आयोग के पास घरेलू हिंसा के मामले सबसे ज्यादा, छोटी शिकायतें थाने में ही सुलझाए पुलिस बबीता चौहान

आयोग के पास घरेलू हिंसा के मामले सबसे ज्यादा, छोटी शिकायतें थाने में ही सुलझाए पुलिस बबीता चौहान
उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबीता चौहान ने कहा कि महिलाओं से जुड़ी शिकायतों में आज भी घरेलू हिंसा के मामले सबसे अधिक सामने आ रहे हैं। उन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई ऐसे छोटे मामले भी आयोग तक पहुंच रहे हैं, जिन्हें पुलिस थोड़ी संवेदनशीलता और तत्परता दिखाकर थाने में ही सुलझा सकती है। उन्होंने महिलाओं और उनके परिवारों से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने की अपील करते हुए भरोसा दिलाया कि आयोग के पास आने वाली हर शिकायत का निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा।

आगरा, 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष बबीता चौहान ने कहा कि महिलाओं से जुड़ी शिकायतों में आज भी घरेलू हिंसा के मामले सबसे अधिक सामने आ रहे हैं। उन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि कई ऐसे छोटे मामले भी आयोग तक पहुंच रहे हैं, जिन्हें पुलिस थोड़ी संवेदनशीलता और तत्परता दिखाकर थाने में ही सुलझा सकती है। उन्होंने महिलाओं और उनके परिवारों से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने की अपील करते हुए भरोसा दिलाया कि आयोग के पास आने वाली हर शिकायत का निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा।

बबीता चौहान ने कहा कि महिलाओं से जुड़े मामलों का प्रतिशत देखें तो घरेलू हिंसा की शिकायतें सबसे ज्यादा हैं। हालांकि, उन्हें शिकायतों के स्वरूप में एक बदलाव भी दिखाई दे रहा है। उन्होंने बताया कि कई महिलाएं ऐसी हैं जो मुकदमा नहीं लड़ना चाहतीं और न ही कोई कानूनी कार्रवाई चाहती हैं। वे केवल चाहती हैं कि उनका समझौता करा दिया जाए या उन्हें उस व्यक्ति से छुटकारा दिला दिया जाए, जिससे वे परेशान हैं।

आयोग की कार्रवाई में देरी के सवाल पर अध्यक्ष ने कहा कि आयोग की ओर से शिकायतों के निस्तारण में देरी नहीं की जा रही है। उन्होंने कहा कि करीब 100 या उससे अधिक आवेदन आए हैं और हर आवेदन का शत-प्रतिशत निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा। मामला किसी भी स्तर का हो, आयोग अपनी जिम्मेदारी निभाएगा। पुलिस की ओर से कार्रवाई में देरी की बात स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि कई शिकायतें इतनी छोटी होती हैं कि पुलिस चाहे तो उन्हें कुछ ही मिनटों में सुलझा सकती है, लेकिन लापरवाही के कारण पीड़ित महिलाओं को आयोग तक पहुंचना पड़ता है। पुलिस की अपनी जांच प्रक्रिया होती है और जांच में समय लगता है, लेकिन पीड़ित व्यक्ति तत्काल न्याय की उम्मीद करता है।

उन्होंने पुलिस से अपील की कि थाने पहुंचने वाले व्यक्ति की बात कम से कम ध्यान से सुनें और उसे भरोसा दिलाएं। कई बार पीड़ित की बात दो मिनट सुन लेने से ही उसे राहत मिलती है और उसे लगता है कि उसकी शिकायत पर कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि पुलिस को अपना व्यवहार थोड़ा बदलने की जरूरत है। पुलिस अभी पूरी तरह मित्रवत व्यवहार नहीं कर पा रही है। आयोग को अधिकारियों और पुलिस का सहयोग मिलता है, लेकिन शिकायतों की संख्या बढ़ने की एक वजह पुलिस स्तर पर सुनवाई न होना भी है।

महिलाओं की बढ़ती जागरूकता का जिक्र करते हुए बबीता चौहान ने कहा कि अब महिलाओं को हेल्पलाइन नंबरों और मिशन शक्ति के माध्यम से उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी है, इसलिए वे छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर भी थाने या आयोग पहुंच जाती हैं। उन्होंने कहा कि आयोग और पुलिस, दोनों स्तरों पर आने वाली शिकायतों का निस्तारण किया जाता है।

उन्होंने महिलाओं के साथ उनके माता-पिता और परिवारों को भी जागरूक होने की सलाह दी। मथुरा में सामने आए एक मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक महिला को ससुराल में गंभीर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उसके मायके वालों ने सामाजिक समझौते के नाम पर उसे वापस ससुराल भेज दिया। दोबारा मारपीट होने पर उसे फिर मायके लाया गया, लेकिन तीसरी बार भी परिवार उसे वापस भेजने के लिए समझौता चाहता था। उन्होंने कहा कि क्या शादी के बाद माता-पिता की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? यदि किसी लड़की को ससुराल में बार-बार प्रताड़ित किया जा रहा है तो परिवार को उसकी स्थिति समझनी चाहिए और जबरदस्ती वापस नहीं भेजना चाहिए।

उन्होंने चार महीने पहले शादी हुई एक अन्य लड़की का उदाहरण देते हुए बताया कि वह इस अवधि में चार बार मायके आ चुकी थी और उसे जबरदस्ती वापस ले जाया जा रहा था। उन्होंने कहा कि लड़कियों को गलत रिश्ते की सजा पूरी जिंदगी नहीं भुगतनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कई मामलों में मुश्किल आने पर बिचौलिये दिखाई नहीं देते, जबकि लड़कियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। उन्होंने माता-पिता से बेटियों का साथ देने और उनके अधिकारों को समझने की अपील की। साथ ही उन्होंने लड़कियों से कहा कि वे जल्दबाजी में फैसले न लें, अपनी जिंदगी के निर्णय सोच-समझकर करें और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें।

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