'वंदे मातरम' को अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर आक्रमण और अस्वीकार्य एआईएमपीएलबी

वंदे मातरम को अनिवार्य बनाना धार्मिक स्वतंत्रता पर आक्रमण और अस्वीकार्य एआईएमपीएलबी
अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के उस निर्णय को कड़ा विरोध जताया है जिसमें 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा दिया गया है, इसके सभी छह श्लोकों को अनिवार्य बनाया गया है और सभी सरकारी एवं शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान से पहले इसका पाठ अनिवार्य किया गया है। बोर्ड ने इस कदम को भारत के संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और संविधान सभा के ऐतिहासिक निर्णयों का प्रत्यक्ष उल्लंघन बताया है और सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की है।

नई दिल्ली, 7 मई (आईएएनएस)। अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के उस निर्णय को कड़ा विरोध जताया है जिसमें 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान दर्जा दिया गया है, इसके सभी छह श्लोकों को अनिवार्य बनाया गया है और सभी सरकारी एवं शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान से पहले इसका पाठ अनिवार्य किया गया है। बोर्ड ने इस कदम को भारत के संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और संविधान सभा के ऐतिहासिक निर्णयों का प्रत्यक्ष उल्लंघन बताया है और सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की है।

अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. एसक्यूआर इलियास ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि मंत्रिमंडल का निर्णय न केवल असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक है, बल्कि देश की धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक मूल्यों के भी विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य किसी एक समुदाय की धार्मिक अवधारणाओं या मान्यताओं को बलपूर्वक सभी नागरिकों पर थोप नहीं सकता। वंदे मातरम के कई श्लोकों में देवी दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की स्तुति और महिमागान है, जो इस्लाम के तौहीद (ईश्वर की पूर्ण एकता) सिद्धांत के प्रत्यक्ष विपरीत हैं। इस्लाम केवल अल्लाह की पूजा की अनुमति देता है, जो एक है और जिसका कोई साझीदार नहीं है, और शिर्क (ईश्वर के साथ साझीदार ठहराना) के किसी भी रूप को स्वीकार नहीं करता है।

डॉ. इलियास ने आगे बताया कि 1937 में, रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर कांग्रेस ने स्वयं यह निर्णय लिया था कि 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो श्लोकों का ही प्रयोग किया जाना चाहिए, क्योंकि बाद के श्लोक धार्मिक प्रकृति के थे और समाज के सभी वर्गों को स्वीकार्य नहीं हो सकते थे। इस वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए, संविधान सभा ने 1950 में भी केवल पहले दो श्लोकों को ही राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया था। ऐसी स्थिति में, सभी छह श्लोकों को अनिवार्य बनाना न केवल ऐतिहासिक सर्वसम्मति से विचलन है, बल्कि एक खतरनाक और उकसाने वाला कदम भी है।

उन्होंने आगे कहा कि देश की एकता और अखंडता को बल प्रयोग, जबरन एकरूपता या धार्मिक बहुसंख्यकवाद के माध्यम से मजबूत नहीं किया जा सकता, बल्कि केवल संविधान के पालन, आपसी सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के माध्यम से ही मजबूत किया जा सकता है। सरकार को संवेदनशील धार्मिक मुद्दों का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए दुरुपयोग करने से बचना चाहिए और सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने वाले निर्णयों से दूर रहना चाहिए।

बोर्ड ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार इस निर्णय को तुरंत वापस नहीं लेती है, तो अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसे अदालत में चुनौती देने के लिए विवश होगा।

अस्वीकरण: यह न्यूज़ ऑटो फ़ीड्स द्वारा स्वतः प्रकाशित हुई खबर है। इस न्यूज़ में BhaskarHindi.com टीम के द्वारा किसी भी तरह का कोई बदलाव या परिवर्तन (एडिटिंग) नहीं किया गया है| इस न्यूज की एवं न्यूज में उपयोग में ली गई सामग्रियों की सम्पूर्ण जवाबदारी केवल और केवल न्यूज़ एजेंसी की है एवं इस न्यूज में दी गई जानकारी का उपयोग करने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों (वकील / इंजीनियर / ज्योतिष / वास्तुशास्त्री / डॉक्टर / न्यूज़ एजेंसी / अन्य विषय एक्सपर्ट) की सलाह जरूर लें। अतः संबंधित खबर एवं उपयोग में लिए गए टेक्स्ट मैटर, फोटो, विडियो एवं ऑडिओ को लेकर BhaskarHindi.com न्यूज पोर्टल की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है|

Created On :   7 May 2026 7:55 PM IST

Tags

और पढ़ेंकम पढ़ें
Next Story