Diwali 2026: दिवाली पर क्यों बनाई जाती है रंगोली? जानिए इस परंपरा के पीछे की धार्मिक मान्यता, शुभ संकेत और इसका खास महत्व

डिजिटल डेस्क, भोपाल। हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा त्योहार दीपावली कई मायनों में खास है और इसकी तैयारी काफी दिनों पहले ही शुरू हो जाती है। वहीं धनतेरस के दिन से इस पांच दिवसीय महोत्सव का शुभारंभ हो जाता है। इस पूरे उत्सव के दौरान दीपों और लाइट की सजावट तो खूब होती है। लेकिन, रंग-बिरंगी रंगोली भी इस उत्सव में अपना खास महत्व रखती है। खास तौर पर दिवाली के दिन घर के आंगन, मुख्य दरवाजे और पूजा स्थल पर रंगोली बनाई जाती है।
मान्यता है कि दिवाली पर रंगोली बनाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि, खुशहाली तथा सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर दिवाली पर रंगोली बनाने की परंपरा कब और क्यों शुरू हुई? आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यताएं और इसका धार्मिक महत्व।
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मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए बनाई जाती है रंगोली
हिंदू धर्म में दिवाली को मां लक्ष्मी के आगमन का पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों के घरों में प्रवेश करती हैं। यही वजह है कि दिवाली पर लोग अपने घरों की अच्छी तरह सफाई करते हैं और मुख्य दरवाजे पर रंगोली बनाते हैं।
ऐसा माना जाता है कि सुंदर और आकर्षक रंगोली मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक होती है। लोग रंगोली के जरिए देवी लक्ष्मी को अपने घर आने का निमंत्रण देते हैं। यही कारण है कि कई घरों में रंगोली के बीच कमल का फूल, माता लक्ष्मी के चरण चिह्न और शुभ-लाभ जैसे प्रतीक बनाए जाते हैं।
रंगोली को माना जाता है शुभता और समृद्धि का प्रतीक
भारतीय परंपरा में रंगोली को शुभता, सौभाग्य और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। किसी भी शुभ काम, त्योहार, पूजा या मांगलिक अवसर पर घर के दरवाजे पर रंगोली बनाने की परंपरा रही है। दिवाली पर रंगोली बनाने के पीछे मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मकता आती है और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। रंगोली के सुंदर रंग जीवन में खुशियों, उत्साह और नई ऊर्जा का संदेश देते हैं।
रंगोली से जुड़ी है मां लक्ष्मी के चरण चिह्न बनाने की परंपरा
दिवाली के दौरान कई घरों में मुख्य दरवाजे से लेकर पूजा स्थल तक मां लक्ष्मी के छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं। इन्हें लक्ष्मी चरण कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ये चरण चिह्न मां लक्ष्मी के घर में प्रवेश करने का प्रतीक हैं। लोग इन्हें इस तरह बनाते हैं कि पैरों के निशान घर के अंदर की ओर आते हुए दिखाई दें। इसका भाव यह होता है कि मां लक्ष्मी घर में पधारें और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें।
रंगोली के हर रंग का होता है खास महत्व
रंगोली में इस्तेमाल होने वाले रंग सिर्फ घर की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नहीं होते, बल्कि हर रंग का अपना एक खास महत्व भी होता है। भारतीय संस्कृति में लाल रंग को शक्ति, उत्साह और शुभता का प्रतीक माना जाता है। वहीं पीला रंग ज्ञान, खुशहाली और सकारात्मकता का संदेश देता है। हरा रंग प्रकृति, तरक्की और नई शुरुआत से जुड़ा है, जबकि सफेद रंग शांति, पवित्रता और सादगी को दर्शाता है। इसी तरह नीला रंग शांति और स्थिरता का प्रतीक माना जाता है, तो नारंगी रंग ऊर्जा, उमंग और उत्साह को दिखाता है। यही वजह है कि रंगोली में अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल केवल सजावट के लिए नहीं, बल्कि शुभता और सकारात्मकता का संदेश देने के लिए भी किया जाता है।
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रंगोली बनाने की परंपरा कितनी पुरानी है?
भारत में रंगोली बनाने की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग-अलग नामों और तरीकों से बनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे रंगोली, तमिलनाडु में कोलम, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मुग्गु, कर्नाटक में रंगोली और पश्चिम बंगाल में अल्पना कहा जाता है। कई जगहों पर चावल के आटे, फूलों, हल्दी, कुमकुम और प्राकृतिक रंगों से सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं। पहले के समय में घरों के आंगन और दरवाजों पर चावल के आटे से डिजाइन बनाने की परंपरा भी थी। इसका संबंध धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति अपनापन दिखाने से भी जोड़ा जाता है।
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