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नलजल योजना: डीपीआर की खामियां दबाने अधिकारियों ने विधानसभा को भी दी गलत जानकारी, विधायक ने कहा - मैं प्रश्न एवं संदर्भ समिति को लिखूंगा

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मप्र लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) ने 8032 जल जीवन मिशन (नल-जल) योजनाओं की डीपीआर में खामियां छिपाने के लिए मप्र विधानसभा को भी भ्रामक और गलत जानकारी दी है। अगस्त, 2025 में कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने रिवाइज्ड नल-जल योजनाओं की डीपीआर और उनके कारणों, छानबीन करने वाले अिधकारियों को लेकर सवाल पूछा था। इसमें अधिकारियों ने मुख्यालय स्तर के अिधकारियों की किसी भी तरह की जिम्मेदारी से इंकार कर दिया, जबकि शासनादेशाें और विभागीय सिस्टम और केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार मुख्यालय से फील्ड के सभी लोगों को अपनी-अपनी जिम्मेदारियां दी गई हैं।
विधायक का प्रश्न
दरअसल, विधायक मसूद ने पूछा था कि क्या जल जीवन मिशन (जेजेएम) की कितनी लागत की कितनी योजनाएं पुनरीक्षित की गई और क्यों?। डीपीआर तैयार करने के लिए नियमानुसार किस पद या योग्यता के अधिकारी/एजेंसी को पात्र माना गया? पुनरीक्षित योजनाओं की मूल योजना की स्वीकृति के पहले सभी जांचों के लिए विभाग के प्रमुख अभियंता कार्यालय में किस विभागीय अधिकारी को मुख्य प्रभारी अधिकारी का कार्य दिया गया? उनका नाम-पदनाम क्या है? उन्होंने पूछा कि इस मुख्य प्रभारी अधिकारी ने इन योजनाओं की डीपीआर की सही जांच की थी? और सही से जांच की गई तो इन्हें रिवाइज करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके लिए कौन दोषी है, क्या दोषियों को दायित्व मुक्त किया गया? लापरवाही के कारण क्या वसूली प्रमुख अभियंता कार्यालय के दोषी अधिकारी से होगी? पूछा था कि क्यों न जेजेएम की रिवाइज डीपीआर को लगभग 7200 करोड़ का घोटाला माना जाए?।
विभाग का गलत जवाब
इस पर विभाग ने जवाब दिया कि डीपीआर बनाने के लिए विभागीय तौर पर संबंधित उपयंत्री, सहायक यंत्री और आउटसोर्स फर्म/एजेंसी है। रिवाइज्ड और मूल योजनाओं की स्वीकृति के पहले उनकी तकनीकी साध्यता और प्राक्कलनों की जांच तकनीकी स्वीकृति देने वाले प्राधिकारी जैसे खण्ड कार्यालय के ईई, मण्डल कार्यालय के अधीक्षण यंत्री और परिक्षेत्र कार्यालय के मुख्य अभियंता द्वारा उनको प्रदत्त वित्तीय अधिकारों की सीमा में की जाती है, न कि प्रमुख अभियंता कार्यालय अथवा इसमें पदस्थ किसी अधिकारी द्वारा। इसलिए मंजूरी के पहले डीपीआर की जांच करने के लिए प्रमुख अभियंता कार्यालय में प्रभारी अधिकारी नियुक्त करने का प्रश्न ही नहीं है।
...और शासन ने ये व्यवस्था बना रखी
राज्य शासन, पीएचई और वित्त विभाग के लिखित दस्तावेजों में इन अिधकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। शासन के आदेशों के अनुसार पब्लिकली फंडेड कार्यक्रमों, योजनाओं और परियोजनाओं के परीक्षण, प्रशासकीय अनुमोदन के लिए पीएचई ने मप्र वित्त विभाग के निर्देशों के तहत सितंबर 2017 को सक्षम वित्तीय समिति के सामने प्रोजेक्ट्स की मंजूरी के लिए डीपीआर पेश करने से पहले अनुमोदन के लिए विभागीय उप समिति का गठन कर रखा है। इसमें प्रमुख अभियंता, पीएचई को अध्यक्ष, मुख्य अभियंता (संबंधित परिक्षेत्र) को सदस्य, संयुक्त संचालक (वित्त), ईएनसी आॅफिस को वित्त विभाग के प्रतिनिधि की हैसियत से सदस्य और अधीक्षण यंत्री (मोनिटिरंग) को सचिव बना रखा है। इसमें सचिव आलोक अग्रवाल है। बतायाा जा रहा है कि आलोक को बचाने के लिए विधानसभा को भी गलत जानकारी दी गई।
65 करोड़ की प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट पर सवाल
विभाग ने डीपीआर चेेक, इनकी तकनीकी जांच करने और जल जीवन मिशन की योजनाओं की निगरानी के लिए 65 करोड़ की लागत से एक प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट (पीएमयू) बनाई है। इसके लिए आउटसोर्स कंसल्टेंट इनर्स एंड यंग ग्लोबल लिमिटेड को हायर कर रखा है। विभागीय तकनीकी अधिकारियों की टीम भी है। इन्हें डीपीआर की तकनीकी खामियों को प्रारंभिक चरण में ही पूरी करना था, ताकि योजनाओं का क्रियान्वयन समय पर हो सके। कंसल्टेंट इनर्स एंड यंग ग्लोबल लिमिटेड ने भी डीपीआर की त्रुटियां नहीं देखी। इसके चलते 8032 योजनाओं में खामियां मिली। इससे 65 करोड़ की पीएमयू भी सवालों के घेरे में है।
इनका कहना
भोपाल मध्य विधानसभा सीट से विधायक आरिफ मसूद ने कहा, 'मैंने सवाल किया और उसका जवाब सही नहीं आया इसको लेकर मैं प्रश्न एवं संदर्भ समिति में जाऊंगा। मैं मेरे स्टाफ से बात करता हूं और तथ्य-रिकॉर्ड चेक करके समिति को लिखूंगा।'
Created On :   22 Sept 2026 6:18 PM IST














