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Maharashtra News: सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज प्रसन्ना बी. वराले से दैनिक भास्कर की विशेष बातचीत

भास्कर संवाददाता, छत्रपति संभाजीनगर। छत्रपति संभाजीनगर में वकालत से करियर की शुरुआत करने वाले जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले बॉम्बे हाईकोर्ट के जज और कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट के जज बने। उन्होंने देश में कई महत्वपूर्ण मामलों में फैसले दिए हैं। दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत में उन्होंने वर्तमान में सरकार और न्यायपालिका के बीच चल रहे टकराव, आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी समस्याओं और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा समेत कई मुद्दों पर खुलकर बात की।
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सवाल : सरकार के अधिकांश फैसलों के खिलाफ लोग कोर्ट में आ रहे हैं?
जवाब : सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है, इसलिए उन्हें कोर्ट से उम्मीद है
सवाल : छोटी-छोटी सुविधाएं पाने के लिए भी लोग कोर्ट में आ रहे हैं, ऐसा क्यों?
जवाब : सरकार के अलग-अलग विभाग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे हैं। इस कारण लोगों को कोर्ट तक आना पड़ रहा है। हमें आश्चर्य होता है कि जिन सुविधाओं को पाना लोगों का अधिकार है, उनके लिए नियम भी बने हुए हैं। यदि उनका ठीक से पालन किया जाए तो लोगों को यहां आने की जरूरत ही नहीं होगी। लोगों को न्याय व्यवस्था के प्रति भरोसा है, इसलिए भी लोग यहां आते हैं।
सवाल : एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग में विवाद चल रहा है, क्या सुप्रीम कोर्ट इसमें दखल देगा?
जवाब : इससे जुड़ी याचिकाएं पहले ही कोर्ट में चल रही हैं। ऐसे में इस पर टिप्पणी करना ठीक नहीं है। हम उनकी सुनवाई कर रहे हैं।
सवाल : न्याय इतना महंगा है कि आम लोगों के बस की बात नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में केस करना और लड़ना तो और भी महंगा है।?
जवाब : पैसे के अभाव में लोगों को न्याय से दूर नहीं रहना चाहिए। हमने ऐसे लोगों के लिए कई तरह की योजनाएं चलाई हैं। उनकी नि:शुल्क पैरवी के लिए अच्छे वकील उपलब्ध हैं, ताकि हर आम आदमी अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट तक भी आ सके।
सवाल : सुप्रीम कोर्ट के बारे में कहा जाता है कि वहां वकीलों के चेहरे देखकर तय होता है कि केस चलेगा या नहीं।
जवाब : यह केस के तथ्यों के आधार पर तय होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सामने वाला कौन वकील है।
सवाल : आपने प्राथमिक सरकारी स्कूलों में उचित पढ़ाई नहीं होने की बात अक्सर कही है। आखिर कमी कहां है?
जवाब : सरकारी स्कूलों, खासतौर पर आश्रमशालाओं में वही बच्चे पढ़ने आते हैं, जिनके पास निजी स्कूलों में पढ़ने के लिए पैसे नहीं हैं। पढ़ने का हक सभी का है। सरकार को जितना बजट उन्हें देना चाहिए, वह नहीं दिया जा रहा है। वे भी देश का भविष्य हैं। मैं भी सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं। कुंभ से लेकर अन्य परियोजनाओं में जितना खर्च हो रहा है, उसका कुछ हिस्सा भी यहां खर्च हो तो बच्चों को पढ़ने में आसानी होगी।
सवाल : आश्रमशालाओं में पढ़ने वाली बच्चियों के प्रेग्नेंसी टेस्ट हो रहे हैं, इसे कैसे देखते हैं?
जवाब : यह संवेदनशील विषय है। अभी मेरे पास इस मामले के सभी तथ्य नहीं आए हैं। सरकार को चाहिए कि वह इसे संवेदनशील तरीके से डील करे।
सवाल : आपको डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़ने का मौका मिला। यह अनुभव कैसा था?
जवाब : मेरे दादा को उनके करीब रहने और उनके काम में सहभागी बनने का मौका मिला। उनके कारण मैं भी उनसे जुड़ा रहा। वे अक्सर मेरी पढ़ाई के बारे में पूछते थे। उनके द्वारा स्थापित मिलिंद महाविद्यालय और पीपल्स एजुकेशन सोसायटी में पढ़े लोग आज देश की शीर्ष संस्थाओं में हैं। वे पढ़ाई पर हमेशा जोर देते थे और पूछते थे कि तुमने अपने विषय से जुड़ी कौन-सी नई किताब पढ़ी है।
सवाल : क्या आप समाज में हो रहे अन्याय के प्रति खुद भी स्वा मोटो से संज्ञान लेते हैं?
जवाब : कई ऐसे मामलों में, जहां हमें लगता है कि अन्याय हो रहा है, हम खुद भी उन मामलों में स्वा मोटो से संज्ञान लेते हैं। एक महिला को पेड़ से बांधकर पीटा गया और उसकी शिकायत पुलिस नहीं लिख रही थी। रविवार के दिन यह मामला अखबार में छपा तो मैंने उसी दिन इस मामले में अधिकारियों को कोर्ट में बुलाकर कार्रवाई के निर्देश दिए, जिन पर अमल भी हुआ।
सवाल : क्या बड़े मामलों में फैसला लेते समय सरकार या किसी और तरह का दबाव आता है?
जवाब : मेरे पास आज तक ऐसा दबाव नहीं आया। यही इस देश की खासियत है कि लोग ऐसा नहीं करते हैं। हाईकोर्ट और निचली अदालतों के जजों को भी हम जनहित में बिना किसी डर या भेदभाव के फैसले करने की ट्रेनिंग देते हैं।
सवाल : सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए प्रोटोकॉल के कारण आप आम लोगों की तरह समाज में खुल-मिल नहीं सकते। क्या इसका दुख होता है?
जवाब : यह हर व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह कितने प्रोटोकॉल का पालन करे। अक्सर मुझसे मिलने छात्र आते हैं। मैं कोशिश करता हूं कि मैं उनसे मिल सकूं। जब मेरे बच्चे छोटे थे, तब पेरेंट्स मीटिंग और उनके साथ हर सामान्य जगह पर नहीं जा सका। यह मुझे जरूर थोड़ा खलता है।
सवाल : लॉ करने वाले बच्चों को क्या संदेश देना चाहेंगे, ताकि वे आप जैसे बन सकें?
जवाब : कानून की प्रैक्टिस करना, उसे रोजी-रोटी का व्यवसाय बनाना अच्छा है, मगर मॉरल वैल्यूज के साथ कानूनी काम करें। ऐसा करेंगे तो आप बहुत आगे जाएंगे।
Created On :   2 Oct 2026 12:18 AM IST








