कौन लेगा सुध ?: फिर किसी हादसे का इंतजार - क्लासरूम में घुस आते जहरीले सांप, यहां खौफ के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं बच्चे

फिर किसी हादसे का इंतजार - क्लासरूम में घुस आते जहरीले सांप, यहां खौफ के साए में पढ़ाई करने को मजबूर हैं बच्चे
  • फाइलों में दफन होती गुहार, तीन सालों से अनदेखी और अफसरों की टालमटोल
  • खौफ के साए में कटता बचपन
  • दो कमरों में सिमटी 26 मासूमों की जिंदगी

Jintur News. गढ़चिरौली के जपतलाई स्थित आश्रमशाला में सर्पदंश से छात्राओं की मौत की खबर अभी सुर्खियों से गायब नहीं हुई कि वहीं जिंतूर तालिका के छोटे से गांव घेवंडा के जिला परिषद प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों के दिलों में दहशत की लहर दौड़ने लगी है। जो अपने बच्चों की सलामती को लेकर पशोपेश में पड़े हैं। कहने को तो यह पहली से पांचवीं तक का स्कूल है, लेकिन असल में मिट्टी के दो जर्जर कमरों में सिमटा हुआ 26 मासूम बच्चों का छोटा सा संसार है। जहां हर सुबह मासूमों के लिए एक नया इम्तिहान लेकर आती है। कक्षा में जब वे अपनी स्लेट और किताबें निकालते, तो उनकी निगाहें केवल ब्लैकबोर्ड पर नहीं, बल्कि कमरे की दरारों, बेंचों के नीचे और छत के कोनों पर भी टिकी रहती। स्कूल के आसपास फैली झाड़ियों से निकलकर अक्सर जहरीले सांप क्लासरूम में घुस आते हैं। बच्चों के लिए पढ़ाई का मतलब अब ज्ञान पाना नहीं, बल्कि खौफ से खुद को बचाना बन चुका है।


स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य कैलाश जाधव लंबे समय से इस डर को करीब से देख रहे है। पिछले तीन सालों से वे लगातार सरकारी दफ्तरों के दरवाजे खटखटा रहे है। उन्होंने 'यू-डायस' पोर्टल पर शिकायतें दर्ज कराईं, बदहाल शौचालय के दरवाजों से लेकर टूटी दीवारों और पीने के पानी की किल्लत तक, हर समस्या का जिक्र किया है। हद तो तब हो गई जब उन्होंने अफसरों के मोबाइल पर क्लासरूम में घूमते सांपों की तस्वीरें और वीडियो तक भेज दिए, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा। हर आवेदन, हर गुहार दफ्तर की धूल फांकती फाइलों में दबकर रह गई। जब भी किसी अधिकारी से बात करने की कोशिश की जाती, तो टालमटोल का खेल शुरू हो जाता। केंद्र प्रमुख शिवाजी कर्हाले का फोन बजता, लेकिन कोई उठाता नहीं।


सवाल पूछने पर गुट शिक्षा अधिकारी त्र्यंबक पोले हमेशा की तरह "दो दिन में आकर देखता हूं" का बेरुखा आश्वासन दे देते हैं, और ग्राम सेवक सूर्यकांत सावंत भी जल्द व्यवस्था करने की पुरानी बात दोहरा देते।

गांव की चौपाल पर खड़े होकर एक लाचार पिता ने रुंधे गले से पूछा, "क्या हमारे बच्चे इंसान नहीं हैं? क्या जब तक किसी मासूम को सांप काट नहीं लेगा और किसी की जान नहीं चली जाएगी, तब तक यह बहरा प्रशासन नहीं जागेगा?"


दो कमरों में बच्चे भारी मन से बैठते हैं। बाहर हवा चलती है तो सूखी पत्तियों की आहट से भी उनका दिल दहल उठता है। वे आज भी इंतज़ार कर रहे हैं कि शायद कोई मसीहा आए और उन्हें सांपों के इस स्कूल से मुक्ति मिली।



Created On :   19 Aug 2026 10:39 PM IST

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