इटली में बुर्का-नकाब पर बैन के प्रस्ताव का हरिद्वार में स्वागत, संत बोले-भारत में भी लागू किया जाए

इटली में बुर्का-नकाब पर बैन के प्रस्ताव का हरिद्वार में स्वागत, संत बोले-भारत में भी लागू किया जाए
इटली में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने को लेकर लाए गए प्रस्ताव का भारत के साधु-संतों ने स्वागत किया है। संतों का कहना है कि यह एक सराहनीय और साहसिक फैसला है और इसे भारत में भी लागू किया जाना चाहिए।

हरिद्वार, 23 सितंबर (आईएएनएस)। इटली में बुर्का और नकाब पर प्रतिबंध लगाने को लेकर लाए गए प्रस्ताव का भारत के साधु-संतों ने स्वागत किया है। संतों का कहना है कि यह एक सराहनीय और साहसिक फैसला है और इसे भारत में भी लागू किया जाना चाहिए।

संत करौली शंकर ने बुधवार को आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि इटली की प्रधानमंत्री ने महिला होने के नाते महिलाओं के हित में बहुत अच्छा निर्णय लिया है। इस तरह का कानून सभी जगह होना चाहिए, भारत में भी इस पर विचार होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बच्चों को नकाब और बुर्के में रखने का क्या मतलब है। आज देश 21वीं सदी में सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। आज की जेन-जी पीढ़ी और बच्चे अपने अस्तित्व और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में कोई भी बंधन में नहीं रहना चाहता, हर कोई खुलकर जीना चाहता है। चेहरा छिपाने का क्या मतलब है। कौन सा अपराध किया है जो चेहरा छिपाना पड़े। इसलिए चेहरा छिपाने की परंपरा ठीक नहीं है बल्कि चेहरा खुला ही रहना चाहिए।

उन्होंने सुरक्षा के पहलू का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कई बार लोग अपराध करने के लिए भी बुर्का पहनकर निकल जाते हैं। पुरुष भी बुर्का पहन लेते हैं और अपराध कर फरार हो जाते हैं, लोग समझते हैं कि कोई महिला है। इसलिए अपराधों को रोकने और महिलाओं के स्वयं के अधिकारों की रक्षा के लिए भी इस तरह के पहनावे पर चर्चा होनी चाहिए कि नकाब या बुर्का पहनना कितना जायज है।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जहां सुरक्षा का मामला है, वहां नकाब या किसी भी तरह के पहनावे को सुरक्षा मानकों से गुजरना ही होगा। हालांकि जो लोग अपना पहनावा स्वयं तय करते हैं, उसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार किसी को नहीं है। हर व्यक्ति को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की स्वतंत्रता है लेकिन स्कूली बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता है। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को नकाब और बुर्का नहीं पहनना चाहिए। स्कूल में केवल स्कूल ड्रेस ही होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब तक बच्चे स्कूल में हैं, तब तक उन्हें स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म में ही आना चाहिए। स्कूल के बाहर या शादीशुदा होने के बाद महिलाएं क्या पहनती हैं, उस पर कोई आपत्ति नहीं है। बच्चों को स्वतंत्रता का अधिकार मिलना चाहिए और स्कूल में एक समान ड्रेस कोड होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि स्कूल में अलग-अलग धर्म के आधार पर अलग-अलग पहनावा होने से बच्चे अलग-अलग दिखते हैं, जिससे समाज में भ्रम और अलगाव की भावना पैदा होती है। धर्म के आधार पर स्कूल में अलग ड्रेस उचित नहीं है। इसलिए भारत में भी स्कूलों में इस तरह का नियम लागू होना चाहिए कि कोई भी छात्र बुर्का या नकाब पहनकर स्कूल न आएं बल्कि सभी स्कूल ड्रेस में ही आएं।

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Created On :   23 Sept 2026 4:46 PM IST

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