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नाराजगी: सिंहस्थ कुंभ मेले को लेकर महंत और पुरोहितों ने जताई चिंता, कहा- धार्मिक आस्थाओं पर ध्यान नहीं

Nashik News. 36 हजार करोड़ रुपए के नाशिक सिंहस्थ कुंभ की तैयारियों को लेकर महंत और पुरोहितों में नाराजगी है। उनका कहना है कि प्रशासन अंधाधुंध निर्माण कार्यों में जुटा है, लेकिन धार्मिक परंपराओं की अनदेखी की जा रही है, जबकि पूरा सिंहस्थ इन्हीं परंपराओं पर आधारित है। सिंहस्थ साधुओं और श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है। कुंभ की कई कमेटियों में साधु और पुरोहितों को शामिल तो किया गया है, लेकिन केवल खानापूर्ति के लिए। अब तक उनकी एक भी बात नहीं मानी गई। इस मुद्दे पर दैनिक भास्कर कार्यालय पहुंचे बड़ा लक्ष्मीनारायण मंदिर के श्रीमहंत रामस्नेहीदास महाराज, सिंहस्थ समिति के अध्यक्ष सतीश शुक्ल और पुरोहित संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर पंचाक्षरी ने खुलकर अपनी बात रखी।
कर्मकांड के लिए शुद्ध जल साधुओं की पहली प्राथमिकता
साधु-संतों का कहना है कि सिंहस्थ की आत्मा गोदावरी नदी में स्नान और कर्मकांड है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की भी यही प्राथमिकता रहती है। उन्होंने प्रशासन से कहा था कि सभी कार्यों में पहली प्राथमिकता गोदावरी में शुद्ध जल उपलब्ध कराना होनी चाहिए, लेकिन प्रशासन का ध्यान अन्य निर्माण कार्यों पर केंद्रित है। मौजूदा स्थिति में रामकुंड, जहां श्रद्धालु रोज पूजा-पाठ करते हैं, वहां का पानी अत्यधिक प्रदूषित है। इस संबंध में लंबे समय से मांग की जा रही है। साधुओं के ठहरने के लिए मठों में पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। प्रशासन न तो स्वयं नए निर्माण कर रहा है और न ही साधु-संतों को निर्माण की अनुमति दे रहा है। ऐसे में साधुओं के ठहरने की समस्या बनी हुई है। करीब 1200 एकड़ जमीन लेने की चर्चा हो रही है, लेकिन अभी तक उस पर कोई ठोस काम नजर नहीं आ रहा। तपोवन साधुग्राम की भूमि है, जो लक्ष्मीनारायण मंदिर द्वारा दी गई है। यहां भी नई समस्याएं खड़ी हो गई हैं। अब साधु-संत साधुग्राम छोड़कर कहीं और नहीं जा सकते।
प्रशासन ने साधुओं की राय लेना ही छोड़ दिया
सिंहस्थ समिति के अध्यक्ष सतीश शुक्ल ने बताया कि शुरुआत में कुछ बैठकों में साधु-पुरोहितों को बुलाया गया था। उन्होंने सिंहस्थ के लिए जरूरी कार्यों को प्राथमिकता देने की सलाह दी थी, लेकिन उन पर अमल नहीं हुआ। इसके बाद उन्हें बैठकों में बुलाना भी बंद कर दिया गया। रामकुंड क्षेत्र में पूजा में उपयोग होने वाली मिठाई की दुकानों को तो हटा दिया गया, लेकिन शराब और मांस की दुकानें अब भी संचालित हैं। श्रद्धालुओं के लिए न तो पूजा हेतु शुद्ध जल उपलब्ध है और न ही पीने के पानी की ही पर्याप्त व्यवस्था है। महिलाओं के कपड़े बदलने की जगह पहले ही तोड़ दी गई, लेकिन अब तक कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। यह जरूरी नहीं कि केवल सिंहस्थ के समय ही व्यवस्था की जाए। यहां रोज हजारों और विशेष अवसरों पर लाखों श्रद्धालु आते हैं, लेकिन उनकी सुविधाओं की अनदेखी की जा रही है। प्रशासन और मंत्रियों की कार्यशैली को लेकर लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है।
पारंपरिक निर्माण तोड़े, जिन्हें देखने लोग आते हैं
पुरोहित संघ के अध्यक्ष चंद्रशेखर पंचाक्षरी ने कहा कि प्रशासन बिना साधु-पुरोहितों की सलाह लिए निर्माण कार्य कर रहा है। निर्माण करना अच्छी बात है, लेकिन पारंपरिक महत्व की संरचनाओं को ही तोड़ दिया गया। दत्त मंदिर, गौमुख और पारंपरिक कुंडों को नुकसान पहुंचाया गया है। यहां की सीढ़ियों का भी विशेष महत्व है, जिन्हें सुधारने के बजाय हटा दिया गया, जबकि ये सीढ़ियां अहिल्यादेवी होलकर द्वारा विशेष रूप से बनवाई गई थीं। रामकुंड और लक्ष्मण कुंड में पर्याप्त पानी नहीं है। मान्यता है कि यहां के जल के स्पर्श मात्र से पापों से मुक्ति मिलती है, लेकिन अब पानी की स्थिति ऐसी नहीं रही। पुरोहितों को यजमानों को आचमन के लिए बोतलबंद पानी देना पड़ रहा है, जबकि आम लोग अनजाने में उसी प्रदूषित पानी का उपयोग कर रहे हैं।
नाशिक का पारंपरिक इतिहास-भूगोल बदला गया तो होगा जल आंदोलन
सतीश शुक्ल ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने सही तरीके से काम नहीं किया और नाशिक के इतिहास व भूगोल से छेड़छाड़ की गई, तो इसके खिलाफ जन आंदोलन किया जाएगा। जरूरत पड़ी तो संघर्ष भी किया जाएगा। साधु-महंतों और पुरोहित संघ के सदस्यों ने स्पष्ट किया कि इतने बड़े बजट के बावजूद यदि योजनाबद्ध तरीके से काम नहीं हुआ, तो कुंभ मेले की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
Created On :   29 April 2026 8:40 PM IST












