लाल आतंक से मुक्ति: अब पर्यटकों को लुभा रहा बस्तर, पिछले साल पहुंचे 42 लाख 30 हजार पर्यटक, कैफे में कॉफी परोस रहे पूर्व नक्सली

अब पर्यटकों को लुभा रहा बस्तर, पिछले साल पहुंचे 42 लाख 30 हजार पर्यटक, कैफे में कॉफी परोस रहे पूर्व नक्सली
  • जहां हवाओं में तैरती थी बारूद की गंध
  • अब चेहरों पर झलक रही मुस्कान
  • 2025 में पहुंचे 42 लाख 30 हजार पर्यटक, इनमें 518 विदेश

डिजिटल डेस्क, जगदलपुर. अजीत कुमार. छत्तीसगढ़ का बस्तर और जगदलपुर का इलाका अतीत से निकल भविष्य की नई इबारत लिख रहा है। एक वक्त इस इलाके में ‘लाल आतंक’ की बंदूकें गरजती थीं और हवाओं में बारुद की गंध घुली-मिली रहती थी। बारूदी सुरंगों के डर से लोग रात क्या, दिन के उजाले में भी घर से बाहर निकलने से घबराते थे। लेकिन अब इस इलाके के लोगों का डर कोसो पीछे छूट गया है। ‘लाल आतंक’ की वजह से सुर्खियों में रहने वाला यह क्षेत्र अब अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। देशी-विदेशी पर्यटक यहां की प्रकृति, संस्कृति और ग्रामीण जीवन से जुड़े जीवन को देख-समझ और महसूस कर रहे हैं। बस्तर इलाके में यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के चेहरों पर भी स्पष्ट दिखाई देने लगा है।

यह सब सरकार की उस नीति का परिणाम है, जिसके तहत कभी नक्सलग्रस्त रहे क्षेत्रों को सिर्फ एक संघर्ष प्रभावित क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन, स्थानीय उद्यमिता और इको-एथनिक पर्यटन गंतव्य के रूप में स्थापित करने की कोशिश हो रही है। बस्तर में पर्यटन सुविधाओं के विस्तार के लिए टूरिज्म सर्किट, इको टूरिज्म, एथनिक टूरिज्म, एडवेंचर टूरिज्म और वेलनेस टूरिज्म को प्राथमिकता दी जा रही है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, कुटुमसर एवं कैलाश गुफाएं, मां दंतेश्वरी मंदिर, बस्तर पैलेस जैसे स्थल पर्यटकों को प्रकृति, रोमांच, आध्यात्म और इतिहास का अनूठा अनुभव देते हैं। बस्तर में सड़क, रेल और हवाई संपर्कों को मजबूत करने पर जोर है। ‘बस्तर 2.0’ ब्लूप्रिंट में 228 नई सड़कों और 267 पुलों के निर्माण का प्रस्ताव पहाड़ी इलाकों में संपर्क बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।


विदेशी पर्यटक भी पहुंच रहे बस्तर

नक्सलवाद खत्म होने के बाद बस्तर में पर्यटकों की आवाजाही में लगातार बढा़ेत्तरी हो रही है। वर्ष 2021 में जहां बस्तर क्षेत्र में सिर्फ लगभग एक लाख पर्यटक पहुंचे थे, तो वहीं वर्ष 2024 में पर्यटकों की संख्या बढ़कर 40 लाख 76 हजार से ज्यादा पहुंच गई। इसमें 40,74,982 घरेलू पर्यटक और 1,180 विदेशी पर्यटक शामिल थे। वर्ष 2025 में 42,29,389 घरेलू पर्यटकों और 518 विदेशी पर्यटकों ने बस्तर का रूख किया। छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड के एमडी सौेमिल रंजन चौबे कहते हैं, “बस्तर सिर्फ घूमने की जगह नहीं है, यह प्रकृति, आदिवासी परंपराओं, कला और जीवंत संस्कृति का एक अद्भुत संगम है। बस्तर दशहरा शायद इसका सबसे सशक्त रूप है। हमारी कोशिश है कि पर्यटक बस्तर को सिर्फ देखें ही नहीं, बल्कि उसे महसूस करें, समझें और इसकी अनोखी सांस्कृतिक पहचान के प्रति गहरा सम्मान लेकर लौटें”।

‘छग का मिनी मसूरी’ है टाटामारी

केशकाल की सुंदर पहाड़ियों में बसा टाटामारी एक आकर्षक हिल स्टेशन है, जो पर्यटकों को अपनी ओर खूब आकर्षित करता है। ‘छग का मिनी मसूरी’ कहे जाने वाले टाटामारी में आने वाले पर्यटक यहां के मनमोहक सूर्योदय और सूर्यास्त के अद्भुत नजारों का लुत्फ उठाते हैं। बरसात के दिनों में बादलों की घटा और प्रकृति की मनोरम छठा के बीच यहां की संुदर प्राकृतिक वादियां पर्यटकों का मन मोहने के लिए काफी है। प्रकृति प्रेमियों के लिए यहां जंगल के बीच रोमांचक ट्रैकिंग की सुविधा भी उपलब्ध है। प्राकृतिक सौंदर्य को नजदीक से देखने के लिए यहां एक वॉच टाॅवर भी है। टाटामारी व्यू प्वाइंट में सेल्फी लेने का क्रेज भी सिर चढ़कर बोल रहा है। पर्यटकों के रहने के लिए यहां लकड़ी के केबिन, शयनगृह और तंबू जैसे आवास उपलब्ध हैं।


चित्रकोट जलप्रपात

बस्तर जिले में स्थित चित्रकोट जल प्रपात भारत का सबसे चौड़ा जलप्रपात है। चित्रकोट जल प्रपात को ‘भारत का नियाग्रा’ भी कहा जाता है, जिसे देखने के लिए पर्यटकों की भीड़ जुटती है। मानसून के दौरान यहां की प्राकृतिक सुंदरता देखने लायक होती है। लगभग 1,000 फीट चौड़ा यह जलप्रपात 98 फीट की ऊंचाई से नीचे कुंड में गिरता है। ऐसे में इसकी भव्यता देखने लायक होती है। गिरते पानी से बनी धुंध से छनकर आती सूरज की रोशनी से इंद्रधनुष बनते हैं, जो काफी मनमोहक दृश्य बना देते हैं। केशकाल में स्थित कुएंमारी जलप्रपात भी पर्यटकों को लुभाने में पीछे नहीं है।

पंडुम कैफे : जहां पूर्व नक्सली परोस रहे कॉफी

जगदलपुर में खुला ‘पंडुम कैफे’ भी बस्तर में हो रहे सामाजिक-आर्थिक बदलाव की गवाही दे रहा है। यह कैफे नक्सली हिंसा के पीड़ितों और समर्पण कर चुके पूर्व माओवादियों के पुनर्वास की दिशा में राज्य सरकार की एक प्रेरक पहल है। नक्सली संघर्ष से प्रभावित पृष्ठभूमि वाले लगभग डेढ़ दर्जन युवा पंडुम कैफे में कॉफी-चाय परोस रहे हैं। इस कैफे को बस्तर पुलिस और नुक्कड़ हॉस्पिटैलिटी ग्रुप के सहयोग से चलाया जा रहा है। कैफे से जुड़ी अपेक्षा आडवाणी बताती हैं कि इस कैफे का मकसद सिर्फ रोजगार देना नहीं, बल्कि यह दर्शाना भी है कि कभी संघर्ष में लगे लोग अब मेेहनत की कमाई से अपने परिवार का भविष्य संवार रहे हैं।

Created On :   2 Oct 2026 6:41 PM IST

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