RIP: 'भारत रत्न प्रणब दा' का सियासी सफर, 1986 में हुए थे कांग्रेस से अलग, 3 बार रहे पीएम के दावेदार

RIP: 'भारत रत्न प्रणब दा' का सियासी सफर, 1986 में हुए थे कांग्रेस से अलग, 3 बार रहे पीएम के दावेदार

Bhaskar Hindi
Update: 2020-08-31 12:58 GMT
RIP: 'भारत रत्न प्रणब दा' का सियासी सफर, 1986 में हुए थे कांग्रेस से अलग, 3 बार रहे पीएम के दावेदार

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दिल्ली में सेना के रिसर्च एवं रेफरल अस्पताल में निधन हो गया। वे 85 वर्ष के थे और मस्तिष्क की सर्जरी के लिए 10 अगस्त 2020 को भर्ती हुए थे। सर्जरी के बाद उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था। इसके पहले उनकी कोरोना संक्रमण की रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई थी। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का विवाह रवीन्द्र संगीत की निष्णात गायिका और कलाकार स्वर्गीय सुव्रा मुखर्जी (17.09.1940-18.08.2015) से हुआ था। उनके परिवार में दो बेटे और एक बेटी हैं।

डॉ. प्रणब मुखर्जी ने पश्चिम बंगाल के गांव मिरिटी में 11 दिसंबर 1935 को जन्म लिया था। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में वे शुमार रहे हैं। अपनी सोच-समझ से कई बार प्रणब मुखर्जी ने विरोधियों के भी हौंसले पस्त किए हैं। जब वे सक्रिय राजनीति में थे, तब उन्हें "कांग्रेस के संकटमोचक" के नाम से जाना जाता था। प्रणब मुखर्जी ने वीरभूम के सूरी विद्यासागर कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की थी। बाद में उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में MA और LLB की डिग्री प्राप्त की। इतना ही नहीं प्रणब मुखर्जी ने पत्रकारिता में भी हाथ आजमाया है। 1969 में बांग्ला कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही उनके राजनीतिक करियर का आगाज हो गया। उस समय तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी की नजर उन पर पड़ीं और फिर यहीं से हो गई भारत के एक बेहतरीन व्यक्तित्व और राजनेता की शुरुआत हुई।

प्रणब मुखर्जी का सियासी सफर
प्रणब मुखर्जी सियासी गलियारे में प्रणब दा के नाम से पुकारे जाते हैं। यूपीए सरकार में प्रणब मुखर्जी के पास वित्त मंत्रालय संभालने के अलावा कई अहम जिम्मेदारियां थीं। उन्हें कांग्रेस के के लिए "संकटमोचक" कहा जाता था। प्रणब मुखर्जी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बांग्ला कांग्रेस से की थी। जुलाई 1969 में वे पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए। इसे बाद वे साल 1975, 1981, 1993 और 1999 में राज्य सभा के सदस्य रहे। इसके अलावा 1980 से 1985 तक राज्य में सदन के नेता भी रहे। मई 2004 में वे चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे और 2012 तक सदन के नेता रहे।

इंदिरा गांधी के बेहद करीबी थे प्रणब दा
उनकी लिखी आत्मकथा में स्पष्ट है कि वे इंदिरा गांधी के बेहद करीब थे और जब आपातकाल के बाद कांग्रेस की हार हुई, तब वे इंदिरा गांधी के साथ उनके सबसे विश्वस्त सहयोगी बनकर उभरे। दक्षिण भारत में जो कांग्रेस का जनाधार बनकर उभरा वह भी इनकी मेहनत का परिणाम था। सन् 1980 में वे राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता बनाए गए। इस दौरान मुखर्जी को सबसे शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री माना जाने लगा और प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में वे ही कैबिनेट की बैठकों की अध्यक्षता करते थे। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी को प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार माना जा रहा था, पर तब कांग्रेस पार्टी ने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री चुन लिया।

1986 में कांग्रेस से हो गए थे अलग
1984 में राजीव गांधी सरकार में उन्हें भारत का वित्तमंत्री बनाया गया। प्रणब मुखर्जी को पार्टी में किनारे करते हुए कैबिनेट से बाहर कर दिया गया था। इस सब से नाराज होकर प्रणब मुखर्जी ने 1986 में कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस बनाई थी।

1987 में पश्चिम बंगाल का चुनाव लड़ा, हारे और फिर कांग्रेस में शामिल
प्रणब मुखर्जी की पार्टी ने 1987 में पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन पहले चुनाव में ही उनकी पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद प्रणब मुखर्जी ने 1988 में कांग्रेस में दोबारा वापसी कर ली। मुखर्जी को कांग्रेस में दोबारा वापसी का इनाम जल्द ही मिला और उन्हें नरसिम्हा राव की सरकार में 1991 में योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया।

मनमोहन की कैबिनेट में भी नंबर-2 रहे प्रणब
2012 तक मुखर्जी मनमोहन सिंह की कैबिनेट में नंबर-2 रहे। प्रणब दा ने 2004 से 2006 तक रक्षा, 2006 से 2009 तक विदेश, और 2009 से 2012 तक वित्त मंत्रालय संभाला। इस दौरान वे लोकसभा में सदन के नेता भी रहे। यूपीए सरकार में उनकी भूमिका संकटमोचक की रही। 2012 में पीए संगमा को हराकर वे राष्ट्रपति बने। उन्हें कुल वोटों का 70 फीसदी हासिल हुआ। बाद में एक बार प्रणब दा ने कहा था- मुझे प्रधानमंत्री न बन पाने का कोई मलाल नहीं। मनमोहन इस पद के लिए सबसे योग्य व्यक्ति थे।

तीन बार पीएम बनते-बनते रह गए प्रणब दा

  • 1969 में इंदिरा के आग्रह पर प्रणब दा पहली बार राज्यसभा के रास्ते संसद पहुंचे थे। इंदिरा गांधी राजनीतिक मुद्दों पर प्रणब की समझ की कायल थीं। यही वजह थी कि उन्होंने प्रणब दा को कैबिनेट में नंबर दो का दर्जा दिया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अगले प्रधानमंत्री के रूप में प्रणब का नाम भी चर्चा में था, लेकिन पार्टी ने राजीव गांधी को चुना। 
  • 1991 में राजीव गांधी की हत्या हुई। चुनाव के बाद कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई। माना जा रहा था कि इस बार प्रणब के मुकाबले कोई दूसरा चेहरा पीएम पद का दावेदार नहीं है, लेकिन इस बार भी मौका हाथ से निकल गया। नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री बनाया गया।
  • 2004 में कांग्रेस को 145 और भाजपा को 138 सीटें मिलीं। इसके बाद कांग्रेस ने क्षे​त्रीय दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई। तब सोनिया गांधी के पास खुद प्रधानमंत्री बनने का मौका था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। प्रणब मुखर्जी का नाम फिर चर्चा में था, लेकिन सोनिया ने जाने माने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना।

मनमोहन ने भी माना था- प्रणब ज्यादा क्वालिफाइड थे, लेकिन सोनिया ने मुझे चुना
मनमोहन ने 2017 में कहा था कि जब मैं प्रधानमंत्री बना, तब प्रणब मुखर्जी इस पद के लिए ज्यादा काबिल थे, लेकिन मैं कर ही क्या सकता था? कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी ने मुझे चुना था। मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। प्रणब को प्रधानमंत्री नहीं बनाने का शिकवा करने का पूरा हक है। यह बात मनमोहन ने प्रणब की ऑटोबायोग्राफी के विमोचन के मौके पर कही थी। समारोह में सोनिया और राहुल गांधी भी थे। मनमोहन की बात सुनकर मां-बेटे मुस्करा दिए थे।

जब राष्ट्रपति बने प्रणब दा
केंद्र की राजनीति में दशकों का सफर तय करने के बाद 2012 में प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया। वे NDA समर्थित पीए संगमा को हराकर देश के 13वें राष्ट्रपति बने। 25 जुलाई 2012 को उन्होंने देश के 13वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी।

जब भारत रत्न से सम्मानित हुए प्रणब "दा"
डॉ. प्रणब मुखर्जी को भारत के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान "भारत रत्न" से भी सम्मानित किया गया है। साल 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों "प्रणब दा" को "भारत रत्न" से नवाजा गया। जबकि इससे पहले प्रणब मुखर्जी को पद्म विभूषण भी प्रदान किया गया था।

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