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सुप्रीम कोर्ट: शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह मामले पार्टी संविधान गैर- लोकतांत्रिक है या नहीं, आयोग तय नहीं कर सकता

New Delhi News. सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह ‘धनुष बाण’ मामले पर गुरुवार को भी सुनवाई जारी रही। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ के समक्ष उद्धव गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अपनी दलील पेश की। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि किसी पार्टी का संविधान गैर-लोकतांत्रिक है या नहीं। उन्होंने दावा किया कि एकनाथ शिंदे गुट को आयोग के बिना पहले नोटिस दिए निकाले गए नतीजों से फायदा हुआ। सिब्बल ने कहा कि उनके मुवक्किल ने विधानसभा अध्यक्ष से बागी विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी, लेकिन मामले पर फैसला देने की बजाय इसे लंबित रखा गया। विधानसभा अध्यक्ष का फैसला लंबित रखना और बागियों को मुख्यमंत्री बनने देना गैर-कानूनी है। मामले की सुनवाई अगले सप्ताह मंगलवार को भी जारी रहेगी। सिब्बल उद्धव गुट की ओर से अपनी दलील पेश करेंगे।
शिंदे ने किस आधार पर कार्यसमिति का किया ऐलान
सिब्बल ने कोर्ट में उद्धव गुट की ओर से दलील पेश करते हुए कहा कि एकनाथ शिंदे को शिवसेना पार्टी के संविधान के मुताबिक नियुक्त किया गया था। अचानक, वह 1999 की घटना के बारे में बात करते हैं और पाते हैं कि 2018 की घटना गैर-लोकतांत्रिक थी। उन्होंने कहा कि अगर शिंदे ने 2018 का संविधान नहीं माना था, तो उन्होंने उस समय ऐतराज़ क्यों नहीं किया। किस आधार पर उन्होंने अलग कार्यसमिति का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि अगर शिवसेना के टूटने पर कोई विवाद होता, तो पार्टी का पंजीकरण रद्द किया जा सकता था। लेकिन पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह शिंदे गुट को दे दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है लोकतंत्र की रक्षा कर सकता
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी यह पक्का करने की कोशिश नहीं करती कि अयोग्यता वाली याचिका पर कोई फैसला न हो। उन्होंने कहा कि इस मामले में चुनाव आयोग ने जनता दल के फैसले को आधार बनाया था। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही लोकतंत्र की रक्षा कर सकता है। संसद कानून पारित कर सकती है, लेकिन उन्हें कोर्ट में परखा जाता है।
मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ को भेजा जाए
सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के मुद्दे पर उद्धव गुट का पक्ष रखते हुए सिब्बल ने अहम मांग की। उन्होंने कहा कि आयोग के संबंध में पांच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले का वह हिस्सा, जिसमें कहा गया है कि चुनाव आयोग पहले फैसला ले सकता है, सबसे खतरनाक हिस्सा है। सिब्बल ने मांग की कि इस मामले को दोबारा विचार के लिए सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए।
Created On :   13 Aug 2026 10:21 PM IST










