Police Firing Rules: प्रदर्शन और आंदोलन में पुलिस कब चला सकती है गोली? कौन देता है फायरिंग का ऑर्डर? जानें क्या कहता है कानून

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। हाल ही में लोकसभा में पब्लिक एग्जामिनेंशन बिल, 2026 पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि जंतर मंतर पर छात्रों के शांतिपूर्ण आंदोलन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ऑर्डर पर पैलेट गन चलाई गई थी। ऐसे में अब राहुल गांधी के इस आरोप ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सवाल है कि आखिर किसके आदेश पर भीड़ या किसी तरह के प्रदर्शन में गोली चलाई जाती है? आइए आज के एक्सप्लेनर में जानते हैं इसका जवाब
इस बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में आ गया कि आखिर किसी प्रदर्शन या दंगे के दौरान पुलिस को गोली चलाने का अधिकार कैसे मिलता है और इसका फैसला कौन करता है। अक्सर लोगों को लगता है कि स्थिति बिगड़ने पर पुलिस अपनी मर्जी से गोली चला सकती है, लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी तरह की फायरिंग के लिए कानून में साफ नियम बनाए गए हैं। पुलिस को कई तय प्रक्रियाओं का पालन करना पड़ता है और गोली चलाना हमेशा आखिरी विकल्प माना जाता है।
यह भी पढ़े -सीएम देवेंद्र फडणवीस ने परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर से की मुलाकात, विज्ञान और टेक्नोलॉजी पर चर्चा
गैरकानूनी भीड़ होने पर क्या होता है?
अगर किसी जगह पर ऐसी भीड़ इकट्ठा हो जाती है जिसे कानून के मुताबिक गैरकानूनी माना जाता है और उससे शांति व्यवस्था बिगड़ने का खतरा होता है, तो सबसे पहले उस भीड़ को वहां से हटने का आदेश दिया जाता है। यह आदेश कार्यपालिका मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी या उससे वरिष्ठ अधिकारी दे सकते हैं। यदि चेतावनी देने के बाद भी लोग वहां से नहीं हटते और माहौल बिगड़ता जाता है, तब पुलिस को हालात संभालने के लिए जरूरी बल इस्तेमाल करने की अनुमति मिल सकती है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुलिस सीधे गोली चलाने लगे।
गोली चलाने का फैसला कौन करता है?
खैर, सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर फायरिंग का आदेश कौन दे सकता है। अगर मौके पर कार्यपालिका मजिस्ट्रेट मौजूद हैं, तो पुलिस अपने स्तर पर गोली चलाने का फैसला नहीं ले सकती। स्थिति को समझने के बाद मजिस्ट्रेट ही यह तय करते हैं कि हथियार का इस्तेमाल करना जरूरी है या नहीं। सामान्य हालात में आदेश लिखित रूप में दिया जाता है, जबकि बेहद आपात स्थिति में मौखिक आदेश भी दिया जा सकता है। अगर किसी वजह से मौके पर कोई मजिस्ट्रेट मौजूद नहीं है और अचानक हालात बेहद हिंसक हो जाते हैं, तब वहां मौजूद सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी यह फैसला ले सकता है। इसमें थाना प्रभारी, पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपायुक्त या उनके बराबर के अधिकारी शामिल हो सकते हैं। लेकिन यहां भी नियम यही है कि बाकी सभी उपाय नाकाम होने के बाद ही गोली चलाने पर विचार किया जाता है।
आत्मरक्षा में क्या है नियम?
कानून पुलिस और आम नागरिक दोनों को आत्मरक्षा का अधिकार देता है। अगर किसी पुलिसकर्मी या किसी दूसरे व्यक्ति की जान पर सीधा खतरा हो और सामने वाला जानलेवा हमला कर रहा हो या गंभीर चोट पहुंचाने की कोशिश कर रहा हो, तो ऐसी स्थिति में अपनी जान बचाने के लिए घातक बल का इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अलग से किसी आदेश का इंतजार करना जरूरी नहीं होता, क्योंकि यह आत्मरक्षा के दायरे में आता है।
यह भी पढ़े -पीएम मोदी ने अरुणाचल और नगालैंड के सांसदों को दिया भरोसा, बाढ़ से निपटने में केंद्र देगा पूरा सहयोग
पुलिस सीधे फायरिंग क्यों नहीं कर सकती?
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को एक तय प्रक्रिया अपनानी होती है। उद्देश्य यह होता है कि कम से कम बल का इस्तेमाल हो और लोगों की जान बचाई जा सके। आमतौर पर सबसे पहले लोगों को साफ शब्दों में चेतावनी दी जाती है कि वे वहां से हट जाएं। जरूरत पड़ने पर भीड़ को गैरकानूनी घोषित किया जाता है। इसके बाद पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। अगर हालात फिर भी नहीं संभलते तो रबर की गोली या दूसरे गैर-घातक साधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन सभी उपायों के बाद भी अगर हिंसा नहीं रुकती और लोगों की जान को गंभीर खतरा बना रहता है, तभी फायरिंग पर विचार किया जाता है।
असली गोली चलाने से पहले भी मिलती है चेतावनी
जब हालात बेहद गंभीर हो जाते हैं, तब भी पुलिस का पहला प्रयास लोगों को आखिरी बार चेतावनी देना होता है। कई मामलों में चेतावनी के तौर पर हवा में गोली चलाई जा सकती है, ताकि भीड़ पीछे हट जाए और असली फायरिंग की नौबत न आए। अगर इसके बावजूद भी हिंसा जारी रहती है और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता, तभी नियंत्रित तरीके से असली गोली चलाई जाती है।
फायरिंग के दौरान भी होते हैं सख्त नियम
गोली चलाने की अनुमति मिलने का मतलब यह नहीं होता कि अंधाधुंध फायरिंग की जाए। पुलिस के लिए तय दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि कोशिश ऐसी होनी चाहिए जिससे हिंसक व्यक्ति को रोका जा सके, न कि उसकी जान ली जाए। इसी वजह से आमतौर पर कमर के नीचे निशाना लगाने की सलाह दी जाती है ताकि पैरों में गोली लगने से व्यक्ति को काबू किया जा सके। इसके अलावा आदेश में यह भी तय किया जा सकता है कि कितनी गोलियां चलाई जाएंगी। जैसे ही भीड़ तितर-बितर हो जाए या खतरा खत्म हो जाए, फायरिंग तुरंत रोकना जरूरी होता है।
कानून का मकसद क्या है?
पूरी व्यवस्था का मकसद यही है कि कानून-व्यवस्था भी बनी रहे और लोगों की जान भी सुरक्षित रहे। इसलिए पुलिस को हमेशा कम से कम बल इस्तेमाल करने का निर्देश दिया जाता है। गोली चलाना किसी भी कार्रवाई का पहला नहीं बल्कि आखिरी कदम माना जाता है। यही वजह है कि किसी प्रदर्शन, दंगे या हिंसक घटना के दौरान फायरिंग का फैसला कई कानूनी प्रक्रियाओं और जिम्मेदार अधिकारियों की मंजूरी के बाद ही लिया जाता है। केवल ऐसी स्थिति में, जब किसी की जान पर तत्काल खतरा हो और आत्मरक्षा के अलावा कोई दूसरा रास्ता न बचा हो, तब पुलिस बिना अलग आदेश का इंतजार किए भी कार्रवाई कर सकती है।
यह भी पढ़े -हॉकी टीम की जर्सी का रंग तकनीकी वजहों से बदला, कोई राजनीतिक दबाव नहीं दिलीप तिर्की
क्या गृह मंत्री देते हैं फायरिंग के आदेश?
केंद्रीय गृह मंत्री पुलिस को गोली चलाने का आदेश नहीं देते। भारत की व्यवस्था में भीड़ या प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का फैसला किसी मंत्री का नहीं होता। यह अधिकार मौके पर मौजूद स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों, जैसे जिला मजिस्ट्रेट (डीएम), उप जिला मजिस्ट्रेट (एसडीएम) या कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास होता है। हालात को देखते हुए वही तय करते हैं कि गोली चलाने की जरूरत है या नहीं। असल में राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल किया कि था क्या केंद्रीय गृह मंत्री ये जानते थे कि छात्रों पर पैलेट गन चलने वाली है या उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी।
Created On :   30 July 2026 8:56 PM IST










