दैनिक भास्कर हिंदी: गिरता रुपया और बढ़ता पेट्रोल-डीजल, जानिए क्यों मजबूर है मोदी सरकार

September 6th, 2018

हाईलाइट

  • अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट लगातार जारी है।
  • गुरुवार को 37 पैसे की तेज गिरावट के साथ रुपया पहली बार प्रति डॉलर 72 के नीचे चला गया।
  • रुपए की गिरावट का सीधा और सबसे बड़ा असर विदेश से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल के बिल पर हो रहा है।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट लगातार जारी है। गुरुवार को 37 पैसे की तेज गिरावट के साथ रुपया पहली बार प्रति डॉलर 72 के ऊपर चला गया। अर्थशास्त्रियों की मानें तो रुपए में लगातार गिरावट का मुख्य कारण वैश्विक परिस्थितियां हैं। रुपए की गिरावट का सीधा और सबसे बड़ा असर विदेश से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल के बिल पर हो रहा है। इसके कारण भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम में बढ़ोत्तरी हो रही है, जिसके कारण आम आदमी को कमरतोड़ महंगाई से सामना करना पड़ रहा है। बता दें कि भारत की मुद्रा के लिए अगस्त का महीना पिछले तीन वर्षों में सबसे निराशाजनक रहा।

डॉलर पर भरोसा, रुपए के लिए मुसीबत
डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट का एक बड़ा कारण अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर भी है। इन दो बड़े देशों की बीच चल रहे ट्रेड वॉर के कारण वैश्विक स्तर पर लोगों का डॉलर पर भरोसा बढ़ता ही जा रहा है और यही भरोसा रुपए के लिए मुसीबत बना हुआ है। वैश्विक स्तर पर डॉलर की जमकर खरीदारी का जा रही है। डॉलर पर लोगों का बढ़ता भरोसा ही रुपए की गिरावट के लिए सबसे बड़े कारण बताया जा रहा है।

रुपए की गिरावट के लिए सरकार जिम्मेदार
डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार माना जा रहा है, क्योंकि मुद्रा को संचालित करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी देश की सरकार पर ही होती है। जानकारों की मानें तो अब अगर रुपए को गिरने से बचाना है और उसे मजबूती प्रदान करनी है तो केंद्र सरकार को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। इन्हीं में से एक ये भी है कि केन्द्र सरकार को देश में एक्सपोर्ट को बढ़ाने के साथ-साथ विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में इजाफा कराना होगा। यह काम मौजूदा स्थिति में नहीं बल्कि एक लंबी अवधि के दौरान किया जाता है।

रुपए को इस गंभीर स्थिति से बाहर लाने के लिए सरकार को मुख्यतः तीन कार्यों को तुरंत करना होगा। पहला ये है कि देश में जो आर्थिक सुस्ती छाई है, उससे देश को बाहर लाते हुए एक्सपोर्ट को बढ़ाना चाहिए। एक्सपोर्ट में बड़े इजाफे के साथ-साथ देश में बड़े FDI और FPI की जरूरत है। जानकार बताते हैं कि यदि सरकार इन तीनों फ्रंट पर पहले से ही कार्य कर रही होती तो रुपए मौजूदा स्थिति में नहीं पहुंता।

स्थिति से उभरने RBI अपनाएगा ये तरीका!
रुपए को मजबूती प्रदान करने के लिए रिजर्व बैंक (RBI) 2013 की एक पॉलिसी की फिर से समीक्षा कर सकता है। इस पॉलिसी के तहत विदेशी मुद्रा विनिमय विंडो खोला जा सकता है, जिससे देश की तेल मार्केटिंग कंपनियों की रोजाना डॉलर की जरूरतें पूरी की जा सकें। कोटक महिन्द्रा बैंक के एक नोट के अनुसार RBI इस रूट का इस्तेमाल कर विदेशी विनिमय मार्केट की डिमांड के अनुसार हर रोज तत्काल 600 मिलियन डॉलर निकाल देगा। इससे मुद्रा की अस्थिरता को कम करने में मदद मिलेगी, हालांकि इससे विदेशी मुद्रा भंडार जरूर कम होगा।

मजबूर नजर आ रही आरबीआई और सरकार
वैश्विक मुद्रा बाजार में रुपए को ट्रेड कराने में रिजर्व बैंक की अहम भूमिका होती है। एक अन्य जानकार ने बताया है कि रिजर्व बैंक के पास रुपए को संभालने के लिए लगभग अब कोई विकल्प नहीं बचा है। फिलहाल वैश्विक बाजार की जो स्थिति बनती नजर आ रही है, उसमें अगर अब आरबीआई रुपए को बचाने के लिए कुछ कदम उठाती भी है, तो संभावना अधिक है कि वह कदम कामयाब भी नहीं होगा। इन दिनों रुपया पूरी तरह से वैश्विक स्थिति का मोहताज है, जिन पर हमारा यानी आरबीआई या सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है और फिलहाल ये दोनों ही मजबूर नजर आ रहे हैं।

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