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बॉम्बे हाई कोर्ट: प्रारंभिक परीक्षा में असफल होने के बाद भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देना कानूनन स्वीकार्य नहीं, आरटीई के तहत पड़ोस में घर होने की शर्त आवश्यक पात्रता

- भर्ती विज्ञापन को संशोधित नियमों के आधार पर राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित नहीं किए जाने के कारण पूरी चयन प्रक्रिया अवैध होने का दावा
- अदालत ने वकीलों की याचिकाओं को खारिज करते हुए भर्ती चयन प्रक्रिया को बताया वैध
- अदालत ने वकीलों की याचिकाओं को खारिज करते हुए भर्ती चयन प्रक्रिया को बताया वैध
Mumbai News. बॉम्बे हाई कोर्ट ने वकीलों द्वारा महाराष्ट्र न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीश की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लेकर अपने फैसले में कहा कि प्रारंभिक परीक्षा में असफल होने के बाद भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह वैध और कानून के अनुरूप है। वकीलों ने बिना किसी आपत्ति के चयन प्रक्रिया में भाग लिया और असफल होने के बाद उसे चुनौती दी। इसलिए उनकी याचिका अधिकार का परित्याग और मौन सहमति के सिद्धांत से बाधित है। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवीन्द्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखड की पीठ ने वकील सूरज दीपक माने समेत अन्य आधा दर्जन के अधिक वकीलों की दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि संविधान पीठ के निर्णय के बाद पुराने असंगत नियम स्वतः प्रभावहीन हो गए थे। भर्ती विज्ञापन में संशोधित नियमों की जानकारी पहले ही दी गई थी। इसलिए उम्मीदवारों को पूरी जानकारी थी। याचिकाकर्ताओं ने विज्ञापन या प्रक्रिया पर पहले कोई आपत्ति नहीं की और स्वेच्छा से परीक्षा में भाग लिया। केवल प्रारंभिक परीक्षा में असफल होने के बाद उन्होंने भर्ती प्रक्रिया को चुनौती दी। हालांकि वे यह भी साबित नहीं कर सके कि संशोधित नियमों के कारण उन्हें कोई वास्तविक नुकसान हुआ। पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के निर्णय के कारण पुराने असंगत नियम पहले ही अप्रभावी हो चुके थे। भर्ती विज्ञापन में स्पष्ट रूप से लिखा गया था कि चयन प्रक्रिया हाई कोर्ट द्वारा स्वीकृत संशोधित नियमों के अनुसार होगी, भले ही उनकी औपचारिक अधिसूचना शेष हो। याचिकाकर्ताओं ने इस शर्त को जानते हुए परीक्षा दी और असफल होने के बाद चुनौती दी, जो स्वीकार्य नहीं है। याचिकाकर्ता वकीलों ने महाराष्ट्र न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीश भर्ती की प्रारंभिक परीक्षा दी थी। वे प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सके। इसके बाद उन्होंने भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की। वकीलों की ओर से दलील दी गई कि भर्ती विज्ञापन ऐसे संशोधित नियमों के आधार पर जारी किया गया था, जिन्हें उस समय तक राज्य सरकार ने राजपत्र में अधिसूचित नहीं किया था, इसलिए पूरी चयन प्रक्रिया अवैध है। विज्ञापन जारी होने की तिथि (30 जनवरी 2026) पर संशोधित नियम लागू नहीं हुए थे। अधिसूचना बाद में (17 जून 2026) प्रकाशित हुई। इसलिए संशोधित नियमों के आधार पर परीक्षा नहीं ली जा सकती थी। इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 233 का उल्लंघन हुआ।
आरटीई के तहत पड़ोस में घर होने की शर्त केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रवेश के लिए आवश्यक पात्रता है
उधर बॉम्बे हाई कोर्ट ने छात्र के शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई) के तहत शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए पुणे के वाघोली स्थित पोदार इंटरनेशनल स्कूल में प्रवेश के लिए आवेदन पर अपने फैसले में कहा कि आरटीई के तहत पड़ोस में घर होने की शर्त केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रवेश के लिए आवश्यक पात्रता है। यदि बिना पर्याप्त प्रमाण के छूट दी जाए, तो वास्तव में पात्र और जरूरतमंद बच्चे का अधिकार प्रभावित हो सकता है। छात्र द्वारा शिक्षा अधिकारियों के उसके आवेदन को अस्वीकार करने को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश रवीन्द्र वी. घुगे और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखड की पीठ के समक्ष छात्र के पिता संदीप बाबुराव साठे की दायर याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता की वकील अहिल्या नलावडे ने दलील दी कि छात्र को आरटीई के अंतर्गत शैक्षणिक वर्ष 2026-27 के लिए पुणे के वाघोली स्थित पोदार इंटरनेशनल स्कूल में प्रवेश दिया जाए। उसका परिवार पुणे के खराड़ी में स्कूल से लगभग 950 मीटर की दूरी पर रहते हैं। इसलिए वे आरटीई के ‘पड़ोस में घर होने’ मानदंड को पूरा करते हैं। ऑनलाइन आवेदन में गूगल मैप द्वारा पता गलत दिखा, जिसके कारण आवेदन निरस्त हो गया। उन्होंने अधिकारियों से वास्तविक निवास का भौतिक सत्यापन करने का अनुरोध किया। स्कूल एवं शिक्षा अधिकारियों ने आवेदन इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा दिया गया निवास प्रमाण संतोषजनक नहीं था। हाई कोर्ट के निर्देश पर शिक्षा विभाग ने 19 और 20 जून 2026 को स्थल का निरीक्षण किया। निरीक्षण में पाया गया कि बताए गए स्थान पर केवल एक बिस्तर था। जमीन पर याचिकाकर्ता की माता एक छोटा भोजनालय चलाती थीं। ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि पूरा परिवार वहीं नियमित रूप से रहता है। पीठ ने कहा कि केवल गूगल मैप की त्रुटि का हवाला देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक निवास सिद्ध करने का दायित्व याचिकाकर्ता पर है। बिजली बिल, पानी का बिल, गैस कनेक्शन, बैंक पत्राचार, राशन कार्ड आदि कोई भी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए विभिन्न दस्तावेजों (आवेदन पत्र, लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र) में अलग-अलग पते दर्ज थे, जिससे उसके दावे पर संदेह उत्पन्न हुआ। इसलिए शिक्षा अधिकारियों द्वारा आवेदन अस्वीकार करना वैध और उचित था।
Created On :   26 Jun 2026 10:12 PM IST
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