गुजरात के किसान ने चार एकड़ हल्दी को पाउडर और अचार में बदलकर 11 लाख रुपए की कमाई की

गुजरात के किसान ने चार एकड़ हल्दी को पाउडर और अचार में बदलकर 11 लाख रुपए की कमाई की
सुरेंद्रनगर जिले के एक 70 वर्षीय किसान ने चार एकड़ हल्दी की खेती को कच्चे उत्पाद के रूप में बेचने के बजाय पाउडर, अचार और अन्य उत्पादों में संसाधित करके लगभग 10-11 लाख रुपए की वार्षिक आय में परिवर्तित कर दिया है।

गांधीनगर, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। सुरेंद्रनगर जिले के एक 70 वर्षीय किसान ने चार एकड़ हल्दी की खेती को कच्चे उत्पाद के रूप में बेचने के बजाय पाउडर, अचार और अन्य उत्पादों में संसाधित करके लगभग 10-11 लाख रुपए की वार्षिक आय में परिवर्तित कर दिया है।

वधवान तालुका के वडोद गांव के कालूभाई पटेल के पास 10 एकड़ जमीन है और वे पिछले 13-14 वर्षों से चार एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।

कागवड में एक कृषि मेले में एक किसान को प्राकृतिक तरीकों से हल्दी की खेती करते देखकर उन्हें प्राकृतिक खेती अपनाने की प्रेरणा मिली। पटेल ने शुरुआत में एक एकड़ बंजर भूमि पर हल्दी की खेती की, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर चार एकड़ कर दिया।

बाद में उन्होंने लगभग 5 लाख रुपए की लागत से एक घर-आधारित प्रसंस्करण इकाई स्थापित की, जिसमें स्टीम बॉयलर, पॉलिशिंग मशीन और पल्वराइजर जैसी सुविधाएं हैं।

बागवानी विभाग ने उन्हें इस इकाई के लिए 2.5 लाख रुपए की सहायता प्रदान की। पटेल हल्दी को पानी में उबालने के बजाय भाप में पकाते हैं, उनका कहना है कि इससे इसके लाभकारी और औषधीय गुण बरकरार रहते हैं।

हल्दी को फिर लगभग एक महीने तक सुखाया जाता है, उसके बाद साफ करके पाउडर बनाया जाता है। वे हरी हल्दी का अचार और हल्दी का माउथ फ्रेशनर भी बनाते हैं।

अपने परिवार की मदद से, वे घर पर ही उत्पादों की पैकिंग करते हैं और उन्हें 'शक्ति ऑर्गेनिक' ब्रांड नाम से बेचते हैं।

बाजार में कच्ची हल्दी लगभग 150 रुपए प्रति किलो बिकती है, जबकि पटेल अपनी हल्दी पाउडर 350 रुपए प्रति किलो और हरी हल्दी का अचार 440 रुपए प्रति किलो बेचते हैं।

उनके जीओपीसीए प्रमाणित जैविक उत्पाद विज्ञापन के बजाय मुख्य रूप से लोगों के बीच चर्चा के माध्यम से बिकते हैं।

इस मूल्यवर्धन के माध्यम से, पटेल चार एकड़ में उगाई गई हल्दी से सालाना लगभग 10-11 लाख रुपए कमाते हैं। वे फसल विविधता भी अपनाते हैं, आठ महीने की हल्दी की फसल के बाद मूंग, तिल और बाजरा जैसी कम अवधि की फसलें उगाते हैं।

शेष छह एकड़ में, वे कपास के साथ अरहर की सह-फसल उगाते हैं। अरहर मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाती है, जिससे यूरिया की आवश्यकता कम हो जाती है, जबकि पटेल पोटेशियम के स्रोत के रूप में आक के पत्तों से तैयार घोल का उपयोग करते हैं।

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Created On :   7 Oct 2026 10:59 PM IST

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