महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स नहीं, सही स्किनकेयर ज़रूरी: डॉक्टरों ने बताया क्यों बदलनी चाहिए त्वचा की देखभाल की सोच

महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स नहीं, सही स्किनकेयर ज़रूरी: डॉक्टरों ने बताया क्यों बदलनी चाहिए त्वचा की देखभाल की सोच

16th October 2026: इंदौर के डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. अतुल जैन और एपिसेंज़ स्किन साइंस के संस्थापक डॉ. गीतेंद्र सिंह के अनुसार, स्किनकेयर में बढ़ते ट्रेंड्स और भ्रामक दावों के बीच वैज्ञानिक जानकारी, त्वचा की ज़रूरत और नियमित देखभाल को प्राथमिकता देना ज़रूरी है।

बाथरूम की शेल्फ पर आठ-दस बोतलें रखी हैं। हर बोतल के पीछे किसी वीडियो की सिफारिश है और हर एक से चमकदार त्वचा का वादा। इसके बाद भी चेहरा पहले से ज़्यादा लाल, संवेदनशील और बेजान दिखे, तो सवाल उत्पादों की संख्या पर उठना चाहिए, त्वचा पर नहीं।

सोशल मीडिया पर "ग्लास स्किन" जैसे ट्रेंड्स ने कई चरणों वाले रूटीन को आम बना दिया है। त्वचा विशेषज्ञों के मुताबिक, इन्हें दोहराने की कोशिश में बहुत से लोग त्वचा पर ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें आज़मा लेते हैं। जलन, संवेदनशीलता और रैशेज़ को वे "पर्जिंग" यानी त्वचा की सफाई की प्रक्रिया मान बैठते हैं। जबकि ये संकेत अक्सर इस बात के होते हैं कि त्वचा पर दबाव बढ़ चुका है।

भारतीय महिलाओं पर हुए अध्ययनों में भी यही तस्वीर दिखती है। इन अध्ययनों में करीब 35 से 44 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कॉस्मेटिक उत्पादों के इस्तेमाल के बाद किसी न किसी प्रतिकूल असर की बात कही। इन समस्याओं में स्किनकेयर उत्पादों की हिस्सेदारी भी उल्लेखनीय रही। यानी दिक्कत सिर्फ दिखावे की नहीं, रोज़मर्रा की आदतों की भी है।

चार भ्रम, जो त्वचा पर भारी पड़ते हैं

डॉ. अतुल जैन, जो इंदौर में प्रैक्टिस करने वाले डर्मेटोलॉजिस्ट हैं, मरीज़ों के बीच चार धारणाओं को सबसे आम बताते हैं।

  • महंगा मतलब बेहतर: कीमत से यह तय नहीं होता कि उत्पाद आपकी त्वचा के लिए सही है या नहीं।
  • जितनी जलन, उतना असर: लगातार चुभन या लालिमा असर का नहीं, परेशानी का संकेत है।
  • नेचुरल मतलब सुरक्षित: नींबू, बेकिंग सोडा या दरदरे स्क्रब जैसे घरेलू नुस्खे भी त्वचा को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
  • ज़्यादा एक्टिव्स, तेज़ नतीजे: एक साथ कई एक्टिव सामग्रियाँ लगाने से जलन का जोखिम बढ़ता है।

डॉ. जैन कहते हैं, "त्वचा को ज़्यादा प्रोडक्ट्स नहीं, सही जानकारी की ज़रूरत होती है। ज़रूरत से ज़्यादा प्रोडक्ट्स या बार-बार नए ट्रेंड आज़माने से त्वचा की सुरक्षा परत प्रभावित हो सकती है। सरल और नियमित देखभाल अक्सर ज़्यादा कारगर होती है।"

त्वचा की ढाल और भारतीय मौसम

त्वचा की सबसे बाहरी परत एक दीवार की तरह काम करती है। इसमें कोशिकाएँ ईंटों जैसी और प्राकृतिक तैलीय तत्व गारे जैसे होते हैं। यही परत नमी को रोकती है और बाहरी प्रदूषण व कीटाणुओं से बचाती है। तेज़ फेसवॉश, ज़रूरत से ज़्यादा स्क्रबिंग या एक्टिव्स की ओवरडोज़ से यह ढाल कमज़ोर पड़ती है। फिर त्वचा कसी हुई, खुरदुरी या असामान्य रूप से संवेदनशील लगने लगती है।

भारत में चुनौती और बड़ी है। तेज़ धूप, उमस, पसीना और प्रदूषण त्वचा को पहले से परख रहे होते हैं। हाल की रिपोर्ट्स में बेंगलुरु जैसे शहरों में यूवी इंडेक्स के बेहद ऊँचे स्तर का ज़िक्र आया है। सर्दियों की शुरुआत के साथ हवा की नमी घटती है और प्रदूषण बढ़ता है, जिससे त्वचा में रूखापन और खिंचाव आम हो जाता है। ऐसे में रोज़ाना सनस्क्रीन लगाना सौंदर्य का नहीं, सुरक्षा का मामला है।

कम चीज़ें, बेहतर देखभाल

विशेषज्ञ अब "स्किनिमलिज़्म" यानी न्यूनतम लेकिन असरदार देखभाल पर ज़ोर दे रहे हैं। इसका मतलब है तीन बुनियादी कदम: हल्का क्लींज़र, त्वचा को नमी देने वाला मॉइस्चराइज़र और दिन में सनस्क्रीन। इसके साथ कुछ आदतें भी मदद करती हैं।

  • एक समय में केवल एक नया उत्पाद शुरू करें।
  • नया उत्पाद पूरे चेहरे पर लगाने से पहले कान के पीछे या बाँह के भीतरी हिस्से पर पैच टेस्ट करें।
  • किसी रूटीन को असर दिखाने के लिए कम से कम कुछ हफ्ते दें, क्योंकि त्वचा की कोशिकाओं के नवीकरण में समय लगता है।
  • मौसम बदलने पर उत्पाद का टेक्सचर बदलें, जैसे गर्मी में जेल और सर्दी में कुछ गाढ़ा मॉइस्चराइज़र।
  • मुँहासे, पिगमेंटेशन या जलन बनी रहे तो डर्मेटोलॉजिस्ट से सलाह लें।

जब विज्ञान केंद्र में हो

इसी सोच के साथ मुंबई स्थित स्टार्टअप एपिसेंज़ स्किन साइंस की शुरुआत हुई है। नाम में ही इसका संकेत है। "एपि" यानी एपिडर्मिस, यानी त्वचा, और "सेंज़" यानी उसकी ज़रूरत को महसूस करना। इसके पीछे डॉक्टरों और विशेषज्ञों की एक टीम है और ब्रांड का आधार किसी सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर का चेहरा नहीं, बल्कि विज्ञान है।

कंसल्टेंट फिज़िशियन और एपिसेंज़ के संस्थापक व सीईओ डॉ. गीतेंद्र सिंह कहते हैं, "हमारी त्वचा कोई बिलबोर्ड नहीं, एक अंग है। उसे विज्ञान पर आधारित देखभाल चाहिए, किसी सेलिब्रिटी या इन्फ्लुएंसर के दावों पर नहीं। यही सोच एपिसेंज़ की बुनियाद है।"

विशेषज्ञों का साझा संदेश यही है कि साक्ष्य हाइप से ऊपर है, त्वचा का स्वास्थ्य सुंदरता के वादों से ऊपर है, और निरंतरता जटिलता से ऊपर है। अगली बार जब कोई नया ट्रेंड शेल्फ में जगह माँगे, तो पहले यह पूछना बेहतर होगा कि त्वचा को असल में क्या चाहिए।

Created On :   16 Oct 2026 3:00 PM IST

Tags

Next Story