ साल पूरे होने वाले हैं। इसके साथ ही विदेशों में हिंदी पत्रकारिता 142 साल पुरानी हो रही है। वर्ष 1883 में उप्र के कालाकांकर के राजा रामपाल ने लंदन से हिंदोस्तान अखबार निकाला था। दक्षिण अफ्रीका से 1903 में चार भाषाओं में इंडियन ओपिनियन निकला जिसके संपादक महात्मा गांधी बने। सत्याग्रह शब्द इसी समाचार पत्र के माध्यम से गांधीजी लेकर आए।

डॉ. कर्नावट ने कहा कि आजादी के आंदोलन में विदेशों में अकेले गदर अखबार ने इतनी धूम मचाई थी कि उसका अध्ययन देश की नई पीढ़ी को नई दिशा दे सकता है। 1913 में ग़दर अखबार में अंग्रेज़ी, हिंदी, पंजाबी, बांग्ला आदि भाषाओं में सामग्री छपती थी और इसका ध्येय वाक्य था-कलम की ताक़त तोप की गोली जितना असर करेगी। आपने बताया कि फिजी में दूसरी सरकारी भाषा हिंदी है जहां हिंदी के दैनिक समाचार पत्र भी प्रकाशित होते हैं। यही नहीं, जिन देशों में प्रवासी भारतीय गए,वहां से हिंदी के प्रकाशन किए गए। मारीशस, गुयाना, टोबेगो-त्रिनिदाद आदि में हिंदी बोलने वालों की बड़ी आबादी है। इनमें अब नई हिंदी गढ़ी जा रही है।

डॉ. कर्नावट ने बताया कि डिजिटल युग में प्रवासी भारतीयों ने ऑनलाइन पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी पत्रकारिता को नई ऊर्जा दी है। भारत दर्शन (न्यूज़ीलैंड), साहित्य कुंज (कनाडा), अनुभूति (भारत) और सेतु (अमेरिका) जैसी पत्रिकाएँ इसका उदाहरण हैं। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि जापान के पुस्तकालय में लगभग 80 हज़ार हिंदी पुस्तकें उपलब्ध हैं। रूस में सोवियत भूमि जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। डॉ. कर्नावट ने विदेशों से लाए हस्तलिखित पत्र व पत्रिकाएं भी प्रदर्शित किए।

विभागाध्यक्ष डॉ. राखी तिवारी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि यह व्याख्यान उन्हें वैश्विक दृष्टि देगा और पत्रकारिता के शोध की ओर प्रेरित करेगा। प्रो. शिव कुमार विवेक ने कहा कि डॉ. कर्नावट का कार्य हिंदी पत्रकारिता में शोध के नए आयाम खोलता है।

Created On :   31 Aug 2025 12:59 PM IST

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