Nagpur News: ज्ञान परंपरा से नई पीढ़ी का संवाद, रामटेक में महाराष्ट्र के 26 विद्वान लेखन में जुटे

ज्ञान परंपरा से नई पीढ़ी का संवाद, रामटेक में महाराष्ट्र के 26 विद्वान लेखन में जुटे
  • संस्कृति, शास्त्र और विज्ञान की विरासत को किताबों में संजोने की पहल
  • कक्षा 5वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए तैयार होंगी भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित पुस्तकें
  • संस्कृत और हिंदी में अनुवाद कर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की योजना

Nagpur News पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन ज्ञान की वह धारा जो सभ्यता को उसकी जड़ों से जोड़ती है, कभी नहीं रुकती। इसी ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी, विशेषकर जनरेशन-जेड तक पहुंचाने की पहल अब किताबों के जरिए आकार ले रही है। कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र द्वारा कक्षा 5वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा आधारित पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया जा रहा है। इसी परियोजना से जुड़े लेखकों का सम्मेलन रामटेक में आयोजित किया गया। महाराष्ट्र के 26 विद्वान इन पुस्तकों के लेखन में योगदान दे रहे हैं। सम्मेलन में लेखकों ने अपने अध्ययन, अनुभव और कार्यक्षेत्र साझा किए।

रायगढ़ से रंगमंच तक समेटी जा रही विरासत

भारतीय ज्ञान परंपरा केंद्र की समन्वयक एवं भारतीय धर्म, दर्शन एवं संस्कृति संकाय की अधिष्ठाता प्रो. कलापिनी अगस्ती के मार्गदर्शन में चल रही परियोजना में भारतीय संस्कृति, पर्व-त्योहार, मंदिर, विविध कलाएं, प्रादेशिक परंपराएं, प्राचीन शास्त्र, कृषि, स्थापत्य और विज्ञान जैसे विषय शामिल किए गए हैं।

सम्मेलन में प्रवीण योगी, मंदार मोरोणे, मंगेश बावसे, मृण्मयी कुलकर्णी, डॉ. रेणुका करंदीकर, डॉ. सुमित कठाले, मृणाल फडणवीस-झाडे, वीणा बावसे और प्रा. श्रद्धा देवपुजारी ने रामटेक परिसर का भ्रमण किया। प्रवीण योगी ने रायगढ़ किले की करीब 80 यात्राओं से जुटाई ऐतिहासिक जानकारी साझा की। वहीं मंगेश बावसे और वीणा बावसे ने नाट्य, पत्रकारिता, लेखन और निर्देशन से जुड़े अपने अनुभव बताए।

आठ खंडों में संजोई जा रही हस्तलिखित ग्रंथ-संपदा

केंद्र के सह-समन्वयक प्रो. हरेकृष्ण अगस्ती ने कहा कि इन पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा महाराष्ट्र के विद्यार्थियों और शिक्षकों तक पहुंचेगी। प्रो. कलापिनी अगस्ती ने दार्शनिक हस्तलिखित ग्रंथों की सूची के आठ खंडों के प्रकाशन और संबंधित ग्रंथों के प्रदर्शन की जानकारी दी। उन्होंने हस्तमुद्राओं पर शोध तथा भारतीय ज्ञान-संपदा से जुड़े विभिन्न ग्रंथ-निर्माण प्रकल्पों की जानकारी भी दी।

संस्कृत-हिंदी अनुवाद से राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की तैयारी

पाठ्यपुस्तकों का संस्कृत और हिंदी में अनुवाद कर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध कराने की योजना है। इससे महाराष्ट्र की ज्ञान परंपरा और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। सम्मेलन में परियोजना से जुड़े लेखकों का सम्मान भी किया गया। इस अवसर पर डॉ. रेणुका बोकारे, हिमांशू पानतावणे और ब्रिजेश सोमकुवर उपस्थित रहे।


Created On :   28 Aug 2026 3:59 PM IST

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