दैनिक भास्कर हिंदी: दंतेवाड़ा : रेशम पालन से बांधे कमाई की डोर

December 22nd, 2020

डिजिटल डेस्क, दंतेवाड़ा। हजारों वर्षों से यह भारतीय संस्कृति और परंपरा का अंग बन चुका है। कोई भी अनुष्ठान किसी न किसी रूप में रेशम के उपयोग के बिना पूरा नहीं माना जाता। रेशम उत्पादन में भारत विश्व में चीन के बाद दूसरे नंबर पर आता है। रेशम के जितने भी प्रकार हैं, उन सभी का उत्पादन किसी न किसी भारतीय इलाके में अवश्य होता है। भारतीय बाजार में इसकी खपत काफी ज्यादा है। विशेषज्ञों के अनुसार रेशम उद्योग के विस्तार को देखते हुए इसमें रोजगार की काफी संभावनाएं हैं। फैशन उद्योग के काफी करीब होने के कारण उम्मीद की जा सकती है कि इसकी डिमांड में कमी नहीं आयेगा। इसे बहुत कम कीमत पर ग्रामीण क्षेत्र में ही लगाया जा सकता है। कृषि कार्यों और अन्य घरेलू कार्यों के साथ इसे अपनाया जा सकता है। श्रम जनित होने के कारण इसमें विभिन्न स्तर पर रोजगार का सृजन भी होता है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह उद्योग पर्यावरण के लिए मित्रवत है। ग्राम उद्योग संचालनालय रेशम घटक द्वारा संचालित रोजगार मूलक योजनाओं का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण अंचल में निवास कर रहे स्थानीय निर्धन विशेषकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति और पिछड़े वर्ग के गरीब परिवारों को स्वरोजगार उपलब्ध कराना है। नैसर्गिक कौशल विकास योजना अंतर्गत बारसूर क्षेत्र में उपलब्ध साल, सेन्हा, धावड़ा, बेर आदि के वृक्षों पर नैसर्गिक रूप से कोसा उत्पादन एवं संग्रहण कर ग्रामीण/वनवासी लाभान्वित होते हैं। वित्तीय वर्ष 2019 में कुल 186.46 लाख नग नैसर्गिक रैली कोसा का संग्रहण किया गया। जिससे 19 हजार 7 सौ 90 परिवार लाभान्वित हुए। चालू वित्तीय वर्ष 2020 21 में विभागीय तौर से 4 कैंप आयोजन किया गया। जिसमें विभागीय आयोजित कैंप में 4 रैली कैंप जिसमें 45 परिवार लाभान्वित हुये। रैली कोसा उत्पादन/ संग्रहण 70 लाख एवं रैली को कोसा संग्रहण से लाभान्वित परिवार 23सौ हुए। दंतेवाड़ा जिला में टसर खाद्य वृक्षों की अधिकाधिक संख्या में उपलब्ध है जिससे वृहद संख्या में कोसा उत्पादन की प्रबल संभावनाएं मौजूद हैं, टसर रेशम उत्पादन के माध्यम से वनांचल के आसपास रहने वाले अनुसूचित जाति जनजाति एवं अन्य वर्ग के लोगों को अपने मूल्य कार्यों के अतिरिक्त पूरक रोजगार प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण साधन प्राप्त हुआ है। भारत गांव का देश है जिनकी लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामों में निवास करती है। कृषि कार्यों से जुड़े होकर अपना जीविकोपार्जन करती है। रेशम उद्योग एवं कृषि आधारित ग्राम उद्योग है जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए लाभदायक है, इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर होते हैं तथा क्षेत्र का विकास होता है इस उद्योग को शुरू करने में किसी विशेष पूंजी प्रशिक्षण एवं तकनीकी की आवश्यकता नहीं होती है। इस योजना के अंतर्गत पालित ढाबा टसर ककून उत्पादन योजना है जिससे साजा/अर्जुन के टसर खाद्य पौधों पर टसर क्रीमी पाले जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां वनखंडों पर अथवा शासकीय टसर केंद्रों में उपलब्ध खाद्य पौधों पर टसर कीटपालन योजना के माध्यम से पालित ढाबा टसर ककून उत्पादित किया जाता है एवं कृषक हितग्राहियों को स्वरोजगार उपलब्ध कराया जाता है। टसर कीट पालन खुले वन क्षेत्रों में किया जाता है। वर्ष में हितग्राही 3 फसल के दौरान कुल 3लाख 22 हजार 6सौ नग कोसा उत्पादन से 38 परिवार लाभान्वित हुए। चालू वित्तीय वर्ष 2020-21 में 4लाख 55 हजार डाबा कोसा उत्पादन कर इनका 51 हितग्राही लाभान्वित करना प्रस्तावित हैं। जिले में दो मलबरी केंद्र संचालित हैं। जिससे वित्तीय वर्ष 2019-20 में 12सौ 41 किलो ग्राम मलबरी कोसा उत्पादन कर 39 हितग्राही लाभान्वित हुए। चालू वित्तीय वर्ष 2020-21 में अट्ठारह सौ किलोग्राम मलबरी कोसा उत्पादन कर 27 हितग्राही को लाभान्वित किया जाना प्रस्तावित है टसर धागा करण में टसर/डाबा कोसे से धागा करण का कार्य प्रारंभ किया गया है। जिसके लिए महिला धागा करण समूह को 10 रिलिंग मशीन एवं 5 स्पिनिंग मशीन उपलब्ध कराई गई है जिससे अब तक 5 किलोग्राम धागा महिलाओं द्वारा उत्पादित किया गया है एवं प्रतिमाह 3-4 किलोग्राम धागा उत्पादन का लक्ष्य प्रस्तावित है।