IAS Arresting Rules: पन्ना कलेक्टर के खिलाफ जारी हुआ नॉन बेलेबल वारंट, क्या IAS को गिरफ्तार करने के लिए होता है अलग नियम? जानें क्या है प्रक्रिया

पन्ना कलेक्टर के खिलाफ जारी हुआ नॉन बेलेबल वारंट, क्या IAS को गिरफ्तार करने के लिए होता है अलग नियम? जानें क्या है प्रक्रिया
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार को अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान पन्ना जिले कलेक्टर उषा परमार के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया।

डिजिटल डेस्क, भोपाल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार को अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान पन्ना जिले कलेक्टर उषा परमार के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया। जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने वारंट के आदेश की जिम्मेदारी पन्ना पुलिस अधीक्षक को सौंपी है। कोर्ट ने पन्ना कलेक्टर को अगली सुनवाई पर 30 सितंबर को हाजिर होने के निर्देश दिए हैं।

नियमितीकरण को लेकर दायर हुई थी याचिका

बता दें, यह पूरा मामला सेवानिवृत्त कर्मचारी जाविन आरा रिजवी की ओर से दायर अवमानना याचिका से संबंधित है। याचिकाकर्ता पन्ना कलेक्टर कार्यालय में सेक्शन आफिसर के पद पर कार्यरत थीं। नियमितीकरण की मांग को लेकर उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना याचिका दायर की

हाई कोर्ट ने 13 अगस्त 2025 को याचिका का निराकरण करते हुए कलेक्टर को याचिकाकर्ता के अभ्यावेदन पर 90 दिन के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे। आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना याचिका दायर की गई।

नोटिस के बावजूद पेश नहीं हुईं कलेक्टर

एकलपीठ ने पाया कि अवमानना याचिका पर 4 दिसंबर 2025 को नोटिस जारी किए गए थे। इसके बावजूद कलेक्टर की ओर से न तो अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराई गई और न ही हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट पेश की गई।

संपर्क अधिकारी भी नियुक्त किया गया था

आदेश में बताया गया है कि कलेक्टर ने पांच अक्टूबर, 2025 को हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर नोटिस प्राप्त होने की जानकारी दी थी। कलेक्टर कार्यालय की स्थापना शाखा के प्रभारी अधिकारी को इस मामले में संपर्क अधिकारी भी नियुक्त किया गया था। इसके बावजूद आदेश के अनुपालन के संबंध में आवश्यक कार्रवाई नहीं की गई।

गैर-जमानती वारंट जारी करना जरूरी

हाई कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए कलेक्टर की उपस्थिति सुनिश्चित करने और पूर्व आदेश के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट कराने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी करना आवश्यक माना। कोर्ट ने पन्ना एसपी को वारंट की तामील कराने तथा कलेक्टर को 30 सितंबर को हाई कोर्ट के समक्ष पेश करने के निर्देश दिए। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विद्या प्रसाद ने पैरवी की।

क्या होते है IAS अधिकारी के गिरफ्तारी के नियम

बता दें, भारत में IAS, कलेक्टर, सचिव या किसी अन्य बड़े सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी के लिए अलग से कोई सामान्य “वीआईपी गिरफ्तारी कानून” नहीं है। मुख्य प्रक्रिया वही है जो दूसरे आरोपियों के लिए BNSS, 2023 के तहत लागू होती है। हां, अधिकारी के आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े मामले में कुछ अतिरिक्त कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

IAS अधिकारी की गिरफ्तारी की सामान्य प्रक्रिया

1. शिकायत/FIR और अपराध की प्रकृति देखी जाती है

सबसे पहले यह देखा जाता है कि अधिकारी पर किस अपराध का आरोप है। संज्ञेय अपराध में परिस्थितियों के अनुसार पुलिस बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है। लेकिन हर FIR में गिरफ्तारी जरूरी नहीं होती। BNSS की धारा 35 में गिरफ्तारी की परिस्थितियां निर्धारित हैं।

2. कम सजा वाले मामलों में पहले नोटिस दिया जा सकता है

अगर गिरफ्तारी जांच के लिए जरूरी नहीं है, तो पुलिस व्यक्ति को जांच में शामिल होने के लिए नोटिस जारी कर सकती है। नोटिस का पालन करने वाले व्यक्ति को उसी अपराध में गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को गिरफ्तारी की जरूरत के कारण दर्ज करने होते हैं।

3. गिरफ्तारी के समय पुलिस को निर्धारित प्रक्रिया अपनानी होती है

गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी की स्पष्ट पहचान होनी चाहिए और गिरफ्तारी का मेमो तैयार किया जाता है। उसमें कम से कम एक गवाह की पुष्टि और गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर का प्रावधान है। गिरफ्तार व्यक्ति को अपने रिश्तेदार/दोस्त को गिरफ्तारी की जानकारी दिलाने का अधिकार भी है।

4. गिरफ्तारी के कारण बताए जाते हैं

गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार/कारण की जानकारी देना जरूरी है। उसे कानून के अनुसार जमानत के अधिकार के बारे में भी बताया जाता है, जहां वह अधिकार लागू होता है।

5. वकील से मिलने का अधिकार

गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है, हालांकि वकील का पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहना अलग विषय है।

6. 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी

बिना वारंट गिरफ्तार व्यक्ति को अनावश्यक देरी के बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है। सामान्य तौर पर मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के बिना 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता, यात्रा में लगने वाला समय छोड़कर।

इन मामलों में गिरफ्तारी की बदलेगी प्रक्रिया

इसके बाद मजिस्ट्रेट तय करता है कि व्यक्ति को पुलिस कस्टडी, न्यायिक हिरासत या जमानत में क्या स्थिति दी जाए। लेकिन बड़े सरकारी अधिकारी के मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर अगर आरोप उसके सरकारी/आधिकारिक काम के दौरान किए गए कथित अपराध से जुड़ा है, तो गिरफ्तारी और अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लेने को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए।

कुछ मामलों में सरकारी अधिकारी के खिलाफ अदालत द्वारा संज्ञान (cognizance) लेने से पहले सरकार की मंजूरी से जुड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं। यह अलग कानूनी सवाल है और इसका मतलब यह नहीं है कि हर IAS अधिकारी को गिरफ्तार करने से पहले सरकार की अनुमति अनिवार्य है।

Created On :   22 Sept 2026 8:15 PM IST

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