जम्मू 'उम्मीद' पहल के तहत महिला उद्यमी स्थानीय व्यंजनों को दे रहीं बढ़ावा

जम्मू उम्मीद पहल के तहत महिला उद्यमी स्थानीय व्यंजनों को दे रहीं बढ़ावा
जम्मू के बीचों-बीच, जहां परंपरा और संस्कृति रोजमर्रा की जिंदगी में गहराई से जुड़ी हुई है, वहां खाना बनाने का एक शांत तरीका फिर से उभर रहा है। जिसका नेतृत्व विरासत से जुड़ी हुई महिलाएं कर रही हैं।

जम्मू, 3 अप्रैल (आईएएनएस)। जम्मू के बीचों-बीच, जहां परंपरा और संस्कृति रोजमर्रा की जिंदगी में गहराई से जुड़ी हुई है, वहां खाना बनाने का एक शांत तरीका फिर से उभर रहा है। जिसका नेतृत्व विरासत से जुड़ी हुई महिलाएं कर रही हैं।

जम्मू और कश्मीर रूरल लाइवलीहुड मिशन की उम्मीद स्कीम के तहत, एसएचजी दुर्गा माता ग्रुप की वंदना शर्मा डोगरी खाने के फीके पड़ते स्वाद को वापस लाने के लिए काम कर रही हैं। जो एक छोटी सी पहल के तौर पर शुरू हुआ था, वह अब एक ऐसी शानदार विरासत को बचाने का मिशन बन गया है जो धीरे-धीरे लोकल किचन से गायब हो रही थी।

अपने सफर के बारे में बात करते हुए वंदना शर्मा ने महिलाओं को फाइनेंशियली आत्मनिर्भर बनने के लिए बढ़ावा देने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने इस विजन को अपने जैसी कई महिलाओं को आगे आने और अपना कुछ काम का बनाने के लिए प्रेरित करने का क्रेडिट दिया।

उन्होंने कहा कि अभी, करीब 15 महिलाएं मेरे साथ मिलकर काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि कैसे इस पहल ने न सिर्फ पारंपरिक खाने को फिर से जिंदा किया है, बल्कि स्थानीय महिलाओं के लिए रोजी-रोटी का जरिया भी बनाया है।

ग्रुप ने असली डोगरी डिशेज को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया है, जो कभी इस इलाके के फूड कल्चर की पहचान थीं। पॉपुलर डिशेज में 'किम' और 'कचालू' शामिल हैं, ये डिशेज अब इस इलाके के लोगों का दिल और टेस्ट बड्स जीत रही हैं। उनकी कोशिशें इन पारंपरिक स्वादों को नई पीढ़ी तक फिर से पहुंचाने में मदद कर रही हैं।

वंदना ने बताया कि हमारा मकसद जम्मू के पारंपरिक डोगरी खाने को लोगों तक वापस पहुंचाना है। हमें यह देखकर खुशी हो रही है कि लोग इसका मजा ले रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि उम्मीद स्कीम के तहत मिली मदद ने उनके काम को आसान बनाने और उनकी पहुँच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

जैसे-जैसे लोकल और देसी खाने में दिलचस्पी बढ़ रही है, ग्रुप की महिलाएं यह साबित कर रही हैं कि परंपरा को बचाकर रखने से एम्पावरमेंट का रास्ता भी बन सकता है। अपने काम से वे सिर्फ रेसिपी को ही नहीं बचा रही हैं, वे पहचान वापस ला रही हैं, रोजी-रोटी बना रही हैं, और जम्मू-कश्मीर के कल्चरल ताने-बाने को मजबूत कर रही हैं।

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Created On :   3 April 2026 11:24 PM IST

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