प्रधानमंत्री मोदी की शिवकुमार स्वामीगलु को श्रद्धांजलि, कहा-सच्ची महानता दूसरों की सेवा में निहित

प्रधानमंत्री मोदी की शिवकुमार स्वामीगलु को श्रद्धांजलि, कहा-सच्ची महानता दूसरों की सेवा में निहित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को परम पूज्य शिवकुमार स्वामीगलु की जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे करुणा, विनम्रता और मानवता की अटूट सेवा के प्रतीक के रूप में सामूहिक स्मृति में बने रहेंगे।

नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को परम पूज्य शिवकुमार स्वामीगलु की जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे करुणा, विनम्रता और मानवता की अटूट सेवा के प्रतीक के रूप में सामूहिक स्मृति में बने रहेंगे।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर कहा, "उनकी जयंती के अवसर पर, परम पूज्य डॉ. श्रीश्रीश्री शिवकुमार स्वामीगलु को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए। वे करुणा, विनम्रता और मानवता की अटूट सेवा के प्रतीक के रूप में सामूहिक स्मृति में अमर हैं।"

उन्होंने कहा, "दूसरों के उत्थान के लिए समर्पित जीवन के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता दूसरों की सेवा में निहित है। शिक्षा, सामाजिक कल्याण और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान ने समाज पर अमिट छाप छोड़ी है। आज भी उनका जीवन अनगिनत व्यक्तियों को निस्वार्थता और सेवा के मार्ग पर चलने के लिए मार्गदर्शन और प्रेरणा देता है।"

कर्नाटक में "नादेदावरु देवरु (चलते-फिरते भगवान)" के नाम से मशहूर स्वामीजी का 2019 में निधन हो गया था। अपने जीवनकाल में उन्होंने नर्सरी स्कूलों से लेकर इंजीनियरिंग, विज्ञान और कला की शिक्षा देने वाले कॉलेजों तक 12,000 से अधिक शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। ये संस्थान सिद्धगंगा मठ द्वारा संचालित हैं, जो आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ-साथ संस्कृत में ज्ञान प्रदान करने वाले केंद्रों की भी देखरेख करता है।

उनका जन्म 1 अप्रैल 1907 को बेंगलुरु के पास मगदी तालुक के वीरपुरा गांव में होनप्पा और गंगम्मा के घर हुआ था और उनका नाम शिवन्ना रखा गया था। उनके 11 भाई-बहन थे। जब वे महज आठ साल के थे, तब उनकी मां के निधन के बाद, उनके जीवन में एक ऐसा परिवर्तन आया जिसने उन्हें आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित किया।

उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा अपने गांव में पूरी की और फिर कला स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के लिए बेंगलुरु चले गए। इसके बाद में उन्होंने अपने गुरु उद्दाना शिवयोगिगलू का स्थान लेते हुए सिद्धगंगा मठ के पीठाधिपति का पद संभाला, जिस पर वे लगभग 76 वर्षों तक रहे।

अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने श्री सिद्धगंगा शिक्षा सोसायटी की स्थापना की, जिसके तहत हजारों छात्रों, विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित पृष्ठभूमि के छात्रों को पारंपरिक और आधुनिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्राप्त हुई।

स्वामीजी कन्नड़, अंग्रेजी और संस्कृत में पारंगत थे और अपनी अनुशासनशीलता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने मठ द्वारा संचालित संस्थानों में अंग्रेजी और संस्कृत भी पढ़ाई। उनके अपार योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार प्रतिष्ठित कर्नाटक रत्न और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

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Created On :   1 April 2026 12:04 PM IST

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