Maharashtra Politics: महाराष्ट्र विधानसभा में अजित पवार को याद कर CM फडणवीस हुए भावुक, लाडकी बहिन योजना में दिवंगत नेता के योगदान पर की चर्चा

डिजिटल डेस्क, मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा में बजट सत्र के दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चीफ और दिवंगत उप मुख्यमंत्री अजित पवार को याद कर भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक क्षेत्र में स्थापित हो चुके और भविष्य में बड़ी पारी खेलने की उम्मीद के बीच जीवन का समय चूक जाने से दादा के निधन ने जो शून्य पैदा किया है, वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
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अजित पवार को याद कर भावुक हुए सीएम फडणवीस हुए भावुक
सीएम फडणवीस ने आगे कहा कि महाकवि भास के नाटक ‘स्वप्नवासवदत्तम्’ में एक सुभाषित है कि 'लकड़ी जलती है तो आग केवल शरीर को जलाती है, लेकिन मित्र का शोक हृदय और आत्मा को भी जला देता है।' अजित पवार के निधन से आज वही स्थिति मेरे सामने है। अजितदादा जैसा सच्चा मित्र और सहयात्री खोना केवल राजनीतिक क्षति नहीं, बल्कि हम सबके हृदय को पीड़ा देने वाली बात है। कुछ घावों पर समय मरहम होता है, लेकिन अजितदादा के जाने का दुख कभी कम नहीं होगा।
सीएम फडणवीस ने कहा कि आज बोलना कहां से शुरू करूं, यह समझ नहीं आ रहा। मन में एक तूफान है। कभी कल्पना नहीं की थी कि ऐसे शोक प्रस्ताव पर बोलना पड़ेगा। सदन में जब भी नजर बगल की सीट पर जाती थी, दादा वहीं बैठे दिखाई देते थे। सुबह से देर रात तक सदन चलता, लेकिन वे अपनी जगह पर डटे रहते थे। आज दुर्भाग्य से वे हमारे बीच नहीं हैं।
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लाडकी बहिन योजना पर सीएम फडणवीस
सीएम फडणवीस ने आगे कहा कि इस वर्ष अजित पवार अपना 12वां बजट पेश करते और अगले वर्ष 13वां बजट पेश कर बैरिस्टर शेषराव वानखेड़े के रिकॉर्ड की बराबरी करते। संभव है कि वे सबसे अधिक बजट पेश करने वाले वित्त मंत्री बनते। लेकिन उनके अचानक निधन के कारण बजट पेश करने की जिम्मेदारी अब मुझ पर आ गई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कठिन निर्णय लेने में अजित दादा कभी पीछे नहीं हटते थे। 'लाडकी बहिन' योजना के वित्तीय बोझ पर पुनर्विचार का सुझाव आने पर भी उन्होंने ठोस निर्णय लेकर उसे मंत्रिमंडल के सामने रखा। योजना शुरू होने के बाद उन्होंने गुलाबी जैकेट पहनना शुरू किया और हमें भी पहनाया। ये सारी बातें अब यादों में हैं।
उन्होंने कहा कि अक्सर हम किसी नेता के निधन पर 'जगह खाली हो गई' कहते हैं, लेकिन वास्तव में जब अजितदादा जैसे स्थापित, प्रभावशाली और मजबूत नेतृत्व वाले व्यक्ति चले जाते हैं, सही अर्थ समझ में आता है। यह केवल एक संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि मेरे लिए अत्यंत भावनात्मक क्षण है।
Created On :   23 Feb 2026 4:19 PM IST













