Jabalpur News: पिछले 13 साल से लापता मल्टीप्लेक्स, पीवीआर और सिनेमाघरों के मनोरंजन टैक्स की फाइल

पिछले 13 साल से लापता मल्टीप्लेक्स, पीवीआर और सिनेमाघरों के मनोरंजन टैक्स की फाइल
करोड़ों बकाया, वसूली पर लगे स्टे के खिलाफ निगम अधिकारी आज तक नहीं कर पाए अपील

डिजिटल डेस्क,जबलपुर। एक फाइल के लापता हो जाने से नगर निगम को करोड़ों रुपए की कर हानि हो चुकी है, लेकिन जिम्मेदार लोगों को जरा भी फिक्र नहीं। दरअसल मल्टीप्लेक्स, पीवीआर और सिनेमाघरों से मिलने वाले मनोरंजन कर की फाइल 13 साल से नगर निगम से गायब है। फाइल के गायब होने से नगर निगम को अब तक करीब 5 करोड़ का नुकसान हो चुका है, लेकिन कोई भी अधिकारी इस पर रुचि नहीं दिखा रहा।

इतना ही नहीं फाइल गायब होने के बाद राजस्व विभाग के कर्मचारियों ने हिसाब-किताब रखना तक बंद कर दिया है। पिछले 13 साल में किस मॉल या मल्टीप्लेक्स में कितने शो चले इसकी जानकारी किसी को नहीं। अब यदि निगम कोर्ट में अपील कर केस जीत भी जाता है तो यह हिसाब लगाना मुश्किल होगा कि निगम को किस मॉल या मल्टीप्लेक्स से कितना कर लेना है।

एक स्टे से पूरे शहर में वसूली बंद

निगम के अधिकारियों ने इस एक स्टे को बहाना बनाकर पूरे शहर में ही इस शुल्क की वसूली बंद कर दी। जबकि कानूनी जानकारों का कहना है कि स्टे सिर्फ एक मॉल के लिए था, पूरे शहर के लिए नहीं। निगम चाहता तो बाकी थिएटरों से वसूली जारी रख सकता था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

कैसे गायब हुई फाइल

एक मॉल संचालक द्वारा 2013 में मनाेरंजन कर वसूली पर कोर्ट से स्टे ले लिया गया था, तब राजस्व विभाग ने मामले की फाइल विधि िवभाग को भेजी थी, लेकिन विधि विभाग ने स्टे के खिलाफ अपील ही नहीं की और फाइल लापता हो गई। फाइल को ढूंढने का प्रयास राजस्व विभाग के जिम्मेदारों ने भी नहीं किया। अब स्थिति यह है कि शहर में मल्टीप्लेक्स और मॉल की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे और भी मामले हो सकते हैं जिनकी फाइलें विभागों से सालाें से गायब हों, निगम अधिकारियों को ऐसी फाइलों को तलाश कर राजस्व बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि निगम की माली हालत सुधर सके।

क्या है नियम

नगर निगम अधिनियम के तहत शहर सीमा में चलने वाले हर सिनेमा हॉल से नगर निगम 200 रुपए शो के हिसाब से मनोरंजन कर लेता था। शहर में जब मल्टीप्लेक्स और पीवीआर की शुरुआत हुई तो नगर निगम ने उनसे भी मनोरंजन कर की राशि प्रति शो के हिसाब से बढ़ाकर 200 रुपए मांगी।

इसी बात से नाराज मॉल संचालक कोर्ट की शरण में पहुंच गए। उनका कहना रहा कि सिनेमा हाॅल की तुलना में मल्टीप्लेक्स या पीवीआर में सीटें कम होती हैं। ऐसे में 200 रुपए शुल्क अधिक होगा। यही मामला कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने भी इस मामले में स्टे दे दिया था।

अधिकारी क्यों हैं मौन? उठ रहे सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर दिन लाखों का नुकसान हो रहा है तो नगर निगम के राजस्व विभाग, उपायुक्त और अधिवक्ता मौन क्यों हैं? क्या निगम के वकीलों की मॉल प्रबंधनों से साठगांठ है? क्या जानबूझकर अपील नहीं की गई ताकि बड़े कारोबारियों को फायदा पहुंचाया जा सके? क्या निगम के पास अपने राजस्व की भी सुध लेने का समय नहीं है? निगम के एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह शुल्क पूरी तरह वैध था। कई शहरों में आज भी वसूला जा रहा है। जबलपुर में वकीलों की लापरवाही और अधिकारियों की अनदेखी से यह बंद है।

अब 1 नहीं, 5 मॉल और 50 से ज्यादा शो

2013 में शहर में 1 मॉल था, आज 2026 में स्थिति बदल चुकी है। शहर में साउथ एवेन्यू, जैसम, रानीताल और मदन महल के माॅल को मिलाकर 4 से 5 बड़े मॉल और खुल चुके हैं। हर मॉल में 3 से 4 स्क्रीन वाले पीवीआर और मल्टीप्लेक्स हैं। इसके अलावा पुराने सिनेमाघर भी चल रहे हैं।

एक अनुमान के मुताबिक शहर में आज रोजाना 50 से ज्यादा शो दिखाए जा रहे हैं। अगर प्रति शो 200 रुपए के हिसाब से जोड़ा जाए तो यह राशि सालाना कम से कम 36 लाख रुपए होती है।

विधि विभाग से फाइल मंगाकर करेंगे कार्रवाई

फाइल कब और कैसे गायब हुई यह मेरी जानकारी में नहीं है। अगर मॉल संचालकों ने मनाेरंजन कर पर स्टे लिया है तो विधि अधिकारी को अपील करने के निर्देश दिए जाएंगे। जो नियम में है उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी। निगम को राजस्व का नुकसान नहीं होना चाहिए। फाइल कहां है पता लगाया जाएगा।

-सौरभ मिश्रा, अपर आयुक्त राजस्व

Created On :   24 Sept 2026 6:37 PM IST

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