डॉ. स्वप्नराग स्वैन, एसोसिएट प्रोफेसर, मार्केटिंग एवं अध्यक्ष एमबीए, भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), बोधगया

आईआईएम बोधगया में मार्केटिंग की कक्षा के दौरान एक दिन टीकाकरण पर चर्चा हो रही थी। बात इस पर हुई कि सरकार बच्चों को कई जरूरी टीके मुफ्त उपलब्ध कराती है और टीकों की सुरक्षा और प्रभावशीलता के प्रमाण भी मौजूद हैं। तभी एक छात्र ने हाथ उठाकर पूछा, “जब टीके मुफ्त हैं, आसानी से उपलब्ध हैं और प्रभावी भी हैं, तो कुछ माता-पिता अभी भी अपने बच्चों को टीका लगवाने से क्यों मना करते हैं?” सवाल बिल्कुल सही था। लेकिन मुझे इससे भी ज्यादा एक दूसरी बात ने सोचने पर मजबूर किया। कक्षा में मौजूद किसी भी छात्र ने यह नहीं सोचा कि इस सवाल का जवाब देने और लोगों का भरोसा बढ़ाने में उसकी भी कोई भूमिका हो सकती है।
भारत के टीकाकरण कार्यक्रम ने पिछले वर्षों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत 12 बीमारियों से बचाव के लिए मुफ्त टीके उपलब्ध हैं। देश में 87.1 प्रतिशत से अधिक बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हो चुका है और जिन बच्चों को अब तक एक भी टीका नहीं लगा है, उनकी संख्या जन्म लेने वाले बच्चों की कुल संख्या का केवल 0.06 प्रतिशत रह गई है। टीकों को सही तापमान पर रखने से लेकर उन्हें बच्चों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी लगातार बेहतर हुई है। आशा कार्यकर्ता और स्वास्थ्यकर्मी इस काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बिहार सहित कई राज्यों में टीकाकरण का स्तर पहले की तुलना में काफी बेहतर भी हुआ है। फिर भी कुछ चुनौतियां अभी बाकी हैं।
मान लीजिए किसी माता-पिता के मन में अपने बच्चे को टीका लगवाने को लेकर कोई सवाल या डर है। अगर उन्हें सही समय पर आसान भाषा में सही जवाब नहीं मिलता, तो वे किसी रिश्तेदार, पड़ोसी या सोशल मीडिया पर मिली जानकारी पर भरोसा कर सकते हैं। टीकों को लेकर फैली अफवाहें और गलत धारणाएं इस समस्या को और बढ़ा देती हैं। इसलिए केवल टीके उपलब्ध कराना ही काफी नहीं है। जरूरी है कि परिवारों तक ऐसी जानकारी भी पहुंचे, जिस पर वे भरोसा करें, जिसे वे आसानी से समझ सकें और जिसे कोई ऐसा व्यक्ति बताए, जिस पर वे आसानी से विश्वास कर सकें।
भारत में 53.5 करोड़ से अधिक लोग व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं। यह सही जानकारी पहुंचाने का बड़ा माध्यम है, लेकिन गलत जानकारी और अफवाहें फैलाने का भी बड़ा जरिया बन गया है। टीकों को लेकर प्रजनन क्षमता पर असर पड़ने या गंभीर नुकसान होने जैसी गलत बातें कई बार व्हाट्सऐप समूहों में तेजी से फैलती हैं। वर्ष 2017 में खसरा-रूबेला टीकाकरण अभियान के दौरान इसका एक उदाहरण सामने आया। व्हाट्सऐप पर एक ऑडियो संदेश तेजी से फैला, जिसमें माता-पिता को बच्चों को टीका न लगवाने की चेतावनी दी गई थी। इसका असर तमिलनाडु और कर्नाटक के साथ-साथ मुंबई और दिल्ली के कुछ हिस्सों में भी देखने को मिला। कुछ जगहों पर माता-पिता और स्कूलों ने स्वास्थ्यकर्मियों की सलाह पर भी भरोसा नहीं किया। यानी गलत जानकारी अक्सर सही जानकारी से भी तेज गति से लोगों तक पहुंच सकती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसी स्थिति के लिए ‘इन्फोडेमिक’ शब्द का इस्तेमाल करता है। इसका मतलब है ऐसी स्थिति, जिसमें सही जानकारी के साथ गलत और भ्रामक जानकारी भी बहुत तेजी से फैलती है। दक्षिण एशियाई देशों में आज भी बहुत से बच्चे टीकों से वंचित हैं। इसका कारण केवल यह नहीं है कि उन्हें टीके नहीं मिल पाए, बल्कि कई बार गलत जानकारी और अफवाहों के कारण माता-पिता अपने बच्चों को टीका नहीं लगवाते। इसलिए गलत जानकारी का मुकाबला भी उसी माध्यम से करना जरूरी है, जहां से वह फैल रही है। इस काम में भारत के युवा महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अक्सर देखा गया है कि टीकाकरण को लेकर झिझक रखने वाले लोगों पर किसी विज्ञापन या सरकारी संदेश की तुलना में अपने परिचित और भरोसेमंद व्यक्ति की बात का अधिक असर होता है। भरोसा केवल संस्थाओं से नहीं बनता, बल्कि व्यक्तिगत संबंधों से भी बनता है। एक युवा डॉक्टर अगर अपने परिवार या किसी परिचित को टीकों के बारे में सही जानकारी देता है, तो उसकी बात ज्यादा आसानी से सुनी जा सकती है। इसी तरह कोई युवा पेशेवर अपने समुदाय या आवासीय सोसायटी के समूह में साझा की गई गलत जानकारी की सच्चाई बता सकता है। इस तरह सही जानकारी उन लोगों तक भी पहुंच सकती है, जो शायद सरकारी वेबसाइट या आधिकारिक स्रोतों को कभी नहीं देखते।
युवाओं की डिजिटल समझ इस काम को और मजबूत बना सकती है। वे जानते हैं कि सोशल मीडिया पर कोई अफवाह कितनी तेजी से फैल सकती है और भ्रामक शीर्षक लोगों को किसी संदेश को बिना जांचे आगे भेजने के लिए कैसे प्रेरित करते हैं। कनाडा में चलाए गए SAY-VAC कार्यक्रम ने इसका एक अच्छा उदाहरण पेश किया। इसमें दक्षिण एशियाई युवाओं को टीकों के बारे में सही और वैज्ञानिक जानकारी दी गई। इसके बाद इन युवाओं ने अपने परिवारों और समुदायों में सही जानकारी साझा की। उनकी बात इसलिए प्रभावी रही क्योंकि संदेश किसी अनजान संस्था की बजाय परिवार और समुदाय के परिचित व्यक्ति की ओर से आ रहा था। भारत में भी इस सोच को बड़े स्तर पर अपनाया जा सकता है।
बिहार की आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है। आज के यही युवा कल माता-पिता बनेंगे और अपने परिवारों तथा समुदायों में स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। भारत में इस दिशा में काम करने की क्षमता भी बहुत बड़ी है। देश में इस समय 819 मेडिकल कॉलेज हैं, जहां हर साल 1.29 लाख से अधिक एमबीबीएस डॉक्टर तैयार होते हैं। इसके अलावा प्रबंधन, नर्सिंग और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों से भी हर साल बड़ी संख्या में युवा पेशेवर निकलते हैं। इन युवाओं को सही जानकारी और जरूरी कौशल देकर अपने परिवार और समुदाय तक स्वास्थ्य से जुड़ी सही बात पहुंचाने की मजबूत कड़ी बनाया जा सकता है।
अब आवश्यकता है कि युवाओं को केवल अपने पेशे से जुड़ी जानकारी ही न दी जाए, बल्कि उन्हें यह भी सिखाया जाए कि लोगों का भरोसा कैसे जीता जाए, स्वास्थ्य से जुड़ी गलत जानकारी को कैसे पहचाना जाए और सही जानकारी को आसान भाषा में कैसे साझा किया जाए। मेडिकल कॉलेजों में लोगों से प्रभावी तरीके से संवाद करना सामुदायिक चिकित्सा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा सकता है। स्वास्थ्य प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में भी व्यवहार और संवाद से जुड़ी शिक्षा को शामिल किया जा सकता है। पत्रकारिता के छात्रों को स्वास्थ्य से जुड़ी गलत जानकारी की पहचान करने और तथ्यों के आधार पर उसका जवाब देने के लिए तैयार किया जा सकता है।
हर कॉलेज और शिक्षण संस्थान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। छात्र मिलकर जागरूकता अभियान चला सकते हैं और अपने साथियों, परिवारों तथा आसपास के लोगों तक टीकों से जुड़ी सही जानकारी पहुंचा सकते हैं। शिक्षक जिला टीकाकरण टीमों के साथ मिलकर छात्रों को इस काम से जोड़ सकते हैं, जबकि राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से छात्र स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर समुदाय तक पहुंच बना सकते हैं। इन पहलों के लिए बहुत अधिक धन की आवश्यकता नहीं है। जरूरत है सही दिशा, आपसी सहयोग और काम करने की इच्छा की। देश में आशा कार्यकर्ताओं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और जिला स्तर की टीकाकरण व्यवस्था का मजबूत नेटवर्क पहले से मौजूद है। अब जरूरत है कि इस व्यवस्था को युवाओं और डिजिटल माध्यमों से जोड़ा जाए, ताकि सही जानकारी उन परिवारों तक भी पहुंच सके जहां टीकों को लेकर सवाल, संदेह या गलत धारणाएं हैं।
शायद यही उस सवाल का जवाब भी है, जो आईआईएम बोधगया की कक्षा में एक छात्र ने पूछा था—“जब टीके मुफ्त हैं, आसानी से उपलब्ध हैं और प्रभावी हैं, तो कुछ माता-पिता अपने बच्चों को टीका क्यों नहीं लगवाते?” इस सवाल का जवाब केवल सरकार या स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। हमारे युवा भी इसका हिस्सा बन सकते हैं। दरअसल, सही स्वास्थ्य जानकारी पहुंचाने के लिए भारत को नए संदेशवाहकों को बाहर से खोजने की जरूरत नहीं है। हमारे बीच पहले से ही युवा डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, पत्रकार, प्रबंधन विशेषज्ञ और दूसरे युवा पेशेवर मौजूद हैं। जरूरत केवल इतनी है कि उन्हें इस भूमिका के लिए तैयार किया जाए, सही जानकारी और जरूरी कौशल दिए जाएं और मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा जाए। जब ये युवा अपने परिवारों, साथियों और समुदायों तक सही जानकारी पहुंचाएंगे, तो वे न केवल गलत जानकारी का मुकाबला करने में मदद करेंगे, बल्कि लोगों का टीकों पर भरोसा भी बढ़ाएंगे। यही युवा आने वाले समय में हर बच्चे तक सही जानकारी पहुंचाने और टीकाकरण को मजबूत बनाने की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं।
Created On :   17 Sept 2026 2:14 PM IST












