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संकष्टी गणेश चतुर्थी: जानें व्रत कथा और पूजन विधि  


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली।वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी गणेश चतुर्थी कहा जाता है। गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है। परन्तु वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत, वैशाख संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत होता है, जो आज सोमवार को है। आपको बता दें भविष्य पुराण में भी कहा गया है कि जब मन संकटों से घिरा हुआ लगे तब गणेश चतुर्थी का व्रत करें। इस व्रत से समस्त कष्ट दूर होते हैं और धर्म, अर्थ, मोक्ष, विद्या, धन व आरोग्य की प्राप्ति होती है।

व्रत पूजन विधि 
वैशाख माह की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को गणेशजी की पूजा की जाती है। इस दिन प्रात:काल उठकर स्नान कर गणेश जी के सामने दोनों हाथ जोड़कर मन, वचन, कर्म से इस व्रत का संकल्प इस प्रकार करें :-

हे गणेशजी, मैं आपका चतुर्थी व्रत करने का संकल्प लेता हूं। आज मैं सारा दिन निराहार रहकर आपका ध्यान करूंगा एवं संध्या को आपका पूजन कर चन्द्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही भोजन ग्रहण करूंगा। 

संकल्प के बाद पूरे दिन गणेशजी का ध्यान करें। संध्या काल में स्नान कर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर विधिपूर्वक धूप, दीप, अक्षत, चंदन, सिंदूर, नैवेद्य से गणेशजी का पूजन करें। पूजन के बाद चंद्रमा का पूजन करें एवं जलार्घ्य अर्पित करें। फिर वैशाख चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। पूजन के बाद कमलगट्टे के हलवे से व्रत खोलें।

वैशाख संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा 
एक बार पार्वती जी ने गणेशजी से पूछा की वैशाखमाह के कृष्ण पक्ष की जो संकटा नामक चतुर्थी कही गई है, उस दिन कोन से गणेश का किस विधि से पूजन करना चाहिए एवं उस दिन भोजन में क्या ग्रहण करना चाहिए ? तब गणेश जी ने उत्तर में कहा की हे जगत माता! वैशाख कृष्ण चतुर्थी के दिन व्रत करना चाहिए। उस दिन ‘व्रकतुंड’ नामक गणेश की पूजा कर भोजन में कमलगट्टे का हलवा आहार में लेना चाहिए। हे जग जननी! द्वापर युग में राजा युधिष्ठिर ने इस प्रश्न को पूछा था तब उत्तर में भगवान कृष्ण ने कहा था की  मैं उसी व्रत का वर्णन करता हूं। आप श्रद्धापूर्वक सुने।

श्रीकृष्ण बोले-हे राजा युधिष्ठिर! इस कल्याण दात्री चतुर्थी का व्रत जिसने किया और उसे जो फल प्राप्त हुआ, मैं उसे कह रहा हूं। प्राचीन काल में रंतिदेव नामक प्रतापी राजा हुए, जो कि शत्रुओं के विनाशक थे। उनकी मित्रता यम, कुबेर, इन्द्रादिक देवों से थी। उन्हीं के राज्य में धर्मकेतु नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी दो स्त्रियां थी- एक का नाम सुशीला और दूसरी का नाम चंचला था। सुशीला नित्य ही कोई-न-कोई व्रत किया करती थी। फलतः उसका शरीर बहुत दुर्बल हो गया था और इसके विपरीत चंचला कभी भी कोई व्रत-उपवास नहीं करती थी अपितु भरपेट भोजन करती थी।

इधर सुशीला को सुन्दर लक्षणों वाली एक कन्या हुई और उधर चंचला को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह देखकर चंचला बारम्बार सुशीला को ताना देने लगी। अरे सुशीला! तूने इतना व्रत उपवास करके शरीर को जर्जर बना डाला, फिर भी एक कन्या को जन्म दिया। मुझे देख, मैं कभी व्रत के चक्कर में न पड़कर हष्ट-पुष्ट हूं और वैसे ही बालक को जन्म दिया है। 

अपनी सौत का व्यंग्य सुशीला के हृदय में चुभने लगा। वह विधिवत गणेशजी की उपासना करने लगी। जब सुशीला ने भक्तिभाव से संकटनाशक गणेश चतुर्थी का व्रत किया तो रात्रि में गणेशजी ने उसे दर्शन दिया। गणेशजी ने कहा की हे सुशीले! तेरी साधना से हम अत्यधिक संतुष्ट हैं। मैं तुम्हें वरदान दे रहा हूं कि तेरी कन्या के मुख से निरंतर मोती और मूंगा प्रवाहित होते रहेंगे।

हे कल्याणी! इससे तुझे सदा प्रसन्नता रहेगी। हे सुशीले! तुझे वेद शास्त्र वेत्ता एक पुत्र भी उत्पन्न होगा। इस प्रकार का वरदान देकर गणेश जी अंतर्ध्यान हो गए। वरदान प्राप्ति के बाद से ही उस कन्या के मुंख से सदैव मोती और मूंगा झड़ने लगे। कुछ दिनों के बाद सुशीला को एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। कालान्तर में उनके पति धर्मकेतु का स्वर्गवास हो गया। उसकी मृत्यु के बाद चंचला घर का सारा धन लेकर दूसरे घर में जाकर रहने लगी, परन्तु सुशीला पतिगृह में रहकर ही पुत्र और पुत्री का पालन पोषण करने लगी।

चंचाल हाथ जोड़कर कहने लगी-हे बहिन सुशीले! मैं बहुत ही पापिन और दुष्टा हूं। आप मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये। इसके बाद चंचला ने भी उस कष्ट निवारक पुण्यदायक संकट नाशक गणेशजी के व्रत को करने लगी। गणेशजी कहते हैं कि हे देवी! पूर्वकाल का पूरा वृतांत आपको सुना दिया। इस लोक में इससे श्रेष्ठ विघ्नहरण कोई व्रत नहीं हैं। श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि हे धर्मराज! आप भी विधिपूर्वक गणेश जी का व्रत कीजिए। इस व्रत को करने से आपके शत्रुओं का नाश होगा तथा अष्टसिद्धियां और नवनिधियां आपके सामने करबद्ध होकर खड़ी रहेंगी और थोड़े समय में ही आप अपने राज्य को भी प्राप्त कर लेंगे।

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