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आज है सिक्खों के नौवें धर्म गुरु तेगबहादुर साहब की जयंती

April 24th, 2019 15:38 IST

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सिख धर्म के नौवें धर्म-गुरु तेगबहादुर जी का जन्म वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी को संवत 1678 में पंजाब के अमृतसर शहर में गुरु हरगोबिन्द साहिब के घर में हुआ था। वैशाख कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि इस बार 24 अप्रैल को पड़ रही है। इस दिन उनका जन्मोत्सव देश के अनेक स्थानों पर बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। गुरु तेगबहादुर जी का जन्मोत्सव ‘गुरु तेग बहादुर जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर देश-विदेश के गुरुद्वारों में भव्य एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ किया जाता है एवं सामूहिक भोज-लंगरादी का आयोजन किया जाता है।

गुरु तेगबहादुर साहब जी का जीवन
गुरु हरकिशन साहब जी ने 30 मार्च 1664 को दिल्ली में तेग बहादुर को ज्योति-जोत समाते समय सिक्खों के नौवें धर्म-गुरु के पद पर नियुक्त किया था। गुरु तेगबहादुर साहब जी को धर्म और आदर्शों के लिए शहीद होने वाले महापुरुषों के रूप में जाना जाता है। गुरु तेगबहादुर साहब जी गुरुनानक जी द्वारा बताए गये मार्ग का सदा अनुसरण करते रहे। उन्होने काश्मीरी पण्डितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का विरोध किया। इस्लाम स्वीकार न करने के कारण 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हे इस्लाम कबूल करने को कहा परन्तु गुरु तेगबहादुर साहब जी ने कहा सीस कटा सकते है केश नहीं। तब औरंगजेब ने गुरुजी का सिर सरेआम कटवा दिया।

ईस्वी सन के अनुसार 11 नवंबर, 1675 में दिल्ली के चांदनी चौक में एक काज़ी ने फ़तवा पढ़ा और जल्लाद जलालदीन ने अपनी तलवार से गुरू साहिब का शीश धड़ से अलग कर दिया। किन्तु गुरु तेग़ बहादुर ने अपने मुंह से 'सी' तक नहीं निकला। आपके अद्वितीय बलिदान के बारे में गुरु गोविन्दसिंह जी ने ‘बिचित्र नाटक में लिखा है-

तिलक जंञू राखा प्रभ ताका॥ कीनो बडो कलू महि साका॥
साधन हेति इती जिनि करी॥ सीसु दीया परु सी न उचरी॥
धरम हेत साका जिनि कीआ॥ सीसु दीआ परु सिररु न दीआ॥ (दशम ग्रंथ)

आततायी शासक की धर्म विरोधी और वैचारिक स्वतंत्रता का दमन करने वाली नीतियों के विरुद्ध गुरु तेग़ बहादुरजी का बलिदान एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक घटना है। यह गुरुजी के निर्भय आचरण, धार्मिक अडिगता और नैतिक उदारता का एक उच्चतम उदाहरण है। गुरुजी मानवीय धर्म एवं वैचारिक स्वतंत्रता के लिए अपनी महान शहादत देने वाले एक क्रांतिकारी युग पुरुष हैं।

गुरुद्वारा शीशगंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब उन स्थानों का याद दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की निर्मम हत्या की गयी और जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया। विश्व में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग़बहादुर साहब जी का स्थान खास स्थान है।

गुरुजी ने अपने समय में धर्म के सत्य ज्ञान के प्रचार-प्रसार एवं लोक कल्याणकारी कार्य के लिए कई स्थानों की यात्रा की। आनंदपुर से कीरतपुर, रोपड, सैफाबाद के लोगों को संयम तथा सहज मार्ग का पाठ पढ़ाते हुए वे खिआला (खदल) पहुँचे। यहाँ से गुरुजी धर्म के सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश देते हुए दमदमा साहब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे। कुरुक्षेत्र से यमुना किनारे होते हुए कड़ामानकपुर पहुँचे और यहाँ साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया।

यहाँ से गुरुजी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहाँ उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, उन्नयन के लिए कई रचनात्मक कार्य किए। आध्यात्मिक स्तर पर धर्म का सच्चा ज्ञान दिया। सामाजिक स्तर पर चली आ रही रूढ़ियों, अंधविश्वासों की कटु आलोचना कर नए सहज जनकल्याणकारी आदर्श स्थापित किए। उन्होंने प्राणी सेवा एवं परोपकार के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि लोक परोपकारी ऐसे अनेक कार्य किए।

उनका कहना था- "धरम हेत साका जिनि कीआ, सीस दीआ पर सिरड न दीआ।"

ऐसे वीर महापुरुष को सादर नमन!

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