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भौम प्रदोष व्रत आज, जानें व्रत विधि और लाभ

BhaskarHindi.com | Last Modified - December 04th, 2018 12:35 IST

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भौम प्रदोष व्रत आज, जानें व्रत विधि और लाभ

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भौम प्रदोष व्रत आज यानि 4 दिसम्बर 2018 को है। जब मंगलवार के दिन प्रदोष तिथि का योग बनता है, तब यह व्रत रखा जाता है। मंगल ग्रह का ही एक अन्य नाम भौम है और प्रदोष व्रत को मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष कहते हैं। इस व्रत को रखने से भक्तों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं दूर होती हैं और उनके शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार आता है। भौम प्रदोष व्रत जीवन में समृद्धि लाता है। यह व्रत हर प्रकार के कर्ज से मुक्ति देता है। 

हम अपने दैनिक और व्यावहारिक जीवन में कई बार अपनी आवश्कताओं को पूरा करने के लिए रुपयों-पैसों का कर्ज ले लेते हैं। ये कर्ज/ऋण तो ले लेते हैं, लेकिन उसे उतारने में हम और उलझते जाते हैं। तब कर्ज से संबंधित परेशानी दूर करने के लिए भौम प्रदोष व्रत लाभदायी सिद्ध होता है।

भौम (मंगल) प्रदोष की व्रत विधि  

भौम (मंगल) प्रदोष व्रत के दिन व्रती को सुबह उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिए। 
पूरा दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करें।
भौम प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है।
जातक संध्या काल को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें।
पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें और यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। 
पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। 
कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें।

“ऊँ नम: शिवाय” 

मन्त्र का जप करते हुए शिव जी को जल अर्पित करें।
इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें।
ध्यान में शिव जी का स्वरूप- करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान|
त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण
के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित,
वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किए हुए,
रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें।

ध्यान के बाद, भौम प्रदोष व्रत की कथा सुने अथवा सुनाएं कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा”  मंत्र से आहुति कर दें। इसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित सभी जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें। उसके बाद भोजन करें। भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का ही उपयोग करें।

भोम प्रदोष की कथा 
एक नगर में एक वृद्धा रहती थी। उसका एक ही पुत्र था। वृद्धा की हनुमानजी पर गहरी आस्था थी। वह प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत रखकर हनुमानजी की आराधना किया करती थी। एक बार हनुमानजी ने उसकी भक्ति की परीक्षा लेने की सोची। हनुमानजी साधु का वेश धारण कर वृद्धा के घर गए और पुकारने लगे- है कोई हनुमान भक्त, जो हमारी इच्छा पूर्ण करे? पुकार सुन वृद्धा बाहर आई और बोली- क्या आज्ञा है महाराज? साधू के वेश में हनुमान जी बोले- मैं भूखा हूं देवी, भोजन करूंगा, तू थोड़ी यहाँ जमीन लीप दे।

वृद्धा दुविधा में पड़ गई। अंतत: हाथ जोड़कर बोली- महाराज। लीपने और मिट्टी खोदने के अतिरिक्त आप कोई दूसरा काम बता दें, मैं अवश्य पूर्ण करूंगी। साधु ने तीन बार प्रतिज्ञा कराने के बाद कहा- तू अपने बेटे को बुला। मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा। यह सुनकर वृद्धा घबरा गई, परंतु वह प्रतिज्ञाबद्ध थी। उसने अपने पुत्र को बुलाकर साधु के सुपुर्द कर दिया। वेशधारी साधु हनुमान जी ने वृद्धा के हाथों से ही उसके पुत्र को पेट के बल सुलाया और उसकी पीठ पर आग जलाई। आग जलाकर दु:खी मन से वृद्धा अपने घर में चली गई।

इधर भोजन बनाकर साधु ने वृद्धा को बुलाकर कहा- तुम अपने पुत्र को पुकारो ताकि वह भी आकर भोग लगा ले। तब पर वृद्धा बोली- उसका नाम लेकर मुझे और पीड़ा न पहुंचाओ। लेकिन जब साधु महाराज माने ही नही तो वृद्धा ने अपने पुत्र को आवाज लगाई। उसका पुत्र तत्काल आ गया अपने पुत्र को जीवित देख वृद्धा को बहुत आश्चर्य हुआ और वह साधु के चरणों में गिर पड़ी। हनुमानजी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और वृद्धा को सुख पूर्वक भक्ति करने का आशीर्वाद दिया।
 
 

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