सिंध बनाम सैन्य प्रतिष्ठान टकराव गहराया, पाकिस्तान के टूटने का खतरा रिपोर्ट

सिंध बनाम सैन्य प्रतिष्ठान टकराव गहराया, पाकिस्तान के टूटने का खतरा  रिपोर्ट
पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान लंबे समय से पुनर्गठन के नाम पर प्रांतों को विभाजित करने की कोशिश करता रहा है। आलोचकों का आरोप है कि यह कदम केंद्रीकृत सत्ता की लालसा से प्रेरित है, ताकि संसाधन-संपन्न क्षेत्रों में रहने वाली विभिन्न राष्ट्रीयताओं और उप-राष्ट्रीयताओं को अपने नियंत्रण में रखा जा सके।

यरुशलम, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान लंबे समय से पुनर्गठन के नाम पर प्रांतों को विभाजित करने की कोशिश करता रहा है। आलोचकों का आरोप है कि यह कदम केंद्रीकृत सत्ता की लालसा से प्रेरित है, ताकि संसाधन-संपन्न क्षेत्रों में रहने वाली विभिन्न राष्ट्रीयताओं और उप-राष्ट्रीयताओं को अपने नियंत्रण में रखा जा सके।

पुरस्कार विजेता पत्रकार और मानवाधिकार रक्षक हसन मुजतबा ने 'द टाइम्स ऑफ इजरायल' में लिखा, "पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान और सिंध की राजनीतिक नेतृत्व व्यवस्था, जिसका नेतृत्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उनकी पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) कर रही है, प्रांतों के पुनर्गठन और कराची को अलग प्रशासनिक इकाई बनाने के प्रस्तावित मुद्दे पर गहरे मतभेदों में उलझे हुए हैं। यह बढ़ती खाई पाकिस्तान के विघटन का खतरा पैदा कर सकती है और 1971 में बांग्लादेश के गठन जैसी स्थिति की पुनरावृत्ति का कारण बन सकती है।"

उन्होंने कहा, “यदि सैन्य प्रतिष्ठान अपनी जिद पर अड़ा रहा और देश के ऐतिहासिक प्रांतों को काटकर एक दर्जन से अधिक हिस्सों में बांटने की दिशा में बढ़ता रहा, तो अभूतपूर्व और विनाशकारी नरसंहार जैसी स्थिति पैदा होने की आशंका है। इस विभाजन को छिपाने के लिए प्रतिष्ठान इन खंडित क्षेत्रों को ‘प्रशासनिक इकाइयों’ का नाम दे रहा है, लेकिन वास्तविकता में ये पाकिस्तान के अत्यधिक कमजोर हो चुके स्वरूप के नए प्रांतों के रूप में काम करेंगे, बशर्ते कि राज्य इस तरह की कठोर और जबरन की गई ‘सर्जरी’ के बाद अस्तित्व में रह भी सके,”

हसन मुजतबा के अनुसार, पाकिस्तान का 18वां संवैधानिक संशोधन सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के तहत सिंध और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच मुख्य टकराव का बिंदु बनकर उभरा है, जिसमें सेना प्रस्तावित 28वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से इन सुरक्षाओं को रद्द करने पर जोर दे रही है, जो प्रांतों की वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता को काफी हद तक खत्म कर सकता है।

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि राष्ट्रपति के रूप में जरदारी के पहले कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान की सीनेट और नेशनल असेंबली दोनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित 18वें संशोधन ने प्रांतीय शक्तियों का काफी विस्तार किया और केंद्रीय सत्ता पर अंकुश लगाया।

मुजतबा ने कहा, "जनरलों की निराशा का मूल कारण राष्ट्रीय वित्त आयोग (एनएफसी) पुरस्कार है, जो गारंटी देता है कि संघीय राजस्व का एक बड़ा हिस्सा सीधे प्रांतों में वितरित किया जाता है। सेना, जो पहले से ही रक्षा के नाम पर राष्ट्रीय बजट के एक बड़े हिस्से की खपत करती है, इन एनएफसी फंडों को वापस संघीय खजाने में मोड़ना चाहती है।"

उन्होंने कहा, "राजनीतिक प्रतिनिधियों और समर्थक मीडिया हस्तियों के माध्यम से प्रतिष्ठान राष्ट्रपति जरदारी पर 18वें संशोधन पर समझौता करने और प्रांतीय पुनर्गठन की उनकी साजिशों का समर्थन करने के लिए तीव्र दबाव डालना जारी रखे हुए है। अनुभवी राजनीतिक विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि इन मांगों के आगे झुकना सिंध में पीपीपी की अपार लोकप्रियता और वोट बैंक के लिए मौत के वारंट पर हस्ताक्षर करने जैसा होगा, जो लगभग दो दशकों से पार्टी का मुख्य सत्ता गढ़ रहा है।"

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की आंतरिक सीमाओं को आक्रामक रूप से फिर से खींचकर पाकिस्तानी सेना देश के संभावित विघटन की अध्यक्षता करती हुई प्रतीत हो रही है।

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Created On :   2 Oct 2026 11:18 PM IST

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