नागद्वार यात्रा-2022: पिता की तरह पूजे जाते हैं पद्मशेष, मां की तरह होती है चित्रशाला माता की सेवा

July 24th, 2022

डिजिटल डेस्क, छिंदवाड़ा, अमित श्रीवास्तव। न खच्चर है, न घोड़ा है यहां पैदल ही जाना है, जी हां हम बात कर रहे हैं सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं की दुर्गम पहाडियों पर मौजूद पद्मशेष प्रथम द्वार और चित्रशाला माई की गिरी पर स्थित मंदिर की। यहां विराजमान पद्मशेष पिता की तरह पूजे जाते है, तो वहीं अलग पहाड़ी पर विराजी चित्रशाला माता (माई की गिरि) को मां की तरह पूजा जाता है।

 

 

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यहां की यात्रा मप्र और महाराष्ट्र के लाखों श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती है। कल-कल बहते झरनों के बीच से गुजरते हुए बादलों को छूते पहाड़ों पर चढ़ाई का रोमांच कुछ अलग है। भक्ति और रोमांच से भरपूर नागद्वार यात्रा पर अमित श्रीवास्तव की खास रिपोर्ट-

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करीब १०० सालों भी ज्यादा से चली आ रही नागद्वार यात्रा को लेकर मान्यता है कि यहां मन्नत पूरी होती है, बीमार ठीक हो जाते हैं, जो ठीक से चल भी नहीं पाते वो दुर्गम पहाड़ों पर भी चढ़ाई कर लेते हैं। छिंदवाड़ा और नर्मदापुरम में रहने वाले कोरकू जाति के लोग इस यात्रा में अहम रोल अदा करते हैं, यही लोग श्रद्धालुओं का सामान सिर पर लादकर चढ़ाई को आसान बनाते हैं। पचमढ़ी से जलगली होते हुए गणेशगिरि के बाद पैदल यात्रा की शुरुआत होती है। इसी जगह पर मौजूद बादलों से घिरा बलशाली पहाड़ सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला का गौरव और रोमांच दर्शाता है।

 

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छिंदवाड़ा और पिपरिया में बसी आदिवासियों की कोरकू जाति इस यात्रा में अहम रोल अदा करती है। इस समुदाय के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक मेले के दौरान सिर पर बोझा ढोते हैं। जेब में रखा एक मोबाइल फोन भी जहां दुर्गम रास्तों पर बोझ लगता है वहां ये लोग सिर पर गैस सिलेंडर रखकर और जनरेटर कंधों पर टांगकर पहाड़ चढ़ा देते हैं।

 

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कालाझाड़ (भजिया गिरी) से काजली, पद्मशेष प्रथम द्वार (बड़ा द्वार), पश्चिम द्वार, चिंतामन, चित्रशाला (माई गिरी), गुप्त गंगा होते हुए वापस कालाझाड़ तक की पैदल यात्रा २४ किलो मीटर से अधिक की है। इस दौरान कभी बादलों के ऊपर पहुंचने का एहसास तो कभी झरनों के बीच से गुजरने का रोमांच मिलता है। पर्यटन और रोमांचक नजारों को देखने के लिए कठिन चढ़ाई चढऩी पड़ती है। लेकिन इस यात्रा में श्रद्धालुओं की ही संख्या ज्यादा होती है।
 

धार्मिक मंडल और कोरकू का यात्रा में अहम रोल

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जिला प्रशासन और महादेव मेला समिति के जरिए ही श्रद्धालुओं के लिए व्यवस्थाएं उपलब्ध कराती है। महाराष्ट्र और छिंदवाड़ा के दर्जनों धार्मिक मंडल श्रद्धालुओं के लिए खाने व ठहरने की व्यवस्थाएं नि:स्वार्थ भाव से करते हैं। वहीं आदिवासियों की कोरकू जाति इन मंडलों के भारी भरकम सामान को पहाड़ों तक पहुंचाने में मदद करती है। मंडलों व कोरकू के बिना यह यात्रा पूरी करना मुश्किल है।
तस्वीरें और वीडियो बयां करते हैं रोमांचक नजारे

नागदेवता, शिवलिंग की आकृति में कटे हुए पहाड़, इन पहाड़ों से टकराते हुए बादल, पहाड़ों से निकलते झरने, चारों तरफ हरियाली यहां की खूबसूरती को बयां करती है। ये है नागद्वार यात्रा का रूट

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-पचमढ़ी बस स्टैंड (अस्थाई) से गणेशगिरी मंदिर - 7 किलोमीटर (वाहन से)

- गणेशगिरि  से कालाझाड (पैदल यात्रा शुरू होती है) - 3 किलोमीटर लगभग

- कालाझाड़ से काजली गांव ५ किलो मीटर लगभग

- काजली से पद्मशेष (बड़ा द्वार) ५ किलो मीटर  लगभग

- पद्मशेष से पश्चिम द्वार २ किलो मीटर लगभग

- पश्चिम द्वार से स्वर्ग द्वार २ किलो मीटर लगभग

- स्वर्ग द्वार से चिंतामन ३ किलो मीटर लगभग

-चिंतामन से चित्रशाला माता (माई की गिरी) १ किलो मीटर लगभग

- माई की गिरि से दूधधारा ५०० मीटर लगभग

- दूध धारा से गुप्तगंगा १ किलो मीटर लगभग

- गुप्तगंगा से कालाझाड़ २ किलो मीटर लगभग

क्यों महत्व रखती है नागद्वार यात्रा

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मान्यता है कि पद्मशेष, चिंतामन, चित्रशाला माता, पश्चिम द्वार, नंदीगढ़ जैसे स्थानों पर दर्शन मात्र से ही दुख दूर हो जाते हैं, व्यक्ति निरोगी हो जाता है। मन्नत पूरी होती है। इन स्थानों पर अलौकिक शक्तियों का वास है। कहते हैं कि सालों पहले इस यात्रा के दौरान रास्ते भर सर्प के दर्शन होते थे। श्रद्धालु इन्हें हाथों से हटाकर आगे का सफर तय करते थे, लेकिन अब यह विरले ही दिखते हैं।

इस बार १० दिन का होगा नागद्वार मेला

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सतपुड़ा फारेस्ट रिजर्व एरिया होने की वजह से इन स्थानों पर जाने के लिए श्रद्धालुओं को साल भर इंतजार करना पड़ता है। कोरोना संक्रमण की वजह से २ साल बाद लगने वाला मेला इस बार १० दिनों तक जारी रहेगा। ५ लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। २३ जुलाई से ३ अगस्त नागपंचमी के दिन तक मेले की अनुमति प्रशासन ने दी है।


अनुमति नहीं मिली तो जंगल के रास्ते पहुंची माई की गिरी

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मंगला ताराचंद महाजन (58) भवानी नगर पारढी नागपुर निवासी चित्रशाला माता (माई की गिरी) को अपनी मां मानती है। मेला शुरु होने से पहले किसी भी श्रद्धालु को यहां जाने की अनुमति नहीं होती है। मंगला ने मां के दर्शन के लिए मेला पूर्व प्रशासन से अनुमति मांगी थी। अनुमति नहीं मिली तो वे बेरियर के पास से जंगल के रास्ते पैदल चिंतामन द्वार तक पहुंची। आस्था ही है कि मंगला महाजन इस उम्र में कठिन चढ़ाई को भी पार कर माई के दरबार तक पहुंच गई। ऐसे कई श्रद्धालु हैं जो ठीक से चल भी नहीं पाते हैं, लेकिन अलौकिक शक्ति उन्हें सहारा देकर दरबार में पहुंचा देती है।

कढ़ाई और कसनी की परंपरा

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मान्यता है कि नागद्वार यात्रा के बाद कढ़ाई या कसनी करना जरूरी होता है। मन्नत के अनुसार श्रद्धालु इस परंपरा को निभाते हैं।
कढ़ाई: यात्रा के बाद परहेज रखते हुए यात्री को गीले बदन बिना किसी को छुए, अपने हाथों से रवे का प्रसाद (हलवा) खुद बनाना होता है। इस प्रसाद को पद्मशेष का स्मरण करते हुए भोग लगाना होता है।
कसनी: मन्नत के अनुसार यात्रा के बाद सवा माह तक ब्रम्हचर्य का पालन करते हुए, घर में भी तपस्वी की भांति चटाई में सोना, खुद भोजन बनाकर खाना होता है। सवा माह बाद कढ़ाई (प्रसाद बनाकर) पद्मशेष देव का पूजन करना होता है।