पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से राहत, गाजियाबाद पुलिस का नोटिस रद्द

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से राहत, गाजियाबाद पुलिस का नोटिस रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को राहत देते हुए गाजियाबाद पुलिस की ओर से जारी उस नोटिस को रद्द कर दिया है, जिसमें कथित रोड रेज की घटना से कई महीने पहले के उनके कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल डेटा मांगे गए थे। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में पत्रकार को गिरफ्तारी से मिली अंतरिम राहत भी बरकरार रखी।

नई दिल्ली, 14 अक्टूबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को राहत देते हुए गाजियाबाद पुलिस की ओर से जारी उस नोटिस को रद्द कर दिया है, जिसमें कथित रोड रेज की घटना से कई महीने पहले के उनके कॉल रिकॉर्ड और अन्य डिजिटल डेटा मांगे गए थे। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में पत्रकार को गिरफ्तारी से मिली अंतरिम राहत भी बरकरार रखी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियों को अपराधों की जांच करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल किसी व्यक्ति की निजी डिजिटल जिंदगी तक पहुंचने के माध्यम के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने जोर दिया कि राज्य की जांच करने की शक्ति और व्यक्ति के निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। यह संतुलन तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब मामला किसी खोजी पत्रकार से जुड़ा हो।

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पुलिस की ओर से डिजिटल रिकॉर्ड मांगे जाने के औचित्य पर सवाल उठाया। पीठ ने पूछा कि जब कथित रोड रेज की घटना अगस्त महीने की है, तो पुलिस जून महीने के डिजिटल रिकॉर्ड क्यों मांग रही है।

अदालत की टिप्पणी का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि जांच के नाम पर किसी व्यक्ति की निजी डिजिटल जानकारी तक पहुंचने की शक्ति का इस्तेमाल उचित सीमाओं के भीतर होना चाहिए। किसी अपराध की जांच करने का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति के डिजिटल जीवन से जुड़ी व्यापक जानकारी बिना पर्याप्त औचित्य के मांग सकती हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया गया। राज्य सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित अधिकारियों को मामले की जांच करने का अधिकार है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत अपराधों की जांच करने के लिए पुलिस को प्राप्त कानूनी शक्तियों के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठा रहा है। अदालत की चिंता इन शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके और उनकी सीमाओं को लेकर थी।

पीठ ने संकेत दिया कि जांच की जरूरत और निजता के मौलिक अधिकार के बीच उचित संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। विशेष रूप से पत्रकारों के मामले में डिजिटल रिकॉर्ड की मांग जैसे कदमों का औचित्य और दायरा महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि ऐसी जानकारी किसी व्यक्ति की निजी गतिविधियों से जुड़े कई पहलुओं को उजागर कर सकती है।

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Created On :   14 Oct 2026 5:25 PM IST

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