दैनिक भास्कर हिंदी: जैविक खेती कर दूसरों को भी इसके गुर सिखा रहा किसान - ले रहे भरपूर उत्पादन

November 6th, 2019

 डिजिटल डेस्क उमरिया । न हाथों में कलम थामी, न ही स्कूल का मुंह देखा। बिना किसी प्रशिक्षण पूर्वजों से खेती करने का गुर सीखा था। उसी में खुद का परिवार पालकर आज एक किसान दूसरों को भी जैविक खेती का तरीका बता रहे है।  यह कहानी जिला मुख्यालय से महज आठ किमी. दूर खेरबाखुर्द गांव निवासी किसान नर्मदा प्रसाद पिता भूखानी दाहिया की है। आखिरी बार वर्ष 2004 का वह समय था जब इन्होंने सात एकड़ में खड़ी चने की फसल को कीड़े की चपेट से बचाने कैमिकल का उपयोग करने चला था। रासायनिक खाद एण्डोसल्फास का घोल बनाकर छिड़काव कर रहा था, इसी दौरान उसे अचानक बेहोशी आने लगी। साथ में मौजूद पत्नी ने किसी कदर उसे होश में लाया। तब से नर्मदा ने कैमिकल के दुष्प्रभावों को महसूस कर खेत में इनका प्रयोग बंद करने का संकल्प लिया। 15 साल हो गए खुद मवेशियों के मलमूत्र से खाद तैयार कर तीन फसलीय उत्पाद ले रहा है। अभी तक कृषि विभाग की कल्याणकारी योजनाएं उसके पास तक नहीं पहुंच पाई।
खेती पर आश्रित है परिवार
63 वर्षीय अनपढ़ किसान नर्मदा ने बताया उसके पास तीन एकड़ सिंचित भूमि है। सिंचाई के लिए एक कुआ भी है। वर्ष 2004 में वह मवेशियों के गोबर से कम्पोस्ट खाद बनाना शुरू किया था। इस कार्य में परिवार के तीन बेटे भी सहयोग करते थे। अब उनका अपना परिवार है इनमे से दो खेती बाड़ी पर ही आश्रित हैं। कम भूमि होने के कारण वह समन्वित खेती करता है। खरीफ सीजन में धान उड़द, मूंग तथा रबी में गेहूं चना, मसूर स्वयं के उपयोग के लिए उत्पादित कर रहा है। इसी तरह सब्जियों में बरबटी, लौकी, टमाटर, आलू एवं मिर्ची तथा केले का उत्पादन भी लेता है। कम्पोस्ट खाद से वह तीन मुनगा, 20 केले, पपीता 20, नीबू 7, कटहल 4, अनाज 2 आदि फलदार पौधों को  लगाया हुआ है। खेत की मेढ़ों पर नीच के सात, पीपल का एक पौधा चारों तरफ खड़े हैं। खेती के साथ पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने अहम भूमिका निभा रहा है।
ऐसे बनती है खाद 
नर्मदा ने बताया उसके पास पहले से ही 32 नग गौवंश थे। वर्तमान में नौ गाय तथा 28 बकरियां है। प्रतिदिन इनके मलमूत्र को एक जगह सुरक्षित संग्रहित करता है। फिर मई-जून में इसे खेत में डालकर जोताई की जाती है। इसके पहले गड्ढे में पांच फीट तक  अन्य मिश्रण डालकर छह माह सड़ाया जाता है। जीवामृत, भूनाड, गौमूत्र, पांचपत्ती काढ़ा बनाकर उसे उपयोग के पहले मिलाकर तैयार किया जाता है। इस तरह बनी जैविक खाद उर्वरक शक्ति में वृद्धि के साथ ही फसल में स्वाद बढ़ाती है।
ये हैं लाभ
 किसान के मुताबिक स्वयं व बच्चों को बहुत कम भोजन संबंधी बीमारी हुई। अनाज पौष्टिक रहता है। बेहद कम लागत में अच्छा उत्पादन, कर्ज नहीं लेना पड़ता। इस खाद का अधिक उपयोग भी जमीन के उर्वरक तत्व के लिए नुकसान दायक नहीं।  पर्यावरण में भी इसके प्रयोग से कोई नुकसान व प्रदूषण जैसी समस्या नहीं रहती। जैविक उत्पादन विषमुक्त होता है। इसका स्वाद अच्छा रहता है। मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक उत्पाद बेहद जरूरी है। लागत कम लगने से किसान को आर्थिक बल मिलेगा।
इनका कहना है -
 जैविक के साथ हरी खाद का उपयोग करने से 20-22 ट्राली खाद की भरपाई की जा सकती है। हम जल्द ही किसान से मिलकर उसके पद्धति का आकलन का प्रोत्साहित करेंगे। 
डॉ. केपी तिवारी, कृषि वैज्ञानिक 
 वह कम्पोस्ट खाद ही उपयोग कर रहा है। यह मानव शरीर, मृदा व मानव में दुष्प्रभाव नहीं छोड़ती।  किसान की आय का 70 फासदी हिस्सा फसल के लिए बाजार की दवा, खाद का पैसा में ही खर्च होता है। इसकी बजत होगी। उत्पादक व उपभोक्ता दोनों के लिए यह कृषि उत्पाद आवश्यक है। 
रामसुख दुबे, विशेषज्ञ एवं संचालक जैविक पाठशाला नैगवां कटनी।

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