'फ्लोरीकल्चर मिशन' से डोडा की महिलाओं को मिल रही नई पहचान, गेंदे की खेती से बढ़ी आय और आत्मनिर्भरता

फ्लोरीकल्चर मिशन से डोडा की महिलाओं को मिल रही नई पहचान, गेंदे की खेती से बढ़ी आय और आत्मनिर्भरता
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की 'फ्लोरीकल्चर मिशन' पहल जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम बनकर उभरी है। भद्रवाह के सार्तिंगल गांव और अथखर घाटी क्षेत्र में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ी महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) अब व्यावसायिक फूल खेती के जरिए न केवल अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं, बल्कि कृषि क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका भी निभा रही हैं।

नई दिल्ली/डोडा, 1 नवंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की 'फ्लोरीकल्चर मिशन' पहल जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का मजबूत माध्यम बनकर उभरी है। भद्रवाह के सार्तिंगल गांव और अथखर घाटी क्षेत्र में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ी महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) अब व्यावसायिक फूल खेती के जरिए न केवल अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं, बल्कि कृषि क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका भी निभा रही हैं।

डोडा जिले की महिलाओं ने सीएसआईआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिव मेडिसिन (सीएसआईआर-आईआईआईएम) के सहयोग से बंजर भूमि पर गेंदे (मैरीगोल्ड) की खेती शुरू की है, जिसका नेतृत्व एनआरएलएम की क्लस्टर कोऑर्डिनेटर नादिया फारूक कर रही हैं।

उन्होंने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय की फ्लोरीकल्चर मिशन योजना के तहत महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री, आधुनिक कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया।

नादिया फारूक ने बताया कि शुरुआत में उनके क्लस्टर की पांच महिलाओं ने परीक्षण के तौर पर बंजर भूमि पर गेंदे की खेती शुरू की थी, लेकिन यह प्रयोग बेहद सफल साबित हुआ। पिछले डेढ़ महीने से वे जम्मू के सप्लायर्स को फूल बेच रही हैं और इससे उन्हें अच्छी आमदनी हो रही है।

उन्होंने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, "पहले हम पारंपरिक खेती (मक्के) करते थे, फिर हम आईआईआईएम के रूरल ऑफिसर से मिले और उन्होंने हमें गेंदे की खेती करने के लिए मोटीवेट किया। इसके बाद हमने उन्हीं से बीज लेकर इसकी खेती शुरू की।"

इसके साथ ही उन्होंने आगे कहा, "इस फेस्टिव सीजन नवरात्रि में इनसे हमें अच्छी-खासी इनकम आई।" उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में यह 30-35 रुपए प्रति किलो बिकता है, लेकिन फेस्टिव सीजन में डिमांड ज्यादा होने के कारण यह 60 रुपए प्रति किलो तक भी बिका, जिससे हमें अच्छी कमाई हुई।

उन्होंने आगे कहा, "इसके साथ ही हम अपने क्षेत्र के लोगों को भी जागरूक कर रहे हैं कि वे अपनी पारंपरिक खेती के साथ गेंदे की भी खेती करें ताकि वे आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें। इसके लिए हम उन्हें प्रशिक्षण भी देते हैं, साथ ही बीज और आर्थिक मदद भी उपलब्ध कराते हैं।"

इस पहल से जुड़ी रानी नाम की एक महिला किसान स्थानीय स्तर पर महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई हैं। 'उम्मीद योजना' से पिछले आठ वर्षों से जुड़ी रानी ने बताया कि उन्होंने पहले एक छोटे कारोबार से अपनी उद्यमशील यात्रा शुरू की थी और पिछले तीन वर्षों से गेंदे की खेती भी कर रही हैं।

रानी ने कहा, "अब तक वह बाजार में 3 लाख रुपए से अधिक मूल्य के गेंदे के फूल बेच चुकी हैं, जिससे उनके परिवार को अतिरिक्त आय का मजबूत स्रोत मिला है। उन्होंने कहा कि फ्लोरीकल्चर विभाग की ओर से बीज, प्रशिक्षण और नियमित जागरूकता कार्यक्रमों का लाभ भी मिल रहा है, जिससे खेती की गुणवत्ता और उत्पादन में सुधार हुआ है।"

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