Masik Shivratri 2026: आश्विन मास की चतुर्दशी पर इस विधि से करें शिव-शक्ति की पूजा, जीवन के कष्ट होंगे दूर

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मासिक शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। शिव भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और दिनभर भगवान महादेव का स्मरण करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से भक्तों को सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
यह भी कहा जाता है कि, चतुदर्शी की रात्रि में शिव-शक्ति की ऊर्जा अत्यधिक प्रबल होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं। आइए जानते हैं तिथि, मुहूर्त, आरती और आसान पूजा विधि...
मासिक शिवरात्रि का पूजा मुहूर्त
निशिता काल यानी मध्यरात्रि के समय शिवरात्रि की पूजा के लिए सबसे खास माना जाता है। 8 अक्टूबर
आज रात मासिक शिवरात्रि की पूजा होगी। पंचांग के अनुसार, पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11 बजे से 11 बजकर 49 मिनट तक रहेगा।
पूजा विधि
- भगवान शिव की पूजा में सबसे पहले शिवलिंग का अभिषेक करें।
- शिवलिंग का अभिषेक जल, दूध, दही, शुद्ध घी, शहद, शक्कर या चीनी, गंगाजल तथा गन्ने के रसे आदि से करें।
- अभिषेक के दौरान ॐ नमः शिवाय मंत्र का जाप करें।
- अभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, समीपत्र, कुशा तथा दुर्बा आदि चढ़ाएं।
- पूजा के दौरान गाय के घी का दीपक जलाएं।
- शिव जी को भोग के रूप में गांजा, भांग, धतूरा तथा श्री फल (नारियल) समर्पित करें।
- पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करें।
- रात्रि के समय शिव मंत्रों का जाप करें।
- अगले दिन भगवान शिव की पूजा करें और दान आदि करने के बाद अपना उपवास खोलें।
शिव जी की आरती
ऊं जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा
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Created On :   8 Oct 2026 5:58 PM IST











