चेट्ट्येनचेरी महेश्वर मंदिर यहां शक्ति के रूप में भगवान शिव पूजित, देवताओं के अवतार मनुष्य

चेट्ट्येनचेरी महेश्वर मंदिर  यहां शक्ति के रूप में भगवान शिव पूजित, देवताओं के अवतार मनुष्य
देवाधिदेव महादेव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है, जबकि कुछ स्थानों पर उन्हें साक्षात और स्वयंभू प्रतिमा के रूप में भी पूजा जाता है।

नई दिल्ली, 9 अप्रैल (आईएएनएस)। देवाधिदेव महादेव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है, जबकि कुछ स्थानों पर उन्हें साक्षात और स्वयंभू प्रतिमा के रूप में भी पूजा जाता है।

केरल में भगवान शिव को पूजने और उन्हें पाने का तरीका बहुत अलग है, जहां बाबा को जीवंत शक्ति के रूप में पूजा जाता है और उनका अवतार लेने से आशीर्वाद लिया जाता है। यह परंपरा केरल के मुरिंगेरी में स्थित चेट्ट्येनचेरी महेश्वर मंदिर में सालों से चली आ रही है, जहां भक्तों को महादेव साक्षात मनुष्य के रूप में हर साल दर्शन देने के लिए आते हैं।

केरल के कन्नूर में अंचराक्कंडी के पास मुरिंगेरी में स्थित चेट्ट्येनचेरी महेश्वर मंदिर है, जो भगवान शिव को समर्पित स्थानीय लोगों का मंदिर है। माना जाता है कि इस मंदिर में भगवान शिव को नहीं बल्कि उनकी तीव्र और शांत दोनों ऊर्जा को पूजा जाता है। यही कारण है कि यहां अप्रैल के महीने में शक्तिशाली कालरात्रि थेय्यम की परंपरा सालों से निभाई जा रही है।

इस परंपरा में एक अज्ञात व्यक्ति भारी-भरकम मुकुट पहनकर खुद को रंग-बिरंगे रंगों से रंगता है। भगवान शिव का रूप लेने के लिए व्यक्ति घास और पत्तों का भी इस्तेमाल करता है, क्योंकि भगवान शिव अर्धनारीश्वर हैं और मां पार्वती प्रकृति का रूप हैं।

देवता का रूप धारण करके व्यक्ति मध्यरात्रि में दर्शन देता है और क्रोध से भरा नृत्य भी करता है। भक्त थेय्यम में भारी संख्या में जुटते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद लेते हैं। कुछ लोग थेय्यम में देवता बने मनुष्य के सामने अपनी मनोकामना भी बोलते हैं। उन्हें विश्वास है कि सामने खड़ा इंसान भगवान शिव का ही रूप है और उसके अंदर उन्हीं की ऊर्जा है। यह परंपरा जीवंत रंगों और गहरी भक्ति को प्रदर्शित करती है।

चेट्ट्येनचेरी महेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां उनके शांत और शक्तिशाली दोनों रूपों की पूजा की जाती है। मंदिर में नवरात्रि के समय नवरात्रि महोलसवम का आयोजन किया जाता है, जिसमें गणपति होमम और सरस्वती पूजा जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। मंदिर में सहस्र दीपा समर्पणम (एक हजार दीपक जलाना) जलाने की परंपरा भी सालों से निभाई जा रही है। उत्सव का समापन विजयादशमी पर विद्यारंभम के साथ होता है, जहां बच्चों के पठन-पाठन की शुरुआत की जाती है।

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Created On :   9 April 2026 9:43 PM IST

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