दैनिक भास्कर हिंदी: जवानी में कोठे पर गए, बुढ़ापे में महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोने को लेकर विवादों में रहे महात्मा गांधी

January 30th, 2019

हाईलाइट

  • महात्मा गांधी की जीवन यात्रा बेहद उतार-चढ़ाव वाली रही है।
  • बहुत कम लोग ही जानते हैं कि गांधी जी अपनी युवावस्था में गलत सोहबत के चलते गलत रास्तों पर भी चले।
  • अपनी आत्मकथा में गांधी जी कह चुके हैं कि वे कोठे पर भी गए, चोरियां भी कीं और उन्होंने सिगरेट भी पी।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। महात्मा गांधी की जीवन यात्रा बेहद उतार-चढ़ाव वाली रही है। आरंभिक जीवन में सत्य के साथ किए गए उनके प्रयोगों ने ही उन्हें एक नेक और अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित किया। बहुत कम लोग जानते हैं कि केवल तेरह साल की उम्र में वैवाहिक जीवन में बंधने वाले मोहनदास गलत सोहबत के चलते गलत रास्तों पर भी चले। कोठे पर गए, चोरियां कीं, सिगरेट पी और जाने क्या-क्या किया। 

पोरबंदर और राजकोट में बिताया उनका कुछ समय ऐसा भी था, जब वे बेहद कुंठाग्रस्त, दब्बू और कमजोर हुआ करते थे। लेकिन प्रयोगों के इस सिलसिले ने उन्हें अपने समय के सबसे अद्वितीय व्यक्ति के रूप में भी रूपांतरित किया। इन सब गलतियों से सबक लेते हुए उन्होंने सीख ली और यही वजह रही कि वे मोहनदास से महात्मा बने। उनकी 148 वीं जयंती पर प्रस्तुत हैं महात्मा गांधी के जीवन से जुड़े कुछ रोचक प्रसंग-

 


मेहताब से दोस्ती ने बदला जीवन

मोहनदास का स्कूली जीवन से ही अलग-थलग रहने का स्वभाव था। शेख मेहताब ही एकमात्र उनका मित्र था, जिससे वह मन की बातें कर लेते थे। शेख मेहताब वास्तव में उनका दोस्त नहीं, उनके बड़े भाई कर्णवदास का मित्र था। मोहनदस के ठीक विपरीत शेख मेहताब बेहद निडर और साहसी युवक था।

शायद यही वजह रही कि मोहनदास अपने इस मुसलमान मित्र की निडरता से बेहद प्रभावित थे। उनके मन में भी कहीं न कहीं उनके जैसा ही बनने की इच्छा थी। मेहताब ने उन्हें बताया कि मांस खाने से ताकत मिलती है। इसके बाद उन्होंने मांस खाने की भी कोशिश की, हालांकि गहराई से बैठे संस्कारों की वजह से इसमें में वह बुरी तरह असफल रहे। 


कोठे पर भी गए थे मोहनदास

उनके दमित व्यक्तित्व को देख कर मेहताब ने उन्हें वेश्यालय जाने की सलाह दी थी। अपने संस्कारों की वजह से मोहनदास इसके लिए राजी नहीं हुए। लेकिन जब मेहताब ने बहुत जोर डाला। उसने बताया कि इसमें क्या बुराई है। उसने बताया कि वेश्यालय जाने से उनके पौरुष का विकास होगा, तो इसे एक प्रयोग की तरह लेते हुए मोहनदास वेश्यालय जाने को राजी हो गए। मेहताब के साथ वह दबे-सहमे कोठे पहुंचे। मेहताब एक वेश्या के साथ अलग कमरे में चला गया और किशोर गांधी को एक अन्य महिला के हवाले कर दिया।

महिला के साथ अलग कमरे में पहुंचते ही गांधी जी थर-थर कांपने लगे। महिला ने उनकी हालत देखी तो उनकी हिम्मत बढ़ाते हुए कुछ छेड़छाड़ शुरू की। लेकिन जब कुछ देर तक इसका कोई असर नहीं दिखाई दिया तो महिला खीझ गई और उसने मोहनदास को धक्का देकर कमरे के बाहर निकाल दिया।

 


और बढ़ गया अपराधबोध

इस घटना से मोहनदास के बाल मन पर बहुत नकारात्मक असर डाला। वह अपराधबोध से भर गए। इस घटना के बाद महीनों उन्होंने किसी से बातचीत नहीं की। वेश्यालय जाना उनके संस्कारों के एकदम विपरीत था। मेहताब के लाभ बताने पर ही वह वहां जाने को राजी हुए थे। लेकिन इस घटना ने उनके अहंकार को गंभीर क्षति पहुंचाई। यह कदम उन्होंने कस्तूरबा से विवाह के बाद उठाया था। इसलिए वह बहुत ज्यादा ग्लानि से भी भर उठे। इस घटना के बाद उन्होंने अपने आपको फिर से नियमों में बांधने की कोशिश की। इस क्रम में सबसे पहले उन्होंने खुद को मेहताब से दूर कर लिया। 


चोरी कर पीते थे सिगरेट

मेहताब की दोस्ती से पहले मोहनदास जब हाईस्कूल में ही थे, तो चोरी-चुपके उन्हें सिगरेट पीने की लत लग गई थी। इस काम में उनके साथ उनके चचेरे भाई हुआ करते थे। चाचा के यहां से सिगरेट चुराते और दोनो खूब सिगरेट पीते थे। जब कभी सिगरेट नहीं मिलती, तो हरी सब्जियों के पत्तों की सिगरेट बनाकर पीते। कभी-कभी नौकरों के पैसे चुराकर सिगरेट खरीद लाते।

नौकरों के यहां जब ज्यादा चोरियां होने लगीं, तो सबकी नजर उनकी ओर गई। दोनों बुरी तरह अपराधबोध से भर गए। उन्होंने अपना अपराध स्वीकार तो नहीं किया, लेकिन अपराध से छुटकारे के लिए आत्महत्या करने का फैसला कर डाला था। 

 


जब आत्महत्या करने निकल पड़े थे मोहनदास

दोनों आत्महत्या करने जंगल गए। उन्होंने किसी से सुन रखा था कि धतूरा जहरीला होता है। वे धतूरा ढूंढने लगे। जब धतूरा खोज लिया तो फिर एक मंदिर गए। मृत्यु से पहले के संस्कार पूरे किए। उसके बाद एक मंदिर में धतूरा खाने जा पहुंचे। लेकिन धतूरा खाने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। उन्होंने बार-बार सोचा कि आत्महत्या करनी चाहिए या नहीं और अंतत: इस निष्कर्ष पर पहु्ंचे कि आत्महत्या करना बुद्धिमानी भरा फैसला नहीं है।

इसके बाद उन्होंने सोचा कि अपने परिजनों को इस बारे में बता कर चोरी का प्रयश्चित करूंगा, लेकिन बहुत हिम्मत जुटाने के बाद भी वह इस घटना के बारे में बता नहीं पाए। बाद में उन्होंने अपने पिता को पत्र लिख कर अपनी गलती स्वीकारी और फिर कभी ऐसी गलती नहीं दोहराने का वायदा किया।  

 


महिलाओं के साथ निर्वस्त्र सोने पर हुई आलोचना

मोहनदास के प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। गांधी के जीवन के अध्ययन से एक बात साफ हो जाती है। वह सबसे अधिक अपनी यौन कुंठाओं को लेकर परेशान रहे हैं। उनका लगभग पूरा जीवन इसी को साधने के प्रयोगों में बीता है। बुजुर्ग अवस्था में वह लगातार यौनेच्छाओं पर आधारित प्रयोग करते रहे। निकट सहयोगी रही मनुबेन, आभा, सुशीला नैयर, बीबी अम्तुस्सलाम, वीना, कंचन, लीलावती और मीरा के साथ निर्वस्त्र सो कर वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग किया करते थे। इन प्रयोगों को लेकर उनकी आलोचना करने वाले आश्रम में बहुत थे। लेकिन गांधी किसी की परवाह नहीं करते थे और अपने सहयोगियों से भी उनकी परवाह नहीं करने को कहा करते थे। उनके अनुसार वे प्रगति की राह के अवरोध थे जिन्हें वह नजरअंदाज करने की सलाह दिया करते थे।

मनुबेन से कहा था बेदाग निकलीं तो चरित्र आसमान चूमने लगेगा

मनुबेन ने अपनी डायरी में लिखा है कि आश्रम की लड़कियों में बापू के साथ सोने की होड़ लगी रहती थी। लेकिन बहुत सारे लोगों को उनका यह प्रयोग अच्छा नहीं लगता था। बहुत सारी लड़कियां भी उच्च मानसिक भूमि पर विकसित होने वाले इस रिश्ते को समझ नहीं पाती थीं और एक दो प्रयोगों में भाग लेने के बाद बाहर हो जाती थीं। धीरे-धीरे चर्चा बाहर भी होने लगी। मनुबेन ने अपनी डायरी में लिखा कि मेरा संदेह है कि अम्तुस्सलाम बेन, सुशीला बेन और कनुभाई ब्रहमचार्य के प्रयोगों का प्रचार करने में लगे थे। यह बात मैंने गांधी को बताई तो उन्होंने भी इससे सहमति जताई।

बापू ने मुझसे कहा कि अगर मैं इस प्रयोग में बेदाग निकल आई तो मेरा चरित्र आसमान चूमने लगेगा, मुझे जीवन में एक बड़ा सबक मिलेगा और मेरे सिर पर मंडराते विवादों के सारे बादल छंट जाएंगे। बापू का कहना था कि यह उनके ब्रह्मचर्य का यज्ञ है और मैं उसका पवित्र हिस्सा हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर सब साथ छोड़ जाएं, तब भी ईश्वर के आशीर्वाद से हम यह प्रयोग सफलतापूर्वक पूरा करेंगे और इस महापरीक्षा के बारे में सारी दुनिया को बताएंगे।

 

सरदार पटेल ने किया था खुल कर विरोध

गांधी के प्रयोगों के बारे में शुरू में तो कुछ नहीं पता चला, लेकिन जैसे-जैसे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई, उनके इर्द-गिर्द लगभग हमेशा भीड़ रहने लगी। जिसकी वजह से उनकी कोई गतिविधि गुप्त नहीं रह गई थी। आश्रम में प्राय: रोज ही चलने वाले प्रयोगों को जल्दी ही लोगों ने एक दूसरे को चटकारे लेकर बताना शुरू कर दिया। इससे गांधी के अनुयायी बहुत आहत हुए। सरदार वल्लभभाई पटेल ने कई बार खुले तौर पर इसका विरोध करते हुए ऐसे प्रयोग बंद करने का आग्रह किया था।

सरदार पटेल के साथ ही गोपाल कृष्ण गोखले और देवदास गांधी भी इसके विरोधी थे। सरदार पटेल ने गांधी से साफ कहा कि इन प्रयोगों से उनके अनुयायियों को पीड़ा हो रही है। उन्होंने 25 जनवरी 1947 को गांधी को लिखे एक पत्र में ऐसे प्रयोगों को भयानक भूल बताते हुए इन्हें तुरंत बंद कर देने का आग्रह किया था। 

खुद को मीरा और गांधी को कृष्ण मानती थीं मधुबेन

मनुबेन ने अपने जीवन के अंतिम साल एकदम अकेले काटे। गांधी की हत्या के बाद करीब 21 वर्ष तक वे गुजरात में भावनगर के निकट महुवा में रहीं। वे बच्चों का एक स्कूल चलाती थीं और महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने भगिनी समाज की स्थापना भी की थी। जीवन के अंतिम चरण में मनुबेन की एक सहयोगी भानुबेन लाहिड़ी भी स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार से थीं। गांधी ने मनु के जीवन पर बहुत गहरा असर डाला था।

भानुबेन लाहिड़ी ने बताया कि एक बार जब मनुबेन ने अपने एक गरीब अनुयायी के विवाह के लिए उनसे चुनरी ली तो बोल पड़ीं, ‘‘मैं तो खुद को मीरा बाई मानती हूं, जो सिर्फ अपने ‘यामलो (कृष्ण) के लिए जीती रही।’’