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सुप्रीम कोर्ट: शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह मामले में सिब्बल की दलील - शिंदे की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति गैर-कानूनी थी

New Delhi News. सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पार्टी और चुनाव चिन्ह ‘धनुष-बाण’ मामले पर बुधवार को भी सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ के समक्ष उद्धव गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अपनी दलील पेश की। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग ने शिवसेना पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह मामले में आसानी से फैसला सुनाया और एकनाथ शिंदे गुट को फायदा पहुंचाया गया। उन्होंने कहा कि अगर चुनाव आयोग का आदेश लागू रहा, तो भविष्य में कोई भी सरकार नहीं बचेगी। कोई भी विधायक को तोड़कर असली पार्टी के खिलाफ दावा कर सकता है। सिब्बल ने अपनी दलील में कहा की स्पष्ट बात ये है कि शिंदे की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति गैर-कानूनी थी और गैर-कानूनी हालात में मिले समर्थन का इस्तेमाल बाद में पार्टी के खिलाफ दावा सिद्ध करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट में मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
आयोग ने शिंदे का लाभ पहुंचाने पहले नतीजा तय किया फिर कारण
उन्होंने चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि पार्टी तोड़ने का फैसला करने से पहले 10वीं अनुसूची के अनुसार अयोग्यता का फैसला महत्वपूर्ण था। लेकिन आयोग ने पहले शिंदे को लाभ पहुंचाने के लिए नतीजा तय किया और उसी के अनुसार कारण तय किए। वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों को ठीक से देखा ही नहीं और यह कह दिया कि उसके पास पार्टी का नवीनतम संविधान नहीं है। सिब्बल ने उद्धव गुट का पक्ष रखते हुए चुनाव आयोग की भूमिका और शक्तियों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि 2018 की शिवसेना घटना को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया। 2018 का संविधान शिंदे गुट को स्वीकार नहीं था, लेकिन शिंदे उसी संविधान के आधार पर विधायक और मंत्री बन गए।
शिवसेना के संविधान के बारे में आयोग को जानकारी नहीं, ये गलत
सिब्बल के मुताबिक, 2018 का संविधान आयोग को सौंपा गया था। उस पर आयोग की सील भी थी। इसके बाद भी आयोग ने यह दावा करके गलत नतीजा निकाला की यह रिकॉर्ड में नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग जो 13 साल से पार्टी के पंजीकरण और पदाधिकारियों के रिकॉर्ड देख रहा था, उसे शिवसेना के संविधान के बारे में पता नहीं था, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जब आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने फैसला किया, तो उसके पास सिर्फ दो दस्तावेज थे। यह सच है कि वह इन दो दस्तावेजों के आधार पर यह नतीजा नहीं निकाल सका कि राजनीतिक पार्टी में फूट है। जब तक राजनीतिक पार्टी में फूट न हो, आयोग का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। आयोग ने विधानसभा की संख्या को पार्टी में फूट माना था। उन्होंने कहा कि यह दावा भी गलत है कि शिवसेना तानाशाही तरीके से चल रही थी।
संगठन के स्तर पर ठाकरे गुट के पास था बहुमत
उद्धव गुट का पक्ष रखते हुए सिब्बल ने कोर्ट के समक्ष कहा कि आयोग ने चुने हुए पदाधिकारियों के बारे में गलत तथ्य पेश किए। आयोग ने कहा कि सभी उप नेता नियुक्त किए गए थे। जबकि असल में, कई उप नेता चुने गए थे। संगठन के स्तर पर ठाकरे ग्रुप के पास बहुमत था। शिंदे गुट के 4 लाख प्राथमिक सदस्य थे, जबकि ठाकरे गुट के 19 लाख सदस्य थे। सिब्बल ने कहा कि शिंदे ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके गुट की ताकत बढ़ाई। उन्होंने कहा कि बढी हुई ताकत का इस्तेमाल वास्तविक बंटवारे के लिए नहीं किया जा सकता।
Created On :   12 Aug 2026 9:08 PM IST








