Narada Jayanti 2026: नोट कर लें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

डिजिटल डेस्क, भोपाल। देवताओं के ऋषि कहे जाने वाले "नारद मुनि" की जयंती वैशाख कृष्ण प्रतिपदा के दिन उनके जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। इस साल यह 02 मई, शनिवार को है। बता दें कि नारद मुनि भगवान विष्णु के परम भक्त हैं। इसलिए नारद जयंती के अवसर पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने के बाद ही नारद मुनि की पूजा की जाती है। ऐसा करने से व्यक्ति के ज्ञान में वृद्धि होती है। इसके बाद गीता और दुर्गासप्तशती का पाठ करना चाहिए।
पुराणों के अनुसार नारद मुनि के पिता ब्रह्राजी है। नारद मुनि हमेशा तीनो लोकों में भ्रमणकर सूचनाओं का आदान-प्रदान करते थे। नारद मुनि का आदर सत्कार न केवल देवी-देवता, मुनि किया करते थे बल्कि असुरलोक के राजा समेत सारे राक्षसगण भी उन्हें सम्मान दिया करते थे। आइए जानते हैं नारद जयंती से जुड़ी कथा के बारे में...
नारद मुनी को हम सभी ने पौराणिक कथाओं में एक जगह से दूसरी जगह का विचरण का सूचनाओं का आदान प्रदान करते हुए देखा या सुना है। वैदिक पुराणों के अनुसार देवऋषि नारद एक सार्वभौमिक दिव्य दूत और देवताओं के बीच जानकारी के प्राथमिक स्रोत हैं। नारद मुनि में सभी किशोर लोक, आकाश या स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल की यात्रा करने की क्षमता है। ऐसा भी माना जाता है कि यह पृथ्वी पर पहले पत्रकार हैं। नारद मुनि सूचनाओं को फैलाने के लिए ब्रह्मांड में भ्रमण करते रहते हैं। हालाँकि, उनकी अधिकांश समय पर जानकारी परेशानी पैदा करती है, लेकिन यह ब्रह्मांड की बेहतरी के लिए है।
जन्म कथा
पुराणों के अनुसार नारद मुनि का जन्म ब्रह्मा जी की गोद में हुआ था। लेकिन इसके लिए उन्हें अपने पिछले जन्मों में कड़ी तपस्या से गुजरना पड़ा था। कहा जाता है कि पूर्व जन्म में नारद मुनि गंधर्व कुल में पैदा हुए थे और उनका नाम "उपबर्हण" था। पौराणिक कथाओं के अनुसार उन्हें अपने रूप पर बहुत ही घमंड था। एक बार कुछ अप्सराएं और गंधर्व गीत और नृत्य से भगवान ब्रह्मा की उपासना कर रहे थे। तब उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वहां आया। ये देख ब्रह्मा जी अत्यंत क्रोधित हो उठे और उस उपबर्हण को श्राप दे दिया कि वह "शूद्र योनि" में जन्म लेगा।
ब्रह्मा जी के श्राप से उपबर्हण का जन्म एक शूद्र दासी के पुत्र के रूप में हुआ। दोनों माता और पुत्र सच्चे मन से साधू संतो की सेवा करते। पांच वर्ष की आयु में उसकी मां की मृत्यु हो गई। मां की मृत्यु के बाद उस बालक ने अपना पूरा जीवन ईश्वर की भक्ति में लगाने का संकल्प लिया। कहते हैं एक दिन जब वह बालक एक वृक्ष के नीचे ध्यान में बैठा था तब अचानक उसे भगवान की एक झलक दिखाई पड़ी जो तुरंत ही अदृश्य हो गई।
इस घटना ने नन्हें बालक के मन में ईश्वर को जानने और उनके दर्शन करने की इच्छा जाग गई। निरंतर तपस्या करने के बाद एक दिन अचानक आकाशवाणी हुई कि इस जन्म में उस बालक को भगवान के दर्शन नहीं होंगे बल्कि अगले जन्म में वह उनके पार्षद के रूप उन्हें पुनः प्राप्त कर सकेगा। अपने अगले जन्म में यही बालक ब्रह्मा जी के ओरस पुत्र कहलाए और पूरे ब्रम्हांण में नारद मुनि के नाम से प्रसिद्ध हुए।
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Created On :   2 May 2026 6:12 PM IST














