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सीख: हनुमानजी से सीखें सेवा भाव, इस तरह करें लोगों की मदद

सीख: हनुमानजी से सीखें सेवा भाव, इस तरह करें लोगों की मदद

डिजिटल डेस्क, मुंबई।ma आज पूरी दुनिया कोरोनावायरस महामारी से जूझ रही है। विश्व में व्याप्त ऐसी परिस्थितियों में सबसे अधिक आवश्यकता है सेवा भाव की। हमारे पास जो वस्तु दूसरों से कुछ अधिक है, उसे ऐसे लोगों को दान करना चाहिए जिसके लिए कई लोग जीवन- मरण के बीच संघर्ष कर रहें हैं। पं.सुदर्शन शर्मा शास्त्री का कहना है ​​कि सेवाभाव हमें हनुमान जी से सीखना चाहिए। खास तौर पर उन लोगों को जो आज, सेवाभाव के स्थान पर पार्टी या संस्था राजनीति अथवा प्रसिद्धि की होड़ में लगे हैं। ऐसे लोग आवश्यक सामग्री का वितरण करते समय फोटो क्लिक करते हैं। 

हमें दान- पुण्य करते समय दिखावा नहीं करना चाहिए। इसलिए गुप्त दान का भी अलग ही महत्व है। फिलहाल हम जानते हैं सेवा भाव के बारे में, जो सप्त चिरंजीवो में से एक महावीर श्री हनुमानजी में देखने को मिलता है। आइए जानते हैं इसके बारे में...

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हनुमानजी के चरित्र से कुछ प्रसंग
- पुराणों के अनुसार, हनुमान जी अष्ट सिद्धि नवनिधियों के दाता हैं। इसके बाद भी हनुमानजी विनयशील थे। सेवाभावी थे श्री हनुमानजी के चरित्र से कुछ प्रसंग, जिसमें स्वयं को सबसे दीन मानना-
श्री हनुमंत लाल स्वयं का सबसे दीन मानते थे, भक्त की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि ‘ तृणादपि सुनिचेन तरोरपि सहिष्णुना’ वह तृण से भी छोटा और वृक्ष से भी सहिष्णु होता है।

- लंका में विभीषण से जब हनुमानजी की भेंट हुई तब रामकथा सुनाने के बाद विभीषण ने उनका नाम पूछा तब हनुमानजी कहते हैं, प्रातः लेई जो नाम हमारा, तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा! हनुमानजी कहते हैं कि हमारा क्या नाम है, अरे हम तो ऐसे हैं कि जिसने भी हमारा नाम सुबह ले लिया उस दिन उसे भोजन नसीब नहीं होता। इस प्रकार स्वयं को दीन बतलाया।

प्रशंसा की भूख नहीं
- विशाल समुद्र को लांघ कर रावण की लंका में आग लगाकर जब पवनपुत्र भगवान रामजी के पास पहुंचे तो सारा वृतांत कह सुनाया। तब उस वृतांत में भी स्वयं की कोई प्रशंसा नहीं की। उनकी बातों में गर्व का अंश भी नहीं था। ना ही प्रशंसा की भूख नहीं मन में थी।
- जब भगवान राम ने हनुमानजी की प्रशंसा करते हुए कहा कि, हे अंजनिनंदन, इतना बड़ा कार्य तुमने किया, सौ योजन का समुद्र लांघा। तब हनुमंतलला ने बड़ी विनम्रता से कहा, प्रभु इसमे मेरा कोई सामर्थ्य नहीं है। 

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सीतारामजी की कृपा
- प्रभू मुद्रिका मेल मुख माही! ये सब प्रताप तो आपकी मुद्रिका यानि अंगुठी का था उसे मुंह में रख कर ही मैं सागर पार कर पाया। यह सुनकर श्रीराम मुस्कुराए, कहा चलो मान लिया कि तुम जब यहां से समुद्र लांघ रहे थे तब तुम्हारे पास मुद्रिका थी उसी मुद्रिका का ये प्रताप था। किंतु वापस आते समय तो तुम्हारे पास मुद्रिका नहीं थे वो तो तुम जानकीजी को सौंप आये थे फिर कैसे पार किया? इस पर हनुमानजी ने बड़ी विनम्रता से कहा, प्रभु आपका कथन सर्वथा सत्य है। समुद्र के इस पार से उस पार तो आपकी मुद्रिका ने लगाया और वापसी में मां जानकी ने कृपा कर अपनी चूड़ामणि मुझे दी। उसी चूड़ामणि के ही सामर्थ्य से समुद्र का उल्लंघन कर वापस आया। ये सब सीतारामजी की कृपा से संभव हुआ  इसमें मेरा कोई बिसात नहीं हैं प्रभू।

यश- नाम छोड़ा
- रामजी ने अगला प्रश्न किया हनुमान, लंका कैसे जली, तो हनुमानजी ने कहा प्रभू, लंका को जलाया आपके प्रताप ने, लंका को जलाया रावण के पाप ने, लंका को जलाया मां जानकी के श्राप ने, इस प्रकार हनुमान ने यश छोड़ा, नाम छोड़ा, यहां तक कि अपना रूप भी छोड़ा, वानर बन कर आये। हनुमानजी के इन्हीं सब त्याग को देखकर भगवान राम आत्मविभोर हो गये, गदगद स्वर में राघुनाथजी ने हनुमानजी को कहा, सहस वदन तुम्हारो यश गावे, इसलिये हे पवनपुत्र, तुम त्याग समपर्ण, भक्ति और सेवा के आदर्श हो इसी कारण सारी दुनिया तुम्हारे यश का गान करेगी।

इसलिये आज हम देखते हैं विश्व में सर्वाधिक रूप से गाई जाने वाली कोई स्तुति हैं तो वो हैं ‘हनुमान चाहिसा’। इसलिये हनुमानजी के आदर्श को सामने रखें और जरूरतमंदों की सेवा सहायता करें, लेकिन प्रशंसा या विज्ञापन का भाव मन में न रखें, दीन बन जायें जिससे आपमें भी विनम्रता का भाव जागृत हो। 

साभार: पं.सुदर्शन शर्मा शास्त्री, अकोला

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Raj kumar Gurung May 20th, 2020 00:32 IST

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