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दमोह में मिला मीथेन का भंडार.. बोर से पानी की जगह निकल रही आग

दमोह में मिला मीथेन का भंडार.. बोर से पानी की जगह निकल रही आग

खोज -ओएनजीसी ने अब तक 28 कुएं खोदे, इन पर  1120 करोड़ रुपए खर्च हुए, जल्द आठ कुएं और खोदने की तैयारी
डिजिटल डेस्क  दमोह/हटा ।
ओएनजीसी (ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन) देहरादून को दमोह जिले के हटा में मीथेन गैस मिली है। यहां 1120 करोड़ रुपए खर्च कर 28 कुएं खोदे गए थे। इनमें से सेमरा रामनगर गांव में एक कुएं में डेढ़ किमी गहराई पर ज्वलनशील गैस निकली। ओएनजीसी की टीम का दावा है कि हटा क्षेत्र के 24 गांव में 1.5 से 2.2 किमी गहराई तक गैस का भंडार है, जिसमें 8495 करोड़ लीटर (तीन बिलियन क्यूबिक फीट) मीथेन होने की उम्मीद है। अब यहां आठ कुएं और तलाश किए जा रहे हैं। यदि इसमें सफलता मिल गई तो दमोह की पहचान नैचुरल गैस के भंडार के रूप में होगी।
ओएनजीसी की टीम यहां लंबे समय से जांच कर रही थी। क्षेत्र के लोगों ने उन्हें अपने बोरिंग दिखाए, जिनमें से पानी की जगह गैस निकल रही है और आसानी से आग भी पकड़ रही है। इसके बाद टीम ने यहां जांच तेज कर दी। हटा क्षेत्र के काईखेड़ा और कमता गांव में बोरिंग से गैस निकलने के मामले ज्यादा सामने आए। कमता गांव में 12 किसानों के बोरिंग में पानी के साथ गैस निकल रही है। टीम को हटा जनपद में नैचुरल गैस के दो ब्लाक मिले हैं। इन स्थानों पर जल्द ही कुओं की खुदाई (एक्सप्लोरेशन) का काम शुरू होने वाला है। ओएनजीसी के वैज्ञानिक डॉ. एनपी सिंह का कहना है कि अब जाकर पुख्ता रूप से गैस मिली है, अब उसका उपयोग करने को लेकर कार्ययोजना बनाई जा रही है।
कमता गांव में पिछले दो साल से नलकूपों की खुदाई में गैस रिसाव हो रहा है। मुन्ना पटेल ने अपने खेत में तीन सौ फीट बोर कराया। उसमें मशीन डाली तो पानी में गंध आने लगी। और एक बार माचिस की तीली जलाकर पानी में लगाई तो आग लग गई। इसी गांव के अरविंद पटेल ने दो माह पहले अपने खेत में तीन सौ फीट बोर कराया तो उसमें भी यही स्थिति बनी। अरविंद पटेल के मुताबिक जैसे-जैसे जलस्तर गिरता जा रहा है, गैस का रिसाव बढ़ता जा रहा है। गांव में 12 लोगों के बोर की यही हालात हैं। रामसिंह ने खेत बोर कराया। पंप डाला और चालू किया। पास जल रही आग के संपर्क में आने से उनकी झोपड़ी जल गई। 
सोन बेसिन में है दमोह
ओएनजीसी ने मध्यप्रदेश को दो बेसिन में बांटा है- चंबल और सोन। दमोह सोन बेसिन में आता है। अधिकारियों के मुताबिक यहां पर 10 से 20 हजार साल पहले जीवाश्म बहुत प्रचुर मात्रा में रहा। यही कारण है, इस बेसिन में काफी मात्रा में कॉर्बन है। मरे जीव-जंतुओं के अवशेषों से अधिक मात्रा में तेल रहा लेकिन उसका समय पर दोहन नहीं हो पाया और अब वह गैस में तब्दील हो गया है।
 

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